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मैंने तालिबान को कैसे दिया चकमा

Sun, 30 Jun 2013 02:26 PM IST
Updated Sun, 30 Jun 2013 02:26 PM IST
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taliban afghanistan pierre borghy

चार महीने तालिबान की कैद में। वो भी ज़मीन के नीचे एक गड्ढे में बंद। ठीक से खाना न मिलने से वज़न कम हुआ और इसी से मिला एक मौका बचकर भाग निकलने का। ये कहानी किसी फिल्म की नहीं है, फ़्रांसीसी राहतकर्मी और नवोदित फोटोग्राफर पिएरे बोर्घी की है। सुनिए उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी:

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पिछले साल 27 नवंबर की शाम तालिबान ने मेरा अपहरण कर लिया था।

उस दिन काबुल में न कोई धमाका हुआ, न गोलीबारी और न ही कोई तनाव की स्थिति थी। मैं बाज़ार गया था। मैंने वहां नूडल्स खरीदे और रात को शांति से एक फिल्म देखने की योजना बना रहा था।
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मैं दूसरी बार अफगानिस्तान आया था और इस बार यह मेरा दूसरा हफ्ता था। मैं मानवीय सहायता या फिर शहरी विकास से जुड़ा कोई काम तलाश रहा था और बीच बीच में फोटोग्राफी पर भी हाथ आज़मा रहा था।
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मैं 'द वेन्यू' नाम के एक बार से वापस आ रहा था जो सुरक्षित माने जाने वाले काबुल के क़ला-ए-फतुलाह इलाके में है। यहाँ से केवल 500 दूरी पर मैं रह रहा था। मैंने सोचा ही नहीं था कि पांच-दस मिनट के लिए बाहर रहने में इतना खतरा होगा।

यहीं मैं गच्चा खा गया

मेरे सामने कुछ मीटर की दूरी पर एक सफ़ेद टोयोटा गाड़ी आकर रुकी। उसमे से चार दाढ़ी वाले आदमी उतर कर मेरी ओर बढ़े। वो सलवार कमीज़ पहने हुए थे।

उन्होंने मुझे पकड़ कर गाड़ी में ले जाने की कोशिश की। मैं उनसे भिड़ा तो एक आदमी ने बंदूक निकाल ली। मैं रुक गया।
pierre borghyउन्होंने मुझे गाड़ी की पिछली सीट पर पटका। हम सभी संभावित सुरक्षा नाकों से गुज़रे। कुछ देर बार उन्होंने मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी। मेरे हाथ मेरी पीठ के पीछे बाँध कर मुझे एक अपहरणकर्ता के साथ डिक्की में बंद कर दिया गया।

मैं खुद को डर से बहार निकालने और समझदारी से काम लेने की कोशिश कर रहा था।

कुछ और घंटों तक गाड़ी चलने के बाद उन्होंने मुझे ज़मीन में बने दो गड्ढों में से एक में डाल दिया। दोनों में से यह ठीक था क्योंकि उसमे मुझे थोड़ी रोशनी और जगह मिल रही थी।

उन्होंने कहा कि वो अल- क़ायदा से हैं, तालिबान हैं। उन्होंने कहा कि उनकी मुझसे कोई दुश्मनी नहीं है। उन्होंने कहा कि मुझे इसलिए उठाया गया है क्योंकि मैं पश्चिम से हूँ और मेरा देश अफगानिस्तान में जारी लड़ाई में शामिल है।

अपने बारे में जानकारी लिखने का लिए मुझे कागज़ का एक टुकड़ा दिया गया। मेरी पृष्ठभूमि की जांच के लिए इसे तालिबान 'कैबिनेट' से पास किया जाना था। वह यह जांचना चाहते थे की कहीं मैं विशेष बलों का हिस्सा तो नहीं हूं या फिर कोई जासूस या कूटनीतिज्ञ तो नहीं हूं। इनमें से कोई भी होने पर मुझे तुरंत मार दिया जाता।

मेरी इच्छा सूची


इसके बाद मैं एक कागज़ पर वह सब इच्छाएं लिखा करता था जो मैं आज़ाद होने के बाद करना चाहता था। इस कागज़ को मैंने अपनी कैद के दौरान पूरे समय अपने साथ रखा।

मैंने कागज़ पर शतरंज की बिसात भी बनाई थी। इसे खेलते हुए मैं अपना समय काटा करता था।

