Sri Lanka: क्या आईएमएफ की सख्त शर्तों के कारण लाचार दिखने लगे हैं विक्रमसिंघे?
Sri Lanka: विशेषज्ञों ने उपलब्ध जानकारी के आधार पर कम से कम तीन ऐसी शर्तों का जिक्र किया है, जिन्हें पूरा करना श्रीलंका सरकार के लिए आसान नहीं होगा। आईएमएफ ने यह साफ कर दिया है कि आईएमएफ, विश्व बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) श्रीलंका को दिए अपने कर्ज का कोई हिस्सा माफ नहीं करेंगे...
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श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने स्वीकार किया है कि उनकी अपनी यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) की कोई टीम न होने के कारण उनके लिए शासन चलाना मुश्किल हो रहा है। यूएनपी के 76वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- ‘मैं आपको यूएनपी के ऐसे चौथे नेता के रूप में संबोधित कर रहा हूं, जो राष्ट्रपति बना है। लेकिन अन्य यूएनपी राष्ट्रपतियों की तुलना में मेरी समस्याएं अलग हैं। यह यूएनपी की सरकार नहीं है और ना ही संसद में मेरे पास यूएनपी की कोई टीम है।’
जिस समय विक्रमसिंघे ने यह बात कही, प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने उनके बगल में बैठे हुए थे। गुणवर्धने अतीत में विक्रमसिंघे की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। विक्रमसिंघे ने कहा- ‘आज हम बेहद गंभीर संकट में हैं। मेरी राय में ऐसा संकट देश को पहले कभी नहीं भुगतना पड़ा। अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है और हमें समाधान ढूंढना है। लोगों को तीन वक्त का खाना जुटाना मुश्किल पड़ रहा है। वे बेरोजगार हैं। इसी संकट के बीच मैंने कमान संभाली है।’
जानकारों का कहना है कि समस्या का हल ढूंढने में लगातार मिल रही नाकामी को लेकर अब राष्ट्रपति विक्रमसिंघे का असंतोष सामने आया है। हाल में विक्रमसिंघे सरकार का अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ करार हुआ, जिसके तहत आईएमएफ 2.9 बिलियन डॉलर का नया कर्ज देने पर राजी हुआ है। लेकिन कर्ज भुगतान से पहले उसने ऐसी कड़ी शर्तें लगा दी हैं, जिसका पालन करना श्रीलंका सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों ने उपलब्ध जानकारी के आधार पर कम से कम तीन ऐसी शर्तों का जिक्र किया है, जिन्हें पूरा करना श्रीलंका सरकार के लिए आसान नहीं होगा। आईएमएफ ने यह साफ कर दिया है कि आईएमएफ, विश्व बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) श्रीलंका को दिए अपने कर्ज का कोई हिस्सा माफ नहीं करेंगे। श्रीलंका को द्विपक्षीय ऋण माफ करवाने के लिए कर्जदाता देशों को राजी करना होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक आईएमएफ ने संभवतः यह सलाह भी दी है कि श्रीलंका सरकार अपने घरेलू कर्ज के भुगतान को री-स्ट्रक्चर करे। इसका अर्थ यह हुआ कि देश में जिन लोगों ने सरकारी बॉन्ड खरीदे हैं, उनकी भुगतान राशि और समय को बदला जाए।
श्रीलंका सरकार ने इस वर्ष अप्रैल में खुद को डिफॉल्टर (कर्ज चुकाने में अक्षम) घोषित किया था। लेकिन तब उसने ऐसा सिर्फ विदेशी कर्ज के मामले में किया था। अब आईएमएफ से करार के बाद ये आशंका पैदा हो गई है कि घरेलू बॉन्ड खरीदारों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। आलोचकों का कहना है कि श्रीलंका सरकार इस बारे में करार की शर्तों को सार्वजनिक ना कर देश में कयासों की गुंजाइश बढ़ा रही है। उसका लोगों के मनोबल पर खराब असर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि करार में अर्थव्यवस्था की सेहत को बहाल करने के लिए कई शर्तें शामिल हैं। उनमें टैक्स बढ़ाना, निजीकरण और मौद्रिक अस्थिरता पर लगाम लगाना शामिल हैँ। इन कदमों की बुरी मार आम लोगों पर पड़ेगी। अपनी कमजोर राजनीतिक स्थिति के कारण विक्रमसिंघे सरकार के लिए ये कदम उठाना आसान नहीं है। शायद यही लाचारी राष्ट्रपति के मंगलवार के भाषण में जाहिर हुई।