{"_id":"59ca76ed4f1c1baa538b4852","slug":"somaliland-where-cash-is-going-extinct","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"इस देश में एक सिगरेट पीने के लिए आपको चुकाने होंगे पांच सौ रुपए ","category":{"title":"Rest of World","title_hn":"अन्य देश","slug":"rest-of-world"}}
इस देश में एक सिगरेट पीने के लिए आपको चुकाने होंगे पांच सौ रुपए
बीबीसी, हिंदी
Updated Tue, 26 Sep 2017 09:28 PM IST
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प्रतीकात्मक फोटो
- फोटो : MATTHEW VICKERY
सरकार देश की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाना चाहती है। डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दिया जा रहा है। लोगों को नकद लेन-देन से गुरेज करने को कहा जा रहा है। पिछले साल नवंबर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का एलान किया, तो उसका एक मकसद देश में नकद रहित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना था।
मगर, तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद हमारे देश में नकदी के प्रति लोगों का लगाव कम नहीं हुआ है। नोटों की कमी दूर होते ही नकद लेन-देन कमोबेश वापस उसी स्तर पर पहुंच गया है, जितना 8 नवंबर 2016 से पहले था।
रेशमी 'रूमाल' जिसे बुनने में लगते हैं 6 साल
हमारे यहां कैशलेस इकोनॉमी की सरकार की पुरजोर कोशिश भी नाकाम है। मगर, एक देश ऐसा भी जहां सरकार के बिना कोशिश किए हुए ही देश कैशलेस होता जा रहा है। ये देश न तो भारत की तरह तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। न ही तकनीकी क्रांति का गवाह। पर, इस देश के लोग आज 80 फीसद लेन-देन कैशलेस तरीके से कर रहे हैं।
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ठेला गाड़ी में लादकर लोग ले जाते हैं नोट
इस देश का नाम है सोमालीलैंड। उत्तरी अफ्रीका में अदन की खाड़ी के करीब स्थित सोमालीलैंड 1991 में सोमालिया से अलग होकर नया देश बना था। हालांकि अब तक किसी देश ने इसे मान्यता नहीं दी है। मगर करीब 40 लाख की आबादी वाला ये देश खुदमुख्तार जम्हूरियत का दावा करता है।
सोमालीलैंड बेहद गरीब देश है। यहां से सबसे बड़ा निर्यात ऊंटों का होता है। आधा इलाका रेतीला है। बाक़ी हिस्सा अक्सर सूखे का शिकार रहता है। नतीजा, सोमालीलैंड में भयंकर गरीबी है।
यहां की करेंसी शिलिंग है, जिसकी कोई औकात नहीं। एक अमेरिकी डॉलर के लिए आपको 9 हजार शिलिंग के नोट देने होंगे। सोमालीलैंड की शिलिंग के पांच सौ और हजार के नोट चलन में हैं। आप को एक सिगरेट भी लेनी होगी, तो पांच सौ या हजार का नोट चाहिए होगा। झोला भर सब्जी खरीदने के लिए झोला भरकर नोट ले जाने होंगे।
अगर सोमालीलैंड में किसी ने कहीं कोई गहना खरीदने की सोची तो उसे ठेला गाड़ी में लादकर शिलिंग के नोट ले जाने होंगे। आप ये जानकर हैरान होंगे कि यहां पर एक पहिए वाली ठेला गाड़ी खूब चलती है। राजधानी हर्गीशा के बाजारों में आप को अक्सर लोग ठेला गाड़ी पर नोट लादकर चलते हुए मिल जाएंगे।
मुद्रा के अवमूल्यन और करेंसी के रद्दी में तब्दील होने की वजह से सोमालीलैंड में ज्यादातर लोग कैशलेस लेन-देन करते दिखेंगे। आपको सिगरेट लेनी हो, यहां की प्रिय ड्रग खट लेनी हो, या फिर कपड़े-लत्ते। आप हर चीज का पेमेंट मोबाइल से कर सकते हैं।
सोमालीलैंड में आपको भिखारी भी मोबाइल से लेन-देन करते दिखेंगे। वजह ये है कि छोटी-मोटी खरीदारी के लिए भी आपको झोला भर कर नोट चाहिए। अब इतना पैसा लादकर कोई कहां तक चले? इसलिए सोमालीलैंड में आज अस्सी फीसद कारोबार कैशलेस हो गया है।
