Sri Lanka Crisis: वित्तीय मुसीबत से निकलने की जद्दोजहद में जुटे श्रीलंका के सामने चुनौतियों का अंबार
Sri Lanka Crisis: श्रीलंका के पास 1.7 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा है। लेकिन इसमें 1.4 बिलियन डॉलर रकम वह है, जो श्रीलंका को चीन से करेंसी स्वैपिंग (मुद्रा की अदला-बदली) के जरिए प्राप्त हुई है। इस रकम को श्रीलंका मनमर्जी से खर्च नहीं कर सकता, क्योंकि इस पर कई शर्तें लगी हुई हैं...
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से मंजूर 2.9 बिलियन डॉलर का कर्ज जारी न होने से श्रीलंका की आर्थिक संकट से उबरने की तमाम योजनाएं जहां की तहां अटकी हुई हैं। श्रीलंका के सेंट्रल बैंक ने कहा है कि कर्ज की ये रकम मिलने के बाद ही वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। बैंक के गवर्नर नंदलाल वीरासिंघे ने कहा है- ‘जब आईएमएफ कर्ज जारी करेगा, तभी हम अपने भंडार को फिर से खड़ा करने की शुरुआत कर सकेंगे।’
आईएमएफ डिफॉल्टर (कर्ज चुकाने में अक्षम) हो चुके श्रीलंका को 2.9 बिलियन डॉलर का नया ऋण देने पर बीते सितंबर में राजी हुआ था। लेकिन अभी तक उसने रकम जारी नहीं की है। इस बीच श्रीलंका को अपने निर्यात, विदेश में रहने वाले श्रीलंकाइयों द्वारा भेजी जाने वाली रकम और पर्यटन उद्योग से जितनी विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है, उतने भर से ही जरूरी चीजों का आयात कर पा रहा है।
बीते अप्रैल में जब श्रीलंका ने खुद को डिफॉल्टर घोषित किया था, तब उसके विदेशी मुद्रा भंडार में सिर्फ दो करोड़ डॉलर की रकम बची थी। फिलहाल, यह 30 करोड़ डॉलर है। वैसे आंकड़ों में यह बताया जाता है कि श्रीलंका के पास 1.7 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा है। लेकिन इसमें 1.4 बिलियन डॉलर रकम वह है, जो श्रीलंका को चीन से करेंसी स्वैपिंग (मुद्रा की अदला-बदली) के जरिए प्राप्त हुई है। इस रकम को श्रीलंका मनमर्जी से खर्च नहीं कर सकता, क्योंकि इस पर कई शर्तें लगी हुई हैं।
वीरासिंघे ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि विदेशी मुद्रा भंडार की सेहत बहाल करने के लिए श्रीलंका भरपूर कोशिश कर रहा है। उसका पहला मकसद उपलब्ध विदेशी मुद्रा को बढ़ाना है। इसके लिए आईएमएफ से कर्ज मिलना अनिवार्य है। उसके बाद ही किसी अन्य स्रोत से श्रीलंका को विदेशी मुद्रा मिल पाएगी। लेकिन आईएमएफ का कर्ज तभी मिलेगा, जब श्रीलंका अपने अन्य कर्जदाताओं को उनके ऋण लौटाने की नई समयसीमा पर राजी कर सकेगा। इनमें निजी क्षेत्र के कर्जदाताओं के साथ-साथ द्विपक्षीय कर्जदाता देश, चीन, जापान और भारत शामिल हैं।
रानिल विक्रमसिंघे सरकार के सूत्रों ने मीडियाकर्मियों को बताया है कि इन तीन देशों से कर्ज समयसीमा के पुनर्निर्धारण के मुद्दे पर बातचीत चल रही है। लेकिन तमाम संकेत यही हैं कि इस दिशा में अभी ज्यादा प्रगति नहीं हुई है। इस बीच विश्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2023 में श्रीलंका की अर्थव्यवस्था 4.2 फीसदी सिकुड़ेगी।
वीरासिंघे को इस साल उस समय बुला कर सेंट्रल बैंक का नेतृत्व दिया गया, जब देश डिफॉल्ट कर चुका था। वीरासिंघे ने निक्कईएशिया से कहा- ‘यह हमारे लिए नया अनुभव है। हमारे सामने इसके पहले कभी ऐसी नौबत नहीं आई थी, जब हम समय पर ऋण ना चुका पाए हों। अब हम ऋण चुकाने की समयसारणी को पुननिर्धारित करना सीख रहे हैं। हम उन मुद्दों को समझ रहे हैं, जो ऋणदाताओं ने हमारे सामने उठाए हैं।’ वीरासिंघे ने कहा कि उनकी कोशिश है कि इसके बाद श्रीलंका को आईएमएफ के सामने हाथ ना फैलाना पड़े। लेकिन विश्लेषकों ने कहा है कि आगे की बात तो तब आएगी, जब श्रीलंका अभी की मुसीबत से निकल पाए।