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अफगानिस्तान में नाकामी: अफगान सुरक्षा बलों की हार से गंभीर सवालों से घिर गया है अमेरिका का सुरक्षा तंत्र

Wed, 18 Aug 2021 05:57 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 18 Aug 2021 05:57 PM IST
सार

विशेषज्ञों के मुताबिक हर प्रांत या शहर में अपनी जीत को तालिबान ने ‘कब्जा’ बताया। इसके पीछे उसका मकसद ये संदेश देना था कि इसके लिए उसे कोई बड़ी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी। इससे अफगान बलों का मनोबल गिरता गया। आखिर में उन्होंने तालिबान से समझौता करके उसके सामने हथियार डाल दिए...

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serious questions raised on US security system after the defeat of Afghan security forces
अफगानिस्तान में तालिबानी - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

जिस तेजी और आसानी से तालिबान ने काबुल पर कब्जा जमा लिया, उससे अमेरिका के सुरक्षा प्रतिष्ठान पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। सबसे अहम सवाल ये उठा है कि आखिर अमेरिका के सुरक्षा और सैन्य तंत्र ने अरबों डॉलर खर्च किस तरह अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों को तैयार किया, जिनमें साधारण लड़ाई लड़ने का भी माद्दा नहीं था। ये बात अमेरिकी चर्चा में बार-बार दोहराई जा रही है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में तीन लाख सैनिक तैयार किए थे। उन्हें अति आधुनिक हथियार और उपकरण दिए गए थे। दूसरी तरफ तालिबान के पास बमुश्किल 75 हजार लड़ाके हैं। उनके हथियार भी पिछड़े हुए हैं। फिर भी अफगान सुरक्षा बल तालिबान को नहीं रोक पाए।

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अब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अधिकारी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि काबुल की सत्ता पर तालिबान के कब्जा कर लेने के बाद अल-कायदा के भी फिर से उठ खड़ा होने का रास्ता तैयार हो गया है। 11 सितंबर 2001 को अल-कायदा ने ही अमेरिका पर भयानक आतंकवादी हमले किए थे। उसका ही बदला लेने के लिए अमेरिका और उसके साथी देशों ने अपने फौजी अफगानिस्तान भेजे।
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सेना के रिटायर्ड जनरल डगलस ई लुटे ने टीवी चैनल एनबीसी से कहा- ‘मेरी लिए सबसे बड़ी पहेली यह है कि अमेरिका में कोई आपात योजना नहीं बनाई गई। हर कोई जानता था कि हम अफगानिस्तान से निकलने जा रहे हैं। ये बात दो साल पहले ही तय हो गई थी। तो उसे ध्यान में रखते हुए आखिर कोई योजना क्यों नहीं बनाई गई?’ इसी चैनल से बातचीत करते हुए अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवान ने कहा- ‘अमेरिका अफगान सुरक्षा बलों को लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं दे सका। और उन बलों ने आखिर में फैसला किया कि वे काबुल के लिए या अपने देश के लिए लड़ाई नहीं लड़ेंगे।’

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एनबीसी के मुताबिक अमेरिकी अधिकारी अफगानिस्तान में फैले भ्रष्टाचार को लेकर काफी समय से चिंतित थे। उन्हें इसका अहसास था कि भ्रष्टाचार के कारण निचले दर्जे के सैनिकों को उचित वेतन और खाने-पीने की चीजें नहीं मिल पाती हैं। लंदन स्थित थिंक टैंक- सेंटर फॉर स्टडी ऑफ आर्म्ड ग्रुप्स की सह-निदेशक एशले जैकसन के मुताबिक तालिबान ने अफगान सेना में संसाधनों, नेतृत्व और संकल्प-शक्ति की कमी का फायदा उठाया। जैकसन ने कहा- आप तमाम तरह से क्षमता निर्माण कर सकते हैं, हर तरह की चीजों की सप्लाई कर सकते हैं। लेकिन अगर सिस्टम काम ना कर रहा हो, अगर वह भ्रष्ट हो और उसे उचित राजनीतिक नेतृत्व ना मिले, तो बाकी चीजें काफी साबित नहीं होतीं।

विशेषज्ञों के मुताबिक हर प्रांत या शहर में अपनी जीत को तालिबान ने ‘कब्जा’ बताया। इसके पीछे उसका मकसद ये संदेश देना था कि इसके लिए उसे कोई बड़ी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी। इससे अफगान बलों का मनोबल गिरता गया। आखिर में उन्होंने तालिबान से समझौता करके उसके सामने हथियार डाल दिए।

लेकिन बात घूम-फिर कर वहीं आ जाती है कि आखिर अमेरिका को इन बातों की भनक क्यों नहीं लगी? खुफिया एजेंसियों में जिसकी  आशंका जताई थी, वह यह थी कि तालिबान 11 सितंबर से पहले काबुल पहुंच सकता है। लेकिन वह ऐसा 15 अगस्त को ही कर लेगा, इसकी दूर-दूर तक किसी ने कल्पना नहीं की थी।

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