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नोबेल शांति: ट्रंप करते रहे दावे, शहबाज एलान के वक्त तक बताते रहे खूबियां, फिर भी नहीं पूरी हुई दोनों की हसरत
Fri, 09 Oct 2026 03:30 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Fri, 09 Oct 2026 03:30 PM IST
सार
ट्रंप लगातार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए दावेदारी करते रहे। वहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी पुरस्कार की घोषणा से ठीक पहले उनकी तारीफ में कसीदे पढ़े। उन्होंने भारत-पाकिस्तान सीजफायर का श्रेय ट्रंप को देते हुए उन्हें सम्मान देने की वकालत की। हालांकि, पुरस्कार के एलान के वक्त दोनों का हसरत अधूरी रह गई। क्यों कि ये सम्मान मिला दक्षिण अफ्रीका की मानवाधिकार विशेषज्ञ नवी पिल्लई को। ट्रंप को नोबेल क्यों नहीं मिला? नवी पिल्लई ने ऐसा क्या किया कि उन्हें यह सम्मान दिया गया? पाकिस्तान ट्रंप के लिए इतना जोर क्यों लगा रहा था? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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ट्रंप को नहीं मिला नोबेल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला। पुरस्कार के लिए उनके दावे एक बार फिर धरे रह गए। ट्रंप आखिरी समय तक इस सम्मान के लिए अपनी दावेदारी जताते रहे। उधर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तो हद ही कर दी। वो पुरस्कार की घोषणा से करीब आधे घंटे पहले तक ट्रंप की खूबियां गिनाते रहे। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार देने की फिर वकालत की। हालांकि, पुरस्कार के एलान के साथ ही ट्रंप और शहबाज, दोनों की उम्मीदें अधूरी रह गईं।
हालांकि, जब 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना माचाडो को दिया गया, तो ट्रंप और व्हाइट हाउस ने नोबेल समिति के फैसले पर सवाल उठाए थे। बाद में माचाडो ने खुद यह पुरस्कार ट्रंप को समर्पित करने की बात कही थी।
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पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल के लिए क्यों नामित किया था?
- नोबोले मिलने से पहले ही शहबाज शरीफ ने एक्स पर एक पोस्ट भी किया था। इसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने दक्षिण एशिया में शांति आगे बढ़ाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनके अनुसार, ट्रंप के समय पर किए गए हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान को टकराव के किनारे से वापस लाने में मदद मिली और दोनों देशों के बीच सीजफायर हुआ। पाकिस्तान का कहना है कि यह सीजफायर अब तक कायम है। इसी योगदान को देखते हुए पाकिस्तान ने ट्रंप के नाम की सिफारिश नोबेल शांति पुरस्कार के लिए की थी।
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- पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने आगे लिखा था कि ट्रंप के प्रयासों को इस बार उचित पहचान मिलने की उम्मीद है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि ट्रंप ने दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शहबाज शरीफ के मुताबिक, ट्रंप के हस्तक्षेप ने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने में मदद की और दोनों देशों को संघर्ष से पीछे हटने का रास्ता मिला।
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भारत-पाकिस्तान सीजफायर में ट्रंप की भूमिका पर क्या दावा?
पाकिस्तान लगातार यह दावा करता रहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराने में ट्रंप की भूमिका महत्वपूर्ण रही। शहबाज शरीफ ने भी अपने संदेश में इसी बात को प्रमुखता दी। उनके मुताबिक, ट्रंप के हस्तक्षेप से दोनों देशों के बीच संघर्ष बढ़ने से रुका और सीजफायर संभव हुआ। पाकिस्तान ने इसी भूमिका को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप की दावेदारी का आधार बनाया। हालांकि, भारत हमेशा से इस बात को नकारता रहा है। भारत का कहना है कि जब पाकिस्तान गिड़गिड़ाने लगा था और सीजफायर की भीख मांग रहा था। तभी भारत सीजफायर के लिए माना।ट्रंप कब से कर रहे नोबेल शांति पुरस्कार की मांग?
डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से अपने लिए नोबेल शांति पुरस्कार की मांग पहली बार नहीं हुई है। वे अपने पहले कार्यकाल (2017–2021) से ही इस प्रतिष्ठित सम्मान की मांग करते आ रहे हैं।
पहला कार्यकाल (2019 – 2020)
- ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहना शुरू किया था कि वे इस पुरस्कार के हकदार हैं। उन्होंने दावा किया था कि उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन के साथ हुई शिखर वार्ता के बाद जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने नोबेल समिति को उनके नाम का पत्र भेजा था। इसी दौरान उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को 2009 में नोबेल पुरस्कार मिलने की आलोचना भी की थी।
- जब इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया, तो ट्रंप ने चुनावी रैलियों में नाराजगी जताते हुए कहा था कि शांति समझौता उन्होंने करवाया था, लेकिन श्रेय किसी और को मिल गया।
दूसरा कार्यकाल (2025–2026)
व्हाइट हाउस में वापसी के बाद ट्रंप ने अलग-अलग मौकों पर दावा किया कि उनके प्रशासन ने दुनिया भर में कई युद्धों को खत्म किया है। इस्राइल, पाकिस्तान, कंबोडिया, आर्मेनिया, अजरबैजान और रवांडा जैसे देशों के नेताओं ने उनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित करने का दावा किया।हालांकि, जब 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना माचाडो को दिया गया, तो ट्रंप और व्हाइट हाउस ने नोबेल समिति के फैसले पर सवाल उठाए थे। बाद में माचाडो ने खुद यह पुरस्कार ट्रंप को समर्पित करने की बात कही थी।
कौन हैं नवी पिल्लई, क्यों इन्हें मिला शांति का नोबेल?
- नवी पिल्लई का जीवन संघर्ष, शिक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा की मिसाल है। 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय तमिल मूल के परिवार में जन्मीं पिल्लई ने बचपन में गरीबी और रंगभेद का सामना किया। उनके पिता बस चालक थे, लेकिन मां ने आर्थिक मुश्किलों के बावजूद बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए मेहनत की।
- पिल्लई ने नेटाल विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की। 1967 में उन्होंने अपनी कानूनी फर्म शुरू की और नेटाल प्रांत में ऐसा करने वाली पहली महिला बनीं। आगे चलकर वह दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में न्यायाधीश बनने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। उन्होंने रंगभेद का विरोध करने वाले लोगों का बचाव किया और कैदियों के अधिकारों के लिए भी काम किया।
- पिल्लई ने रवांडा के अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में आठ साल तक न्यायाधीश के रूप में काम किया। इनमें चार साल वह इसकी अध्यक्ष रहीं। अकायेसु मामले में उनकी भूमिका अहम रही। इस मामले में पहली बार बलात्कार और यौन हिंसा को नरसंहार के अपराध से जोड़ा गया। इससे संघर्ष के दौरान महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा को गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराध मानने का कानूनी आधार मजबूत हुआ।
- पिल्लई 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रहीं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में भी न्यायाधीश के रूप में सेवा दी। उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूल से डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस की डिग्री हासिल की।
- नोबेल समिति ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने, युद्ध अपराधों और नरसंहार के दोषियों को जवाबदेह बनाने तथा पीड़ितों को न्याय दिलाने में योगदान के लिए सम्मानित किया। उनका काम दिखाता है कि कानून के जरिए हिंसा और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है।