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कैसे काम करता है तालिबान का हाईकमान?

Sat, 07 Nov 2015 03:39 PM IST
Updated Sat, 07 Nov 2015 03:39 PM IST
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taliban structure in afghanistan

जुलाई में तालिबान के संस्थापक नेता मुल्ला मोहम्मद उमर की मौत की घोषणा के बाद उनकी जगह लेने वाले नए नेता मुल्ला अख़्तर मोहम्मद मंसूर को लेकर संगठन में अब एक राय क़ायम हो गई है।

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उमर की मौत की घोषणा के बाद मुल्ला मंसूर को तुरत फ़ुरत अमीर उल-मुमीनीन यानी कमांडर बना दिया गया था, जिसका मुल्ला उमर के कुछ वफ़ादारों ने विरोध किया था। नए अमीर की मुख़ालफ़त मुख्य रूप से मुल्ला उमर के भाई और उनके सबसे बड़े बेटे ने की थी। लेकिन आख़िरकार इन दोनों ने मुल्ला मंसूर के प्रति वफ़ादारी की घोषणा कर दी है।
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पिछले सप्ताह किसी अज्ञात जगह से तालिबान के प्रवक्ता ज़ूबिउल्लाह मुजाहिद ने बीबीसी को बताया था, “मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला याक़ूब और उनके भाई मुल्ला मानन ने एक समारोह के दौरान नए नेता के प्रति अपनी वफ़ादारी जताई है और अब आंदोलन एकीकृत तरीक़े से जारी रहेगा।”
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हाल के कुछ सप्ताहों में इस दरार को पाटने के लिए तालिबान के लड़ाके, कमांडर और मौलवियों की कई बार पाकिस्तान में आना-जाना हुआ है। अफ़ग़ानिस्तान के पास स्थित क्वेटा शहर से आई ख़बरों के अनुसार, मस्जिदों, मदरसों, घरों में कई बैठकें हुईं। लेकिन अब भी कुछ वरिष्ठ तालिबान नेता मंसूर का साथ न देने और अलग से संगठन चलाने और हमलों को जारी रखने की धमकी दे रहे हैं।

साल 2001 में सत्ता से हटने से पहले तक तालिबान विदेश मंत्रालय में काम करने वाले काबुल के विशेषज्ञ वहीद मोजहदा कहते हैं कि संगठन को अहसास हो गया है कि अस्तित्व बनाए रखने के लिए एकता बहुत अहम है। वो कहते हैं, “वो जानते हैं कि दुश्मन उनसे ज़्यादा ताक़तवर है और अगर मतभेद बना रहा तो वो साफ हो जाएंगे।”

अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिकी विशेषज्ञ बर्नेट रुबिन का कहना है कि तालिबान के सदस्य एक समान विचारधारा से जुड़े हुए हैं और यही उनमें विभाजन को रोकती है। उन्होंने कहा, “हर कोई अमीर के आदेशों को मानता है। संगठन में अलग राय रखने वाले भी होते हैं लेकिन जब वो संगठन छोड़ देते हैं या उन्हें बाहर कर दिया जाता है तो उनका प्रभाव भी ख़त्म हो जाता है।”

संगठन का ढांचा

taliban structure in afghanistan

अमीर के रूप में बहुत ही अनुशासित सांगठनिक ढांचे को मुल्ला मंसूर अपने दो उप प्रमुखों के साथ संभालते हैं। इनमें से एक हैं हक्कानी नेटवर्क के सिराज़ुद्दीन हक्कानी। ये वही संगठन है जिसने अफ़ग़ानिस्तान के अंदर कई ख़तरनाक़ हमले किए हैं।

सिराज़ुद्दीन हक्कानी की गिरफ़्तारी के लिए अमरीका ने 50 लाख डॉलर का ईनाम घोषित कर रखा है। इसके नीचे के पायदान पर 18 सदस्यों वाली एक नेतृत्व परिषद होती है जिसे 'रहबरी शूरा' कहते हैं।

