अफगानिस्तान: संघर्ष क्षेत्र में रिपोर्टिंग के दौरान अब तक 14 पत्रकारों की मौत
अफगानिस्तान लगातार संघर्ष क्षेत्र में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश है। यहां अब तक 14 पत्रकारों की मौत हो चुकी है। काबुल में पांच सितंबर को आत्मघाती हमले की लाइव रिपोर्टिंग करने के कुछ देर बाद एक कार विस्फोट में अफगानिस्तान के पत्रकार समीम फरामार्ज की मौत हो गई। उनके साथ उनके कैमरामैन रमीज अहमदी की भी मौत हो गई। तोलो न्यूज में काम करने वाले फरामार्ज के सहयोगियों ने उनकी मौत की लाइव रिपोर्टिंग रोते हुए की।
युद्ध शुरू होने के बाद अब तक एक साल में मारे गए पत्रकारों की यह संख्या सबसे ज्यादा है। फरामार्ज और रमीज की मौत के साथ अफगानिस्तान में इस साल अब तक 14 मीडियाकर्मियों की मौत हो चुकी है। इनमें 13 पत्रकार हैं। इससे पहले 30 अप्रैल को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में दो बम ब्लास्ट में नौ पत्रकारों की मौत हो गई थी। इसमें एजेंसी फ्रांस प्रेस (एएफपी) के चीफ फोटोग्राफर शाह मराई की मौत हो गई थी।
यह तालिबान की ओर से पत्रकारों पर किया गया सबसे आत्मघाती हमला था। इसके करीब तीन महीने से भी कम समय बाद रिपोर्टिंग के लिए जाते वक्त एएफपी के ड्राइवर मोहम्मद अख्तर की बम ब्लास्ट में मौत हो गई थी। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के मुताबिक, 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद अब तक 60 पत्रकारों की मौत यहां हो चुकी है।
हमेशा बना रहता है मौत का भय
वन टीवी के संवाददाता हामिद हैदरी ने कहा कि फरामार्ज और अहमदी की मौत की सूचना मिलने के बाद वह मौके पर गए थे। वहां से ऑफिस लौटने के कुछ मिनट बाद ही वहां दूसरा बम ब्लास्ट हो गया। उन्होंने कहा कि यहां पत्रकारों की मौत काफी चिंताजनक है। रिपोर्टिंग करने जाते वक्त हमेशा भय बना रहता है। घर से निकलने के बाद हमें पता नहीं होता है कि वापस घर लौटेंगे भी या नहीं।
वहीं, तोलो न्यूज के निदेशक लोतफुल्लाह नजफीजादा ने कहा कि अफगानिस्तान में सुरक्षा की स्थिति खराब है। यहां लोग डर के साये में जी रहे हैं। ऐसी स्थिति सिर्फ ब्लास्ट होने वाली जगहों पर नहीं है। ऑफिस आते-जाते समय और ऑफिस में रहने के दौरान भी जान जाने का खतरा रहता है। उन्होंने कहा कि अक्तूबर में यहां चुनाव होने हैं। लेकिन जिस प्रकार पत्रकारों की एक के बाद एक मौत हो रही है, उसे देखते हुए खुलकर काम करना काफी मुश्किल है।
रिपोर्टिंग से पहले सुरक्षा जरूरी
वहीं, बीबीसी के ब्यूरो चीफ शोएब शरिफी का कहना है कि आत्मघाती हमले की रिपोर्टिंग पर पूरी तरह बैन लगाने से मसला हल नहीं होगा। लेकिन सुरक्षा से भी समझौता नहीं किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि रिपोर्टिंग के लिए ऑफिस से बाहर जाने से पहले स्थिति का बेहतर आकलन करना जरूरी है। खतरे को कम करने के लिए हम लोग ऐसा ही करते हैं।
सही जानकारी के लिए बम ब्लास्ट के बाद मौके पर जाना जरूरी
न्यूज एंड करंट अफेयर्स के हेड अब्दुल्ला खेनजानी ने बताया कि आत्मघाती हमले में पत्रकारों की मौत चिंताजनक है, लेकिन ऐसी खबरों की रिपोर्टिंग नहीं करना कोई समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा के साथ बम ब्लास्ट की रिपोर्टिग करने के लिए मौके पर जाना जरूरी है। तभी असली स्थिति का पता चलेगा। उन्होंने कहा कि लोग यह जानना चाहते हैं कि उनके देश में क्या हो रहा है। इसलिए हमें उन्हें बताना जरूरी है।