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पाकिस्तान: महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा से तोड़-फोड़, आक्रोशित सिख समुदाय ने दी चेतावनी
Wed, 18 Aug 2021 06:12 PM IST
गौरव पाण्डेय
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेशावर
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेशावर
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Wed, 18 Aug 2021 06:12 PM IST
सार
अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के लिए कुख्यात पाकिस्तान में अब सिख समुदाय आक्रोशित है। पंजाब प्रांत में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना के बाद समुदाय ने प्रांत की सरकार पर हमला बोला है।
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महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा
- फोटो : फाइल
विस्तार
पाकिस्तान के प्रमुख शहर पेशावर में रहने वाले सिख समुदाय में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा के साथ तोड़-फोड़ की घटना से आक्रोश है। समुदाय ने कहा है कि अगर पंजाब प्रांत के अधिकारी सुरक्षा नहीं कर सकते हैं तो हम पहले सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा लेकर आएंगे और लाहौर किले पर स्थापित करेंगे। बता दें कि नौ फीट ऊंची कांस्य की प्रतिमा को प्रतिबंधित तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) के एक कार्यकर्ता ने क्षतिग्रस्त कर दी थी।
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आरोपी को गिरफ्तार किया जा चुका है। एक वायरल वीडियो में उसे नारे लगाते, प्रतिमा की बांह तोड़ते और प्रतिमा के हिस्सों को जमीन पर फेंकते हुए देखा जा सकता है। पेशावर में सिख समुदाय के नेता गोरपाल सिंह ने मंगलवार को कहा था कि अगर पंजाब सरकार प्रतिमा की सुरक्षा नहीं कर सकती है तो हम इसे शहर में लेकर आएंगे। गोरपाल सिंह ने आगे कहा कि प्रतिमा को पेशावर लाने के लिए सिखों का एक प्रतिनिधिमंडल पंजाब प्रांत की राजधानी लाहौर जाएगा।
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उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार अगर रणजीत सिंह की प्रतिमा की सुरक्षा नहीं कर सकती है तो समय-समय पर उसे इसे प्रदर्शित करना बंद कर देना चाहिए। उन्होंने बताया कि रणजीत सिंह की एक तस्वीर पेशावर में करीब छह साल पहले ऐतिहासिक बालाहिसार किले में प्रदर्शनी के लिए रखी गई थी और तब से उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। जबकि, पंजाब सरकार एक प्रतिमा की सुरक्षा नहीं कर पा रही है। प्रतिमा पर हुए हमलों से सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं।
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बता दें कि मंगलवार की घटना पहली नहीं थी। पहले महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को निशाना बनाया जा चुका है। पिछले साल लाहौर में प्रतिमा की बांह तोड़ दी गई थी। इसके अलावा अगस्त 2019 में भी दो लोगों ने प्रतिमा क्षतिग्रस्त कर दी थी। महाराजा रणजीत सिंह सिख साम्राज्य के संस्थापक थे। उन्होंने 19वीं सदी के शुरुआती आधे दौर में उत्तर-पश्चिम भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया था। प्रतिमा में उन्हें घोड़े पर बैठे हुए और हाथ में तलवार लिए दिखाया गया है।