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रहीमुल्ला यूसुफ़जई के मुताबिक़, मुल्ला मंसूर के नेतृत्व में परिषद के सदस्यों की संख्या 21 तक बढ़ाई जा रही है। यूसुफ़जई के मुताबिक़, इसका सारा नेतृत्व अफ़ग़ानिस्तान के पख़्तून जनजातीय समूहों से है।

वो कहते हैं, इनमें से केवल दो सदस्य गैर पख़्तून हैं- उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान से एक ताज़िक और एक उज्बेक। बाकी सदस्य कंधार, उरूज़गान और हेलमंद प्रांत से हैं, जिसे तालिबान का गढ़ कहा जाता है।

सांगठनिक ढांचा क्‍या है?

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परिषद क़रीब एक दर्जन आयोगों को देखती है जो कि तालिबान के मंत्रालय हैं। प्रतिष्ठित अफ़ग़ानिस्तान एनालिस्ट नेटवर्क से जुड़े बुरहान उस्मान के मुताबिक़, सैन्य आयोग सबसे महत्वपूर्ण है जो हमलों को संचालित करता है।

“सैन्य आयोग के मुखिया की हैसियत किसी देश के रक्षा मंत्री के बराबर है।” उस्मान के मुताबिक़, ज़मीनी हमलों को स्थानीय कमांडरों और अफ़ग़ानिस्तान के अलग अलग प्रांतों में मौजूद शैडो गवर्नरों के द्वारा चलाया जाता है। इसके साथ ही तालिबान क़तर में एक राजनीतिक आयोग भी चलाता है, जिसपर शांति वार्ताओं को चलाने की ज़िम्मेदारी है।

ऐसा माना जाता है कि नेतृत्व पाकिस्तान में है और कमांडर और लड़ाकू इकाइयां पूरे अफ़ग़ानिस्तान में फैली हैं इसलिए संचार क़ायम करना एक बड़ी चुनौती है।

बीबीसी उर्दू के इस्लामाबाद ब्यूरो के संपादक हारून रशीद कहते हैं, “सूचना के आदान प्रदान का सबसे सुरक्षित तरीक़ा है ज़बानी शब्द या चिठ्ठियां। मैंने उत्तरी वज़ीरिस्तान के मुख्य शहर मीरानशाह में ऐसी कुछ चिट्ठियां देखी हैं, जिनसे ये लगता है कि संचार का यही सबसे लोकप्रिय तरीक़ा है।”

तालिबान का कोई स्थाई ढांचा नहीं

taliban structure in afghanistan

“हालांकि प्रांतीय शैडो गवर्नर खुद कमांडरों से बात नहीं कर सकते हैं लेकिन उनके सहयोगी फ़ोन पर कूट भाषा में उनसे बात कर सकते हैं या वॉकी टॉकी इस्तेमाल कर सकते हैं।” तालिबान नेतृत्व परिषद के लिए ‘क्वेटा शूरा’ जैसे इस्तेमाल होने वाले नामों से लगता है कि ये किसी ख़ास जगह पर स्थित हैं लेकिन बुरहान उस्मान कहते हैं कि ये मुख्यालय की बजाय एक तंत्र के नाम हैं।

उस्मान के मुताबिक़, वो एक समय अपने किसी सदस्य या समर्थक के घर मिलते हैं और दूसरे दिन दूसरी जगह या दूसरे क़स्बे में होते हैं। हारून रशीद भी इससे सहमत हैं कि तालिबान का कोई स्थाई ढांचा नहीं है।

वो कहते हैं कि वो बहुत कम चीजों के साथ रहते हैं और हमेशा जगह बदलते रहते हैं। पाकिस्तान की मस्जिदें और मदरसे गतिविधियां संचालित करने की उनकी पसंदीदा जगहें हैं।

