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अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत ने निभाई दोस्ती, म्यांमार के खिलाफ प्रस्ताव में नहीं लिया हिस्सा

Fri, 08 Sep 2017 09:42 AM IST
amarujala.com- Presented by: अभिषेक मिश्रा
amarujala.com- Presented by: अभिषेक मिश्रा Updated Fri, 08 Sep 2017 09:42 AM IST
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india stand with myanmar at international meet, refuses to join declaration on Rohingyas
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आंग सान सू की

भारत ने अंतराराष्ट्रीय मंच पर म्यांमार का साथ दिया और गुरुवार को उसके खिलाफ पारित एक प्रस्ताव से खुद को अलग रखा। गुरुवार को बाली के नुसा डुआ में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया गया। 

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इस घोषणा पत्र में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को लेकर म्यांमार की आलोचना की गई है। बता दें कि रोहिंग्या मुसलामानों के खिलाफ रखाइन प्रांत में फैली हिंसा के चलते यहां से लगभग 125,000 मुसलमानों को देश छोड़कर भागना पड़ा है। 
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पढ़ें: क्यों, म्यांमार को छोड़ना चाहते हैं रोहिंग्या मुसलमान
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लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन के नेतृत्व में एक संसदीय प्रतिनिधिमंडल इन दिनों इंडोनेशिया की यात्रा पर है। इसी दौरान यहां रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हो रही हिंसा को लेकर 'बाली घोषणा पत्र' पेश किया गया।

सुमित्रा महाजन के नेतृत्व में गया यह प्रतिनिधिमंडल वर्ल्ड पार्लियामेंट्री फोरम में हिस्सा लेने पहुंचा है। गौरतलब है कि रोहिंग्या मुलसमान अब तक जिस म्यांमार को अपना मुल्क मानते आए थे अब वहां से उन्हें भगाया जा रहा है। पिछले दस सालों में दो लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यामांर से भागकर पड़ोसी बांग्लादेश, भारत, नेपाल और खाड़ी के मुल्कों में पनाह ली है।


पढ़ें: म्यांमार से जान बचाकर भाग रहे रोहिंग्या मुसलमान

म्यांमार में दस लाख के करीब रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं। रोहिंग्या की ज्यादातर आबादी म्यांमार के रखाइन प्रांत में है, लेकिन म्यांमार इन्हें अपने मूल निवासी नहीं मानता। धारणा है कि बांग्लादेश से भागकर इन लोगों ने यहां पनाह ली थी, इसलिए हमेशा से इन्हें वहां हिकारत की नजर से देखा जाता है।

हालांकि रोहिंग्या कई पीढ़ियों से म्यामांर में बसे हुए हैं, लेकिन म्यांमार की बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के साथ आज भी ये घुल मिल नहीं सके हैं। रखाइन प्रांत के एक गांव का नाम रोहिंग है। माना जाता है उसी के नाम पर यहां आकर बसे मुलसमानों को रोहिंग्या कहा जाने लगा।

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