{"_id":"62c6d7c001644801fa1a50c0","slug":"sri-lanka-crisis-in-the-midst-of-deepening-economic-crisis-ruling-party-and-the-opposition-played-chess-moves-know-the-current-situation","type":"story","status":"publish","title_hn":"Sri Lanka Crisis: गहराते आर्थिक संकट के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष ने चलीं शतरंजी चालें, जानें श्रीलंका के मौजूदा हालात","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
Sri Lanka Crisis: गहराते आर्थिक संकट के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष ने चलीं शतरंजी चालें, जानें श्रीलंका के मौजूदा हालात
Thu, 07 Jul 2022 06:25 PM IST
अभिषेक दीक्षित
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Thu, 07 Jul 2022 06:25 PM IST
सार
प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने क्षेत्रीय निगरानी समितियां बनाने का एक प्रस्ताव संसद में बुधवार को रखा। उन्होंने कहा कि इन समितियों में सभीदलों के सदस्यों को शामिल किया जाएगा।
विज्ञापन
विक्रमसिंघे
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने अब प्रशासन में विपक्ष को भी शामिल करने की पहल की है। समझा जाता है कि इस पहल के पीछे मकसद आर्थिक संकट का हल निकालने में सभी पक्षों की मदद लेना है, लेकिन विपक्षी दल जनता विमुक्ति पेरामुना के नेतृत्व वाले गठबंधन- नेशनल पीपुल्स पॉवर (एनपीपी) ने छह महीनों के लिए अपने नेतृत्व में एक नई सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा है। एनपीपी ने कहा है कि अगर इसके लिए राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे तैयार हों, तो वह राष्ट्रपति के इस्तीफे की मांग को फिलहाल स्थगित कर सकता है।
विज्ञापन
प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने क्षेत्रीय निगरानी समितियां बनाने का एक प्रस्ताव संसद में बुधवार को रखा। उन्होंने कहा कि इन समितियों में सभीदलों के सदस्यों को शामिल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि समिति प्रणाली में सरकार आम सहमति बनाने के लिए मजबूर हो जाती है। यानी वह अपनी मर्जी से काम नहीं कर पाती। अब विपक्ष को सिर्फ आलोचना करने के बजाय समाधान ढूंढने में हिस्सेदार बनना चाहिए।
विज्ञापन
समझा जाता है कि विपक्ष की तरफ से वर्तमान सरकार की तेज हो रही आलोचना को देखते हुए प्रधानमंत्री ने यह पहल की है। विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बने लगभग दो महीने हो गए हैं, लेकिन इस दौरान देश में आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि खुद विक्रमसिंघे को कहना पड़ा है कि वे एक दिवालिया देश के प्रधानमंत्री हैं।
विज्ञापन
प्रधानमंत्री ने बुधवार को कहा कि अपनी आजादी के बाद के सबसे गंभीर आर्थिक संकट में फंसे श्रीलंका को यहां से निकालने के लिए शासन के ढर्रे में सुधार करना होगा। उन्होंने कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन सत्ता में है और कौन विपक्ष में। पूरी संसद को इस काम में योगदान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि विपक्ष के युवा सांसदों को इस प्रक्रिया में जरूर शामिल होना चाहिए।
जिन चार सर्वदलीय समितियों को बनाने का प्रस्ताव विक्रमसिंघे ने रखा है, उनका काम आर्थिक संकट से प्रभावित समुदायों और परिवारों को राहत पहुंचाना, देश के उद्यमियों की स्थिति की समीक्षा करना, आम जन की सहायता करना, और राजकीय संस्थानों में फिर से जान फूंकना होगा। इन समितियो को कुल 16 विभागों से संबंधित कामकाज में भूमिका निभाने के लिए कहा जाएगा।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक, ऐसा नहीं लगता कि विपक्षी दल विक्रमसिंघे की मंशा के मुताबिक सरकार से सहयोग करने को तैयार हैं। इसके विपरीत एनपीपी ने राष्ट्रपति राजपक्षे से मांग की है कि वे उसे छह महीनों के लिए एक छोटा मंत्रिमंडल गठित करने दें। गठबंधन के नेता अरुणा कुमारा दिसानायके ने कहा कि अगर राष्ट्रपति को यह प्रस्ताव मंजूर नहीं है, तो फिर उन्हें साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर एक नई अंतरिम सरकार का गठन करना चाहिए। इस सरकार में विपक्ष को भी शामिल किया जाना चाहिए।
विक्रमसिंघे ने इस प्रस्ताव का मखौल उड़ाया है। उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा कि छह महीनों में श्रीलंका के संकट को हल कर देने वाले लोग नोबेल पुरस्कार पाने के हकदार होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर एनपीपी अर्थव्यवस्था में सुधार का व्यावहारिक कार्यक्रम पेश करे, तो वे इस्तीफा दे देने को तैयार हैं। प्रधानमंत्री के इस बयान पर दिसानायके ने कहा कि उन्होंने छह महीनों में सारी समस्याएं हल करने का दावा नहीं किया है। उन्होंने कहा कि इस अवधि में उनकी प्रस्तावित सरकार सिर्फ ईंधन और दवाओं का अभाव दूर करेगी।