10 दिन बाद उन्होंने मुझसे कहा कि वो काबुल ले जा कर मुझे रिहा करने वाले हैं।

pierre borghyउन्होंने मुझे गड्ढे से निकाला, मेरे हाथ मेरी पीठ के पीछे बांधे और फिर से मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी। मुझे एक मोटरबाइक पर बिठाया गया लेकिन मुझे शहर ले जाने की बजाय उबड़ -खाबड़ रास्तों पर, नदियों के ऊपर से होते हुए, पहाड़ों में ले जाया गया। पहले भी मैंने मोटरबाइक की सवारी की थी लेकिन इतनी दिलचस्प कभी नहीं रही।

मुझ पर नज़र रखने के लिए दो बंदूकधारी भी थे।

हम साथ खाते थे, साथ सोते थे, उनके फ़ोन पर साथ में वीडियो देखते थे, मैंने उन्हें ताश खेलना भी सिखाया। हम घंटों तक साथ में ताश खेलते रहते थे। लेकिन एक ऐसे लड़के के साथ ताश खेलना बहुत निराशाजनक था जो किसी भी समय तुम्हारे सिर में गोली उतार सकता हो, ख़ास कर जब वो खेल में बेईमानी कर रहा हो।

इसके बाद मुझे उन्होंने एक कोठरी में ज़मीन में बने बहुत संकरे गड्ढे में दाल दिया। इसमें मैं ना सीधा लेट सकता था और ना ही खड़ा हो सकता था। मेरे पास शौच के लिए तीन लीटर की एक बाल्टी थी। उसमे घुप्प अँधेरा था।

मुझे उसमे अगले साढ़े तीन महीनों तक रखा गया। मुझे केवल तीन या चार बार फिरौती वीडिओ बनाने के लिए बाहर निकाल गया। मेरे हाथ और पाँव में बेड़ियाँ थीं। समय का बीतना केवल कभी कभी बाहर की आवाजों से पता चलता था।

कैसे बिताया समय?


चूंकि मैं एक प्रशिक्षित शहरी योजनाकार था, मैंने मानसिक रूप से विस्तृत लेखों की परियोजनाएं बनाई, किताबों, घरों और शहरों की रूपरेखा बनाईं।

जब मैं भूखा था तो मैंने खाने के बारे में सोचा, मैंने ख्यालों में ही कुछ व्यंजन विधियाँ तैयार कीं, जिन्हें आज जब मेरे दोस्त घर आते हैं तो मैं बनाने की कोशिश करता हूँ। मैंने थोड़ी प्रार्थना भी की।

मुझे बाँधने के लिए जो बेड़ियाँ थी, वो इतनी ढीली थीं की मैं उनमें से एक पैर और एक हाथ निकाल सकता था। उस चोर दरवाज़े पर ताल नहीं लगा था और मैंने कोठरी में जाना शुरू कर दिया। मैंने यह उम्मीद पालनी शुरू कर दी थी कि शायद मैं यहाँ से भाग सकता हूँ।

लेकिन अफगानिस्तान में सर्दियाँ ना केवल खामोश होती हैं बल्कि बहुत ठंडी भी होती हैं। इस देश के मेरे अनुभव ने मुझे बताया कि अगर मैं रात को सैंडल और गर्मियों के कपड़े पहन कर भागने में कामयाब भी हो जाऊं तो मैं एक जमी हुई लाश बन जाऊँगा। इसलिए मैंने इंतजार किया।

pierre borghy28 मार्च की सुबह को मुझे एक और वीडियो बनाने के लिए बाहर निकाला गया।

उस 10 मिनट के दौरान मुझे बताया गया कि चूंकि फ़्रांस तालिबान की मांगें पूरी नहीं कर रहा है इसलिए अगले कुछ दिनों में मुझे मार दिया जाएगा। मुझे मेरे परिवार के कुछ पत्र दिखाए गए और दुबारा गड्ढे में डाल दिया गया।

मैं उस समय सबसे ज्यादा हताश हो गया था।

अब और इंतजार नहीं

मैंने सोचा कि मैं अब एक और दिन भी इंतज़ार नहीं कर सकता। उस कोठरी में ज़मीन से तीन मीटर ऊपर एक छोटी खिड़की थी। 7 अप्रैल की रात को मैंने अपनी बेड़ी से निकलने की कोशिश की। वह अब भी मेरे एक हाथ और एक पैर से बंधी हुई थी। मैं एक पुराने फर्नीचर पर चढ़ कर किसी तरह वहां से बाहर झाँकने में कामयाब रहा।

