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वैक्सीन निर्यात में रूस और चीन की बढ़त से यूरोप में छाई चिंता, जानें WHO ने क्यों बोला ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’?

Wed, 03 Mar 2021 02:56 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 03 Mar 2021 02:56 PM IST
सार

चीन और रूस ने कम आय वाले देशों से संपर्क करने में तेजी दिखाई। उन देशों को दूसरे स्रोतों से 2023 के पहले वैक्सीन प्राप्त होने की संभावना नहीं थी। इसलिए उन्होंने चीन और रूस की वैक्सीन को तुरंत हरी झंडी दे दी...

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Russia and China start the export of their vaccines, many countries of the European Union also raised demand for these vaccines
sputnik v - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

दूसरे देशों को कोरोना वायरस की वैक्सीन मुहैया कराने में अमेरिका और यूरोप की नाकामी का असर यह हो रहा है कि छोटे और गरीब देश इसके लिए रूस और चीन पर निर्भर होते जा रहे हैं। हाल में रूस और चीन ने अपने यहां बने टीकों का निर्यात और तेज कर दिया है। यूरोपीय मीडिया में इसको लेकर चिंता जताई जा रही है। खास चिंता इस बात को लेकर है कि यूरोपियन यूनियन (ईयू) के कई सदस्य देश भी रूसी और चीनी वैक्सीन की तरफ झुक गए हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि चीन में कोरोना वायरस संक्रमण पर जल्द काबू पा लिए जाने के कारण चीन अपने यहां तैयार टीकों के बड़े पैमाने पर निर्यात में सक्षम हो गया। उसने दुनिया के तमाम हिस्सों में अपने वैक्सीन भेजी हैं। रूस भी उदार शर्तों पर वैक्सीन मुहैया करा रहा है।
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जानकारों का कहना है कि इससे हजारों जिंदगियां बचाने में मदद मिलेंगी। लेकिन साथ ही इससे दुनिया में इन दोनों देशों का प्रभाव बढ़ेगा, जो अमेरिका और यूरोप के लिए अच्छी खबर नहीं है। गौरतलब है कि यूरोपीय देश पोलैंड भी अब चीनी टीकों को हरी झंडी देने पर विचार कर रहा है।   
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एक ताजा आकलन के मुताबिक चीन और रूस ने कम आय वाले देशों से संपर्क करने में तेजी दिखाई। उन देशों को दूसरे स्रोतों से 2023 के पहले वैक्सीन प्राप्त होने की संभावना नहीं थी। इसलिए उन्होंने चीन और रूस की वैक्सीन को तुरंत हरी झंडी दे दी। रूस और चीन ने इसके तुरंत बाद निर्यात शुरू भी कर दिया। चीन अब तक 20 से ज्यादा देशों को वैक्सीन भेज चुका है। इनमें दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के देश भी शामिल हैं।

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल को चीनी विदेश मंत्रालय ने बताया है कि चीन की योजना 40 और देशों को वैक्सीन भेजने की है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन ने इथोपिया सहित कई अफ्रीकी देशों में स्थानीय पार्टनर्स के साथ मिल कर कोल्ड स्टोरेज चेन का ढांचा बनाने में मदद दी है, ताकि वैक्सीन के डोज को वहां रखने और वितरित करने में सहायता मिल सके।

उधर दो दर्जन देशों ने रूस की स्पुतनिक वैक्सीन के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है। उनमें से लैटिन अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के कई देशों को वैक्सीन की खेप पहुंच भी चुकी है। कुछ देशों में इसके जल्द पहुंचने की संभावना है। उनके अलावा स्लोवाकिया, हंगरी आदि जैसे यूरोपीय देश भी रूसी वैक्सीन को मंजूरी दे चुके हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि चीन में बनी वैक्सीन अमेरिका और यूरोप में बनी वैक्सीन जितनी प्रभावी नहीं हैं। लेकिन उन्हें रखने के लिए अति ठंडे माहौल जरूरत नहीं होती। इसलिए उन्हें ले जाना और देश के अंदर उनका वितरण आसान हो जाता है। पिछले हफ्ते चीन ने दो और वैक्सींस को हरी झंडी दे दी। इस तरह चीन में बनी वैक्सीन्स की संख्या चार हो गई है। जिन दो वैक्सीन्स को ताजा मंजूरी मिली है, उनमें से एक के सिर्फ एक डोज को लेने की जरूरत होगी।

लेकिन देश के अंदर टीकाकरण का लक्ष्य पूरा करने में चीन पिछड़ा हुआ है। पिछली नौ फरवरी तक चीन में सिर्फ चार करोड़ टीके लगाए गए थे। जबकि उस समय तक के लिए तय लक्ष्य के मुताबिक दस करोड़ टीके लग जाने चाहिए थे। अब एक चीनी विशेषज्ञ ने मीडिया को बताया है कि चीन जून के अंत तक अपनी 40 फीसदी आबादी को ही टीका लगा पाएगा।

दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोपीय देशों का जोर पहले अपने नागरिकों को टीका लगाने पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने साफ कहा है कि अमेरिका पहले अपने नागरिकों को टीका लगाने के बाद ही दूसरे देशों को इसका निर्यात करेगा। ईयू ने जनवरी के आखिर में ही वहां निर्मित टीकों के निर्यात पर सीमित प्रतिबंध लगा दिए थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसकी ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ कह कर आलोचना की है।


पश्चिमी मीडिया में छप रही रिपोर्टों के मुताबिक दुनिया में टीकाकरण के क्षेत्र में रूस और चीन ने जो बढ़त हासिल की है, मुमकिन है कि कम समय की कहानी साबित हो। जब अमेरिका और यूरोप में वैक्सीन के उत्पादन में इजाफा होगा, तो संभव है कि पश्चिमी वैक्सीन का दुनिया में अधिक प्रसार हो जाए।

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