{"_id":"611fa119fcc8552e9f40f607","slug":"russia-has-made-it-clear-that-it-has-no-intention-of-sending-its-troops-to-afghanistan","type":"story","status":"publish","title_hn":"अफगानिस्तान: रूस का अभी भी कायम है ‘राजनीतिक-राजनयिक’ तरीकों पर भरोसा","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
अफगानिस्तान: रूस का अभी भी कायम है ‘राजनीतिक-राजनयिक’ तरीकों पर भरोसा
Fri, 20 Aug 2021 06:03 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 20 Aug 2021 06:03 PM IST
सार
रूस में रहने वाले अफगान समुदाय की संस्था के नेता गुलाम मोहम्मद जलाल ने एक न्यूज एजेंसी से बातचीत में कहा कि अफगानिस्तान लोग रूस की तरफ देख रहे हैं। उनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो रूस में पनाह लेना चाहते हैं...
विज्ञापन
रूसी सेना
- फोटो : Agency (File Photo)
विस्तार
रूस ने ये साफ कर दिया है कि उसका अफगानिस्तान में अपनी फौज भेजने का कोई इरादा नहीं है। साथ ही उसने अफगानिस्तान की सीमा से लगे मध्य एशियाई देशों में भी अपनी सेना भेजने की संभावना से इनकार किया है। रूस ने कहा है कि ऐसे कदम उठाने के बजाय वह राजयनिक संपर्कों पर ध्यान केंद्रित रखेगा। रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव निकोलाई पेत्रुशेव ने मास्को से प्रकाशित होने वाले अखबार इजवेस्तिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा- सेना भेजने के बजाय रूस अपने सहयोगियों के साथ मिल कर काम करेगा। रूस की समझ है कि मुख्य रूप से राजनीतिक और राजनयिक प्रयासों से ही अफगानिस्तान की समस्याओं का शांतिपूर्ण हल निकल सकता है।
विज्ञापन
काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद रूस काफी समय तक चुप रहा। इस बीच कई हलकों से उससे गुजारिश की गई कि वह अफगानिस्तान से बाहर निकलने के लिए बेसब्र लोगों की मदद करे। रूस में रहने वाले अफगान समुदाय की संस्था के नेता गुलाम मोहम्मद जलाल ने एक न्यूज एजेंसी से बातचीत में कहा कि अफगानिस्तान लोग रूस की तरफ देख रहे हैं। उनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो रूस में पनाह लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी संस्था काबुल हवाई अड्डा बंद होने और दूसरी कई वजहों से वैसे लोगों की कोई मदद नहीं कर पा रही है। जलाल ने दावा किया कि जो लोग अफगानिस्तान से निकलना चाहते हैं, उनमें वहां मौजूद रूस के नागरिक भी हैं।
विज्ञापन
इस बीच रूसी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक रूस सरकार ने अपने राजनयिकों और नागरिकों को भरोसा दिया है कि उन्हें अफगानिस्तान से जल्द से जल्द निकालने की कोशिश की जाएगी। इसी सिलसिले में ये अनुमान लगाया जा रहा था कि रूस भी अपने लोगों को निकालने को लिए उसी तरह सेना काबुल भेज सकता है, जैसा अमेरिका ने किया है।
विज्ञापन
इसके अलावा अफगानिस्तान की सीमा से लगे मध्य एशियाई देश- ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान डरे हुए हैं। उन्हें बड़ी संख्या में शरणार्थियों के वहां पहुंचने के साथ-साथ इस्लामी चरमपंथियों की घुसपैठ का भी अंदेशा है। इन देशों के कुछ हलकों से ये मांग उठी है कि रूस अपनी फौज वहां भेजे, ताकि वहां हालात को काबू में रखा जा सके। ये तमाम देश सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (सीएसटीओ) के सदस्य हैं, जिसे रूस की पहल पर बनाया गया है।
इन मांगों को रूस के उप विदेश मंत्री अलेक्सांद्र पैन्किन ने ठुकरा दिया। उन्होंने मास्को में पत्रकारों से कहा कि फौज भेजने की किसी संभावना पर विचार नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि रूस की घटनाओं की वजह से मध्य एशियाई देशों में अशांति पैदा होने के अभी कोई संकेत नहीं मिले हैं। लेकिन उन्होंने कहा- ‘ईश्वर ना करे, लेकिन वैसी स्थिति पैदा हुई, तो रूस बड़े कदम उठा सकता है।’
रूस ने तालिबान के काबुल पर कब्जे के बावजूद अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के विपरीत वहां अपना दूतावास खोल रखा है। बताया जाता है कि रूस सरकार के अधिकारी दूतावास की सुरक्षा पर बातचीत करने के लिए तालिबान से संपर्क कर चुके हैं। हाल के समय में रूस ने अफगानिस्तान मसले का शांतिपूर्ण हल निकालने के लिए कई वार्ताओं की मेजबानी की थी। इसके बावजूद तालिबान रूस की आतंकवादियों की लिस्ट में बना हुआ है। रूस ने कहा है कि फिलहाल इसे बदलने का उसका कोई इरादा नहीं है। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद क्या तय करता है, उसे देखने के बाद ही इस बारे में सोचा जाएगा।