चाहे फुटपाथ पर सब्जी और कबाड़ बेचने वाला हो या फिर चमकती दुकानों में बैठे धन्ना सेठ। कहीं भी चले जाएं, सोमालीलैंड में आप को बस अपने मोबाइल से दुकानदार का मोबाइल नंबर और कोड दर्ज करना है। पैसे आपके अकाउंट से दुकानदार के खाते में चले जाएंगे।
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मगर, तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद हमारे देश में नकदी के प्रति लोगों का लगाव कम नहीं हुआ है। नोटों की कमी दूर होते ही नकद लेन-देन कमोबेश वापस उसी स्तर पर पहुंच गया है, जितना 8 नवंबर 2016 से पहले था।
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रेशमी 'रूमाल' जिसे बुनने में लगते हैं 6 साल
हमारे यहां कैशलेस इकोनॉमी की सरकार की पुरजोर कोशिश भी नाकाम है। मगर, एक देश ऐसा भी जहां सरकार के बिना कोशिश किए हुए ही देश कैशलेस होता जा रहा है। ये देश न तो भारत की तरह तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। न ही तकनीकी क्रांति का गवाह। पर, इस देश के लोग आज 80 फीसद लेन-देन कैशलेस तरीके से कर रहे हैं।
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ठेला गाड़ी में लादकर लोग ले जाते हैं नोट
इस देश का नाम है सोमालीलैंड। उत्तरी अफ्रीका में अदन की खाड़ी के करीब स्थित सोमालीलैंड 1991 में सोमालिया से अलग होकर नया देश बना था। हालांकि अब तक किसी देश ने इसे मान्यता नहीं दी है। मगर करीब 40 लाख की आबादी वाला ये देश खुदमुख्तार जम्हूरियत का दावा करता है।
सोमालीलैंड बेहद गरीब देश है। यहां से सबसे बड़ा निर्यात ऊंटों का होता है। आधा इलाका रेतीला है। बाक़ी हिस्सा अक्सर सूखे का शिकार रहता है। नतीजा, सोमालीलैंड में भयंकर गरीबी है।
यहां की करेंसी शिलिंग है, जिसकी कोई औकात नहीं। एक अमेरिकी डॉलर के लिए आपको 9 हजार शिलिंग के नोट देने होंगे। सोमालीलैंड की शिलिंग के पांच सौ और हजार के नोट चलन में हैं। आप को एक सिगरेट भी लेनी होगी, तो पांच सौ या हजार का नोट चाहिए होगा। झोला भर सब्जी खरीदने के लिए झोला भरकर नोट ले जाने होंगे।
अगर सोमालीलैंड में किसी ने कहीं कोई गहना खरीदने की सोची तो उसे ठेला गाड़ी में लादकर शिलिंग के नोट ले जाने होंगे। आप ये जानकर हैरान होंगे कि यहां पर एक पहिए वाली ठेला गाड़ी खूब चलती है। राजधानी हर्गीशा के बाजारों में आप को अक्सर लोग ठेला गाड़ी पर नोट लादकर चलते हुए मिल जाएंगे।
मुद्रा के अवमूल्यन और करेंसी के रद्दी में तब्दील होने की वजह से सोमालीलैंड में ज्यादातर लोग कैशलेस लेन-देन करते दिखेंगे। आपको सिगरेट लेनी हो, यहां की प्रिय ड्रग खट लेनी हो, या फिर कपड़े-लत्ते। आप हर चीज का पेमेंट मोबाइल से कर सकते हैं।
सोमालीलैंड में आपको भिखारी भी मोबाइल से लेन-देन करते दिखेंगे। वजह ये है कि छोटी-मोटी खरीदारी के लिए भी आपको झोला भर कर नोट चाहिए। अब इतना पैसा लादकर कोई कहां तक चले? इसलिए सोमालीलैंड में आज अस्सी फीसद कारोबार कैशलेस हो गया है।
चाहे फुटपाथ पर सब्जी और कबाड़ बेचने वाला हो या फिर चमकती दुकानों में बैठे धन्ना सेठ। कहीं भी चले जाएं, सोमालीलैंड में आप को बस अपने मोबाइल से दुकानदार का मोबाइल नंबर और कोड दर्ज करना है। पैसे आपके अकाउंट से दुकानदार के खाते में चले जाएंगे।
कैशलेस कैसे हों
कैशलेस
- फोटो : File Photo
