श्रीलंका आर्थिक संकट: गोटबया के टोटकों से नहीं जगी उम्मीद, बढ़ रहा है इस्तीफे के लिए दबाव
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विस्तार
श्रीलंका में विदेशी मुद्रा संबंधी संकट का तुरंत कोई समाधान निकलता ना देख कर सरकार ने अब लंबी अवधि का वीजा बेचने का एलान किया है। लेकिन जानकारों का कहना है कि इस योजना से भी श्रीलंका के संकट का फौरी हल निकलने की संभावना नहीं है। गहराते संकट के कारण राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। अब बौद्ध समुदाय के धार्मिक नेता भी उनके खिलाफ होते नजर आ रहे हैं, जबकि पहले वे राजपक्षे परिवार के मजबूत समर्थक रहे हैं।
दीर्घकालिक वीजा बेचने की योजना के तहत उन विदेशियों को श्रीलंका में दस साल तक रहने और यहां काम करने की इजाजत दी जाएगी। ऐसा वीजा लेने के लिए एक लाख डॉलर श्रीलंका में मौजूद बैंक में जमा कराने होंगे। इस योजना को गोल्डन पैराडाइज वीजा प्रोग्राम नाम दिया गया है। इसके घोषित नियमों के तहत जो रकम जमा कराई जाएगी, उसे दस साल तक वापस नहीं लिया जा सकेगा।
इसके अलावा श्रीलंका सरकार ने पांच साल के वीजा की एक योजना भी पेश की है। यह लेने के लिए विदेशी नागरिक को श्रीलंका में फ्लैट खरीदने के लिए कम से कम 75 हजार डॉलर खर्च करने होंगे। श्रीलंका के सूचना मंत्री नलाका गोडाहेवा ने उम्मीद जताई है कि इस योजना से देश को आर्थिक संकट से निकालने में मदद मिलेगी।
सरकार विरोधी प्रदर्शन लगातार जारी
लेकिन जानकारों का कहना है कि अभी श्रीलंका जिस हाल में है, उसके बीच विदेशी नागरिक यहां आने, यहां काम पाने या यहां लंबे समय तक रहने के बारे में सोचेंगे, इसकी संभावना कम है। उनके मुताबिक गोटबया राजपक्षे सरकार संकट से देश को निकालने के उपाय नहीं ढूंढ पा रही है। इसके बीच वह तमाम तरह से हाथ-पांव मार रही है। इस बीच देश में सरकार विरोधी प्रदर्शन लगातार जारी हैं। उन प्रदर्शनों में राजपक्षे परिवार से सत्ता छोड़ने की मांग और भी जोर पकड़ गई है।
इस्तीफे के लिए अब बौद्ध धार्मिक नेताओं की तरफ से राजपक्षे परिवार पर दबाव पड़ने लगा है। बौद्ध भिक्षु मेदागमा धम्मानंद ने कहा है कि देश तेजी से एक नाकाम राज्य साबित होता जा रहा है। उन्होंने मीडियाकर्मियों को बताया कि कई दूसरे बौद्ध नेताओं के साथ उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र भेजा है, जिसमें देश को संकट से निकालने के लिए एक अंतरिम सरकार बनाने की मांग की गई है। जानकारों के मुताबिक ऐसी सरकार बनाने के लिए यह जरूरी है कि राष्ट्रपति के भाई और प्रधानमंत्री महिंद राजपक्षे इस्तीफा दे दें।
कम हो सकते हैं राष्ट्रपति के अधिकार
अभी तक राजपक्षे परिवार सत्ता न छोड़ने पर अड़ा हुआ है। इसके बदले उसने संवैधानिक सुधार की योजना पेश की है। इसके तहत राष्ट्रपति के अधिकार कम कर दिए जाएंगे। 2019 के चुनाव के बाद राजपक्षे सरकार ने संविधान संशोधन किया था। उसके तहत राष्ट्रपति को मंत्रियों, जजों, नौकरशाहों आदि की नियुक्ति और बर्खास्तगी के निर्बाध अधिकार दे दिए गए। अब गोयबया राजपक्षे उन अधिकारों को वापस करने पर राजी हो गए हैं।
लेकिन सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। उनका आरोप है कि सरकार जरूरी चीजों की पर्याप्त आपूर्ति बहाल करने और महंगाई पर लगाम लगाने में नाकाम है। हालात इतने खराब हैं कि दवाएं तक नहीं मिल रही हैं। इस बीच जानकारों का कहना है कि सरकार की उम्मीद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर टिकी है, जिससे अतिरिक्त कर्ज लेने के लिए बातचीत चल रही है। इसमें सफलता मिली, तो देश को तात्कालिक राहत मिल सकेगी।