श्रीलंका: आईएमएफ की ‘शर्तों’ पर उठा विवाद, ऊर्जा संकट बना सरकार का सिरदर्द
पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य दिनाउक कोलोमबागे ने पत्रकारों से बातचीत में कहा- ‘सेंट्रल बैंक के गवर्नर ने दावा किया है कि अगर श्रीलंका को आईएमएफ से कर्ज लेना है, तो उसे अपनी मुद्रा का 30 फीसदी अवमूल्यन करना होगा। साथ ही देश में सरकारी नौकरियों की संख्या घटानी होगी...
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्ज लेने का मामला श्रीलंका में बड़े राजनीतिक विवाद का रूप लेता दिख रहा है। प्रमुख विपक्षी दल यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) ने इसके खिलाफ जोरदार अभियान छेड़ दिया है। विवाद ये खबर आने के बाद भड़का कि कर्ज देने के बदले आईएमएफ श्रीलंका पर कड़ी शर्तें थोप रहा है। खुद श्रीलंका के सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजित निवार्ड कैबराल के बयान से इस बारे में संकेत मिले।
घटानी होंगी सरकारी नौकरियां
अब यूएनपी ने सेंट्रल बैंक के गवर्नर से मांग की है कि वे शर्तों के बारे में पूरी जानकारी देश को दें। पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य दिनाउक कोलोमबागे ने पत्रकारों से बातचीत में कहा- ‘सेंट्रल बैंक के गवर्नर ने दावा किया है कि अगर श्रीलंका को आईएमएफ से कर्ज लेना है, तो उसे अपनी मुद्रा का 30 फीसदी अवमूल्यन करना होगा। साथ ही देश में सरकारी नौकरियों की संख्या घटानी होगी। सवाल है कि आईएमएफ ने ये मांग कहां की है? 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की सरकार ने भी आईएमएफ से समझौता किया था। तब भी कैबराल ही गवर्नर थे। लेकिन तब उन्होंने ऐसी शर्तों का विरोध नहीं किया था। अब वे आईएमएफ से कर्ज लेने का विरोध क्यों कर रहे हैं?’
यूएनपी के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने बुधवार को संसद में कहा कि अगर सरकार ने विदेशी मुद्रा के संकट का समाधान तुरंत नहीं ढूंढा, तो देश को बिजली की कटौती का सामना करना पड़ेगा। विदेशी मुद्रा के संकट के कारण श्रीलंका ईंधन के आयात करने की स्थिति में नहीं रहेगा। विक्रमसिंघे ने सरकार इस बारे में पूरा ब्योरा देने की मांग की। उन्होंने बताया कि श्रीलंका के विदेशी मुद्रा कोष में अब सिर्फ 1.5 अरब डॉलर बचे हैं। उनमें 30 करोड़ डॉलर का सोना है। यानी नकदी के रूप में देश के पास 1.2 अरब डॉलर की रकम ही बची है।
डॉलर की कीमत 240 श्रीलंकाई रुपये तक पहुंची
कोलोमबागे ने भी अपने प्रेस वार्ता में कहा कि देश को डॉलर की कमी का सामना करना पड़ रहा है। ब्लैक मार्केट में डॉलर की कीमत 240 श्रीलंकाई रुपये तक पहुंच गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार की नीतियों के कारण ये हालत पैदा हुई है। कोलोमबागे ने कहा कि नवंबर 2019 में जब यूएनपी सरकार ने राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे को सत्ता सौंपी थी, तब देश के विदेशी मुद्रा भंडार में सात अरब अमेरिकी डॉलर थे।
श्रीलंकाई अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक विदेशी मुद्रा के संकट को दूर करने के लिए ही राजपक्षे सरकार ने आईएमएफ से कर्ज लेने की पहल की है। लेकिन देश की माली हालत इतनी खस्ता है कि आईएमएफ आसान शर्तों पर कर्ज देने को तैयार नहीं है। कर्ज के बदले वह सख्त राजकोषीय अनुशासन की शर्त लगा रहा है। इन शर्तों को मानने का मतलब सरकार की खर्च संबंधी नीति में बड़ा बदलाव होगा, जिससे आम जन की स्थिति कठिन होगी।
इस बीच सरकार ने विपक्ष के इस आरोप को गलत बताया है कि श्रीलंका में जल्द ही ऊर्जा संकट खड़ा हो जाएगा। बिजली मंत्री उदया गमनपिला ने एक बयान में कहा है कि देश में ईंधन का पर्याप्त भंडार है।