सोमालीलैंड में दो कंपनियां मोबाइल बैंकिंग की सुविधा दे रही हैं। पहली कंपनी है ज़ाड। वहीं दूसरी का नाम है, ई-दहाब। यही दोनों कंपनियां सोमालीलैंड के नागरिकों को मोबाइल के जरिए बैंकिंग की सुविधाएं देती हैं।
सोमालीलैंड में न तो क्रेडिट कार्ड का ज्यादा चलन है और न ही डेबिट कार्ड का। सिर्फ मोबाइल के जरिए ही यहां की अर्थव्यवस्था कैशलेस हो गई है। देश के ज्यादातर नागरिक निरक्षर हैं। मगर बुनियादी फोन सेट के जरिए वो भी आसानी से भुगतान कर लेते हैं। बस, लोगों को मोबाइल नंबर और दुकानदार का कोड डायल करना होता है।
राजधानी हर्गीशा में गहने बेचने वाली ईमान अनीस कहती हैं कि ज्यादा सामान लेना हो तो आप को नोट को ठेला गाड़ी पर लादकर लाना होगा। अब ये काम कोई आसान तो है नहीं। इसीलिए, लोग मोबाइल बैंकिंग पसंद करते हैं। आसान भी है और फटाफट लेन-देन हो भी जाता है।
पिछले दो-तीन साल में ही सोमालीलैंड में मोबाइल से पेमेंट पांच फीसद से बढ़कर करीब अस्सी फीसद तक पहुंच गया है। आप को अगर भिखारियों को भी मदद करनी है तो आप मोबाइल से उन्हें पैसे दे सकते हैं।
सूखे से बदहाल
पिछले कई साल से सोमालीलैंड सूखे का शिकार है। ऐसे में शहरों में काम करने वालों के लिए कैशलेस इकोनॉमी वरदान साबित हो रही है। लोग आसानी से गांव में रहने वाले अपने परिजनों को पैसे भेज पाते हैं। गांवों में भी साठ फीसद से ज्यादा लोग अब मोबाइल के जरिए ही लेन-देन कर रहे हैं।
यहां तक कि कई कंपनियां तो अब मोबाइल से ही तनख्वाह भी दे रही हैं। सोमालीलैंड में 16 बरस से ज्यादा की उम्र वाले 88 फीसद लोगों के पास मोबाइल फोन है। उनके लिए फोन अब बातचीत का भी जरिया है, और उनका निजी बैंक भी है।
सोमालीलैंड ही नहीं, अफ्रीका के कई देशों में कैशलेस अर्थव्यवस्था तेजी से पैठ बना रही है। घाना, तंजानिया, युगांडा में भी मोबाइल बैंकिंग क्रांति आ गई है। इसी तरह केन्या में भी बड़ी तादाद में लोग M-pesa के जरिए भुगतान कर रहे हैं।
वैसे कुछ लोग कैशलेस अर्थव्यवस्था से नाराज हैं। वो कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग की सुविधा देने वाली निजी कंपनियां जमकर भ्रष्टाचार कर रही हैं। वो कैशलेस नोट छाप रही हैं। इससे महंगाई बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था का हाल बदतर होता जा रहा है। ये लोग सोमालीलैंड की सरकार से अपील कर रहे हैं कि वो मोबाइल बैंकिंग करने वाली कंपनियों पर लगाम लगाएं।
अब सोमालीलैंड की मुद्रा यानी शिलिंग की कोई कीमत नहीं, तो नोटों की अदला-बदली करने वाले भी परेशान हैं। वो सिर्फ डॉलर में नोट बदलते रहे हैं। पर अब मोबाइल पर ही लेन-देन हो जाने की वजह से उनका धंधा भी मंदा पड़ रहा है।
ऐसे ही एक शख्स हैं सोमालीलैंड की राजधानी हर्गीशा के मुस्तफा हसन। मुस्तफा कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग भ्रष्ट है। इससे काला धन बढ़ रहा है। मुस्तफा कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग के बढ़ते चलन की वजह से कोई भी सोमालीलैंड की करेंगी यानी शिलिंग का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। इससे देश का बहुत नुकसान हो रहा है। हालांकि मुस्तफा भी मानते हैं कि मोबाइल बैंकिंग से लोगों की जिंदगी आसान हो गई है।
वहीं, कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें नकद खरीदारी ही पसंद है। हर्गीशा के ही रहने वाले अब्दुल्ला कहते हैं कि जेब में मोबाइल होने का मतलब है आपकी जेब में बैंक है। ये चोरी भी हो सकता है। इसीलिए अब्दुल्ला हमेशा नकद लेन-देन ही करते हैं। अब्दुल्ला कहते हैं कि वो शायद मरते दम तक मोबाइल बैंकिंग का इस्तेमाल न करें।