बाहर मैंने सीधे हाथ पर कहीं दूर रोशनी झिलमिलाती देखी। अफगानिस्तान में सड़कों पर बहुत कम रोशनी होती है। मैंने अनुमान लगाया की यह किसी तरह का सेना का शिविर है।

मैंने खुद को सिकोड़ते हुए किसी तरह बाहर निकने की जद्दोजहद की। एक बार तो मैं फँस गया। उस समय मैं डर गया था। लेकिन थोड़ी और मशक्कत के बाद मैं बाहर झाड़ियों में गिर पड़ा। अगर 'तालिबान के खाने' की वजह से मैंने पिछले चार महीने में लभग 11 किलो वज़न कम नहीं किया होता तो मेरे लिए यह कर पाना कभी मुमकिन नहीं होता।

मैंने लडखडाते, गिरते रौशनी की तरफ बढ़ना शुरू किया।

मैं पास की सड़क की चौकी से गुज़रा। यह जानने का कोई तरीका नहीं था की वह चौकी तालिबान की है या सेना की। इसलिए मैंने सरकते हुए, चट्टानों के पीछे छुपते, पहाड़ की ओट लेकर आगे बढ़ना जारी रखा।

सारी रात चलने के बाद मैं एक बड़े शहर के पास आ पहुंचा था। सुबह का पहला पहर था और चारों तरफ अज़ान की आवाज़ गूँज रही थी। मेरे पैर थकान से चूर हो गए थे लेकिन मैं रुक नहीं सकता था।

वहां का चौकीदार मुझ पर चिल्लाया

फिर एक चौकीदार मिला।

'-कहाँ जा रहे हो ?'

-काबुल जा रहा हूँ

उसने अपनी ए के -47 मुझ पर तान दी। वह सोच रहा था कि इस सलवर कमीज़ पहने पागल जैसा दिखने वाले इंसान का क्या किया जाए जो फ़्रांसिसी होने का दावा कर रहा है और बढ़ी हुई दाड़ी में कह रहा है की वह तालिबान की कैद में था!

pierre borghyउसने अपने बड़े अधिकारी को बुलाया। वह एक जनरल था। जनरल ने अनुवादक को बुलाया। अनुवादक ने मुझसे सवाल पूछना शुरू किया। यह मेरी एक और पृष्ठभूमि जांच हो रही थी।

कुछ घंटे बाद मुझे काबुल ले जाया गया। चौकसी के लिए मिलिट्री जनरल साथ था। गाड़ी में बैठा मैं सोच रहा था कि कैसे तालिबान मुझे ढूंढ रहे होंगे। मैं खुद को मुस्कुराने से रोक ना सका।


शाम होते-होते मुझे फ़्रांसिसी अधिकारियों को सौंप दिया गया। वे मुझे सेना के अस्पताल ले गए।

चार महीने बाद नहाया

मां को फोन लगाया।

"हैल्लो माँ " मैंने कहा। माँ ने कहा कि ये उनकी जिंदगी का सबसे ख़ुशी भरा दिन था। तालिबान की क़ैद में मैं शायद ही कभी रोया हूं लेकिन माँ से बात करते हुए अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया।

मैं फ़्रांस के राजनयिकों से मिला। मुझे नहीं लगता कि कभी वो उन लोगों की मांग मानते हुए फिरौती देने को तैयार होते।

अब भी अफगानिस्तान के साथ मेरा कुछ जुड़ाव है। अगले कुछ सालों में थोड़ी शांति होने पर मैं शायद फिर वहां जाऊं।

तब तक मैं अपनी इच्छा सूची को पूरा करना चाहता हूँ। शुरुआत उस कागज़ पर उकेरी गई शतरंज की बिसात पर खेल सीखने से होगी। ज़िदगी ने मुझे कुछ और दिन बक्शे हैं। हर दिन मेरे लिए उपहार की तरह है। इस उपहार को जीने के लिए इससे अच्छी शुरुआत नहीं हो सकती -यह मेरी आज़ाद जिंदगी है।

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