तालिबान परंपरागत तौर पर खाड़ी के देशों में मौजूद समर्थकों के चंदे पर भरोसा करते हैं लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ये स्रोत काफी सिकुड़ चुका है। बर्नेट रुबिन कहते हैं, “अफ़गानिस्तान के अंदर तालिबान की आय का मुख्य स्रोत उगाही रैकेट, टोल, रिश्वत, टैक्स या व्यावसाय और यातायात से वसूली हैं।” वो कहते हैं कि कुछ तालिबान सदस्यों का यूएई, क़तर और सउदी अरब में अपना बिजनेस है।

रुबिन के मुताबिक़, “हक्कानी का पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और फ़ारस की खाड़ी में बड़ा व्यावसायिक नेटवर्क है, जिसमें शहद की बिक्री भी शामिल है। इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान में अफ़ीम की खेती से होने वाली आमदनी और उगाही भी आय का एक बड़ा स्रोत है।” अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय संसाधन भी तालिबान के काम आ रहे हैं।

तालिबान के पूर्व अधिकारी वहीद मोज्हदा कहते हैं कि पिछले साल ही संगठन ने खनन को अपनी विशेष वित्तीय शाखा में शामिल किया है। “इस कमेटी ने तालिबान के नियंत्रण वाली खानों को लीज़ पर दिया है।”

तालिबान लड़ाकों के बीच लड़ाइयों की भी ख्‍ाबरें

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अफ़ग़ानिस्तान की सरकार लगातार पाकिस्तान पर तालिबान का समर्थन करने का आरोप लगाती रही है लेकिन इस्लामाबाद इसका खंडन करता है। हारून रशीद कहते हैं, “पाकिस्तान का अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान पर प्रभाव और संपर्क को लेकर शायद ही कभी खंडन किया गया हो।” बर्नेट रुबिन कहते हैं कि इस दावे में दम है कि तालिबान के साथ आईएसआई का क़रीबी संबंध है।

वो कहते हैं, “यह पूरी तरह संभव है कि तालिबान की अधिकांश गतिविधियां आईएसआई या उसके कांट्रैक्टर्स द्वारा सीधे संचालित की जाती रही हैं। 1994 से 2001 के बीच ऐसा ही होता था।” रुबिन के अनुसार, “पाकिस्तान अपने इस प्रभाव का इस्तेमाल कर अफ़ग़ानिस्तान में भारत या पख़्तूनिस्तान सरकार को जमने नहीं देना चाहता।”

सहयोगी और विरोधी
पाकिस्तान ख़ुद ही अपने देश में तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और अल क़ायदा के अन्य ग्रुपों की हिंसा से जूझ रहा है। जानकारों का कहना है कि हालांकि टीटीपी और अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान के बीच संपर्क है लेकिन बहुत व्यावहारिक सहयोग कम ही है। बुरहान उस्मान के मुताबिक़।, “’टीटीपी ने मुल्ला उमर के प्रति वफ़ादारी जताई थी जो अपने आप अख़्तर मंसूर को हासिल होने वाली है।”

लेकिन यह एक प्रतीकात्मक एकता है। टीटीपी का सांगठनिक ढांचा, विचारधारा, लक्ष्य, तंत्र सब अलग है। यह अल क़ायदा से ज़्यादा मिलता जुलता है। अफ़ग़ानिस्तानी तालिबान का सबसे संभावित प्रतिद्वंद्वी वो ग्रुप है जिसने इस्लामिक स्टेट के प्रति वफ़ादारी घोषित की है, लेकिन जानकारों का कहना है कि ये मुख्य रूप से असंतुष्ट लड़ाके हैं।

इसके अलावा अमीर के अधिकार को कुछ और लोग चुनौती दे रहे हैं। इनमें सबमें प्रमुख हैं दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के फ़ील्ड कमांडर मुल्ला मंसूर ददुल्लाह। उन्होंने नए नेता पर पाकिस्तान की कठपुतली होने का आरोप लगाया है। उनके समर्थकों और मुख्य धारा के तालिबान लड़ाकों के बीच लड़ाइयों की भी ख़बरें हैं। बुरहान उस्मान का मानना है कि इसके बावजूद तालिबान की ताक़त में कमी होने के कोई संकेत नहीं हैं।

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