सोमालीलैंड में न तो क्रेडिट कार्ड का ज्यादा चलन है और न ही डेबिट कार्ड का। सिर्फ मोबाइल के जरिए ही यहां की अर्थव्यवस्था कैशलेस हो गई है। देश के ज्यादातर नागरिक निरक्षर हैं। मगर बुनियादी फोन सेट के जरिए वो भी आसानी से भुगतान कर लेते हैं। बस, लोगों को मोबाइल नंबर और दुकानदार का कोड डायल करना होता है।
राजधानी हर्गीशा में गहने बेचने वाली ईमान अनीस कहती हैं कि ज्यादा सामान लेना हो तो आप को नोट को ठेला गाड़ी पर लादकर लाना होगा। अब ये काम कोई आसान तो है नहीं। इसीलिए, लोग मोबाइल बैंकिंग पसंद करते हैं। आसान भी है और फटाफट लेन-देन हो भी जाता है।
पिछले दो-तीन साल में ही सोमालीलैंड में मोबाइल से पेमेंट पांच फीसद से बढ़कर करीब अस्सी फीसद तक पहुंच गया है। आप को अगर भिखारियों को भी मदद करनी है तो आप मोबाइल से उन्हें पैसे दे सकते हैं।
सूखे से बदहाल
पिछले कई साल से सोमालीलैंड सूखे का शिकार है। ऐसे में शहरों में काम करने वालों के लिए कैशलेस इकोनॉमी वरदान साबित हो रही है। लोग आसानी से गांव में रहने वाले अपने परिजनों को पैसे भेज पाते हैं। गांवों में भी साठ फीसद से ज्यादा लोग अब मोबाइल के जरिए ही लेन-देन कर रहे हैं।
यहां तक कि कई कंपनियां तो अब मोबाइल से ही तनख्वाह भी दे रही हैं। सोमालीलैंड में 16 बरस से ज्यादा की उम्र वाले 88 फीसद लोगों के पास मोबाइल फोन है। उनके लिए फोन अब बातचीत का भी जरिया है, और उनका निजी बैंक भी है।
सोमालीलैंड ही नहीं, अफ्रीका के कई देशों में कैशलेस अर्थव्यवस्था तेजी से पैठ बना रही है। घाना, तंजानिया, युगांडा में भी मोबाइल बैंकिंग क्रांति आ गई है। इसी तरह केन्या में भी बड़ी तादाद में लोग M-pesa के जरिए भुगतान कर रहे हैं।
वैसे कुछ लोग कैशलेस अर्थव्यवस्था से नाराज हैं। वो कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग की सुविधा देने वाली निजी कंपनियां जमकर भ्रष्टाचार कर रही हैं। वो कैशलेस नोट छाप रही हैं। इससे महंगाई बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था का हाल बदतर होता जा रहा है। ये लोग सोमालीलैंड की सरकार से अपील कर रहे हैं कि वो मोबाइल बैंकिंग करने वाली कंपनियों पर लगाम लगाएं।
अब सोमालीलैंड की मुद्रा यानी शिलिंग की कोई कीमत नहीं, तो नोटों की अदला-बदली करने वाले भी परेशान हैं। वो सिर्फ डॉलर में नोट बदलते रहे हैं। पर अब मोबाइल पर ही लेन-देन हो जाने की वजह से उनका धंधा भी मंदा पड़ रहा है।
ऐसे ही एक शख्स हैं सोमालीलैंड की राजधानी हर्गीशा के मुस्तफा हसन। मुस्तफा कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग भ्रष्ट है। इससे काला धन बढ़ रहा है। मुस्तफा कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग के बढ़ते चलन की वजह से कोई भी सोमालीलैंड की करेंगी यानी शिलिंग का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। इससे देश का बहुत नुकसान हो रहा है। हालांकि मुस्तफा भी मानते हैं कि मोबाइल बैंकिंग से लोगों की जिंदगी आसान हो गई है।
वहीं, कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें नकद खरीदारी ही पसंद है। हर्गीशा के ही रहने वाले अब्दुल्ला कहते हैं कि जेब में मोबाइल होने का मतलब है आपकी जेब में बैंक है। ये चोरी भी हो सकता है। इसीलिए अब्दुल्ला हमेशा नकद लेन-देन ही करते हैं। अब्दुल्ला कहते हैं कि वो शायद मरते दम तक मोबाइल बैंकिंग का इस्तेमाल न करें।