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Russia-NKorea: निकल आएंगे उत्तर कोरिया में 70 साल से दबे गोला बारूद, रूस ने यूं ही नहीं लगाया सबसे बड़ा दांव

Fri, 15 Sep 2023 02:14 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Fri, 15 Sep 2023 02:14 PM IST
सार

उत्तर कोरिया के बम और मिसाइलो पर रूस की नजर। 70 साल से बचे आयुध भंडार पर है निगाहें। केएन 70 मिसाइल बनी चर्चा का केंद्र।

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Russian President Vladimir Putin and North Korea Kim Jong Un meets know about weaponary amid Ukraine War
पुतिन-किम जोंग उन - फोटो : Social Media

विस्तार

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग-उन की मुलाकात के बाद पश्चिमी देशों से लेकर दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में हलचल मची शुरू हो गई है। रक्षा मामलों के जानकारों से लेकर विदेशी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और उत्तर कोरिया की मुलाकात में सबसे बड़ी डील की चर्चा उन हथियारों की हुई जो कि उत्तर कोरिया में 70 साल से दबे पड़े हैं।
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दरअसल, 1953 के बाद उत्तर कोरिया ने अब तक ऐसा कोई बड़ा युद्ध या जंग नहीं लड़ी, जिससे उसके आयुध भंडार पर बड़ा असर पड़ा हो। जानकारों का मानना है कि इस मुलाकात के बाद रूस और उत्तर कोरिया के बीच में बड़ी बैलिस्टिक मिसाइल के साथ-साथ गोला-बारूद के लेन-देन सहमति बनती नजर आई है। पश्चिमी देशों को डर इस बात का सता रहा है कि कहीं उत्तर कोरिया का गोला बारूद एक बार फिर से यूक्रेन पर बड़े संकट के तौर पर सामने न आ जाए।
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रक्षा मामलों के जानकार लेफ्टिनेंट कर्नल जितेंद्र उनियाल कहते हैं पुतिन और उत्तर कोरिया के तानाशाह की मुलाकात कई मामलों में बेहद महत्वपूर्ण है। दरअसल, इस पूरी मुलाकात के पीछे का मकसद हथियारों की उन आपूर्ति की है जो की उत्तर कोरिया के अपने आयुध भंडार में सालों से दबे पड़े हैं। लेफ्टिनेंट कर्नल कहते हैं कि जिस तरीके से समूची दुनिया ने रूस के ऊपर प्रतिबंध लगाया है उसी तरीके से उत्तर कोरिया पर भी बीते कई दशकों से दुनिया के बड़े-बड़े देशों ने अलग-अलग तरीके की सेंसरशिप लगाई हुई है। इसका असर परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सीधे दोनों मुल्कों पर पड़ रहा है। क्योंकि रूस लगातार यूक्रेन पर हमलावर है और उसका अपना आयुध भंडार भी कम होता हुआ दिख रहा है। ऐसे में उत्तर कोरिया की ओर से अगर रूस को बड़े हथियारों की खेप मिल जाती है तो उसको अपने युद्ध को और आगे बढ़ाने में आसानी होगी। 
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हथियारों के साथ इन क्षेत्रों पर भी हुई चर्चा
विशेषज्ञों का मानना है कि यही वजह है कि पूरी दुनिया की निगाहें इस मुलाकात पर लगी हुई थी। लेफ्टिनेंट कर्नल उनियाल कहते हैं कि वैसे तो इस मुलाकात के दौरान रूस और उत्तर कोरिया के बीच में स्पेस साइंस और डिफेंस पर चर्चा हुई है। लेकिन रूस को अपनी जरूरत के मुताबिक उत्तर कोरिया से डिफेंस टीम पर ज्यादा रुचि दिखाई दी। वह कहते हैं कि इस पूरी मुलाकात के दौरान जो सबसे महत्वपूर्ण बात निकलकर सामने आई है वह यह है कि उत्तर कोरिया रूस को अपनी बैलिस्टिक मिसाइल केएन-25 देने पर सहमति बनती हुई नजर आ रही है। उनका कहना है कि इस मिसाइल के साथ-साथ दोनों देशों के बीच में भारी मात्रा में गोला बारूद और अन्य सैन्य उपकरणों की भी डील होने की बात कही जा रही है।

तो क्या उत्तर कोरिया के पास हैं रूस को सौंपने लायक हथियार?
उत्तर कोरिया में बीते 70 सालों में कोई ऐसा बड़ा युद्ध नहीं हुआ है जिससे उसके आयुध भंडार में मिसाइल गोला बारूद और अन्य सैन्य उपकरणों में कमी हुई हो। वह कहते हैं रणनीतिक रूप से रूस इस फिराक में है कि उसको अगर उत्तर कोरिया से भारी मात्रा में यह गोला बारूद मिले तो वह अपने कम पड़ रहे रक्षा संसाधनों की पूर्ति कर सकेगा। हालांकि, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर और विदेशी मामलों के जानकार अभिषेक प्रताप सिंह कहते हैं कि उत्तर कोरिया इस वक्त इस स्थिति में नहीं है कि वह आयुध भंडार से गोला बारूद या अन्य हथियारों को रूस को सौंप सके। इसके पीछे उनका तर्क है कि जिस तरीके से अंतरराष्ट्रीय स्तर का दबाव उत्तर कोरिया पर बना हुआ है उससे वह अपने बचाव के लिए किसी अन्य देश पर बहुत निर्भर नहीं रहना चाहेगा। हालांकि पुतिन और किम जोंग की मुलाकात में दोनों देशों के बीच में अंतरिक्ष और रक्षा मामलों के विस्तार पर चर्चा हुई है।


केएन-25 मिसाइलों की सबसे ज्यादा चर्चा क्यों?
रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि जिस केएन 25 मिसाइल की बात रूस और उत्तर कोरिया की मुलाकात के दौरान सबसे ज्यादा हो रही है। दरअसल, यह मिसाइल अपनी मारक क्षमता के लिए मशहूर है। लेफ्टिनेंट कर्नल उनियाल बताते हैं कि 2020 में जब इस मिसाइल का परीक्षण हुआ था तो महज 20 मिनट में ढाई सौ किलोमीटर दूर जाकर सटीक निशाने पर हमला किया था। यही वजह है कि इस मुलाकात के दौरान उत्तर कोरिया की केएन-25 मिसाइल की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। कहां जा रहा है कि इसी मिसाइल की डील पर दोनों देश राजी हो गए हैं। विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि अगर दोनों देशों के बीच में इस तरीके की डील आखिरी मुकाम पर पहुंच जाती है तो विदेशी हथियारों के मामले में बड़ी डील मानी जाएगी। इसका असर यूक्रेन में चल रहे युद्ध पर सीधे तौर पर देखने को मिल सकता है।
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