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ग्राउंड रिपोर्ट: 'घोस्ट कैपिटल' में मुश्किल से क्या मिलता है? 

Thu, 30 Nov 2017 05:04 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Thu, 30 Nov 2017 05:04 PM IST
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Ground Report: What is hard to get in 'Ghost Capital'?
नेपिडो - फोटो : bbc
यहाँ की 20 लेन वाली सड़कों पर दो हवाई जहाज एक साथ, अगल-बगल, लैंड कर सकते हैं। इस शहर में 100 से भी ज्यादा चमचमाते होटल चल रहे हैं। मखमल सी बिछाई गई घास वाले दर्जनों गोल्फ-कोर्स आपका दिल जीत लेंगे। कई किलोमीटर तक फैले यहाँ के जू में पेंग्विन्स भी रहती हैं।
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ये अनोखा शहर चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला बताया जाता है। बस एक ही चीज है जो यहाँ मुश्किल से और ढूँढने पर दिखती है - इंसान! ये बर्मा की नई राजधानी नेपिडो है जो देश की सत्ता का गढ़ भी है। म्यांमार की इस नई-चमचमाती राजधानी को बनाने में करीब 26,000 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। यहाँ न कभी ट्रैफिक जाम लगता है और न ही कोई शोर-शराबा है। सदियों से म्यांमार (बर्मा) की राजधानी मांडले थी जिसे 1948 में यांगोन (तब रंगून) शिफ्ट कर दिया गया था। लेकिन साल 2000 के आसपास म्यांमार से काफी दूर हुई एक लड़ाई ने फौजी जनरलों को सोचने पर मजबूर कर दिया।
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राजधानी बदली

Ground Report: What is hard to get in 'Ghost Capital'?
नेपिडो - फोटो : bbc
वरिष्ठ पत्रकार और दक्षिण-पूर्व एशियाई मामलों के जानकार सुबीर भौमिक इन दिनों यांगोन में रहते हैं। उन्होंने बताया, "दूसरे इराक युद्ध शुरू होने के पहले ऐसा माहौल बना था, कई देशों पर सैंक्शन्स वगैरह लगे थे तब बर्मा की मिलिट्री को लगा कि अगर हमला हुआ तो यांगोन पर तो फट से कब्जा हो जाएगा। मैरीन्स यहाँ आएँगे और कब्जा कर लेंगे क्योंकि शहर तट पर है। इसलिए उन्हें लगा कि राजधानी यहाँ से हटानी चाहिए। यहाँ की फौज और आम जनता ज्योतिष पर बहुत यकीन रखते हैं। ज्योतिषियों ने कहा ये बेहतर लोकेशन है, आप लोग वहां जाएं।" म्यांमार दुनिया के उन कम देशों में है जिसने पिछले दशकों के दौरान राजधानी बदली है।

2006 के बाद से नेपिडो ही राजधानी हैं और सभी मंत्रालय, सुप्रीम कोर्ट, फौजी जनरल और स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची भी यहीं बस चुकी हैं। जब ये शिफ्टिंग हुई तब नई राजधानी नेपिडो की तुलना किसी 'घोस्ट कैपिटल या 'भुतहा शहर' से की गई थी। विश्लेषकों ने तत्कालीन फौजी शासकों के इस फैसले की आलोचना करते हुआ कहा था, "गरीबी से जूझते इस देश को हजारों-करोड़ डॉलर एक नई राजधानी पर लुटाने की क्या जरूरत थी"। शायद तभी से म्यांमार सरकार इस नए शहर को लेकर थोड़ी ज्यादा ही सतर्कता बरतती है।

कड़े नियम

Ground Report: What is hard to get in 'Ghost Capital'?
नेपिडो - फोटो : bbc
संसद के बाहर सड़क पर हमने वीडियो कैमरा निकाला ही था कि एक पुलिस वाले ने आकर हमें बगल की चौकी पहुँचने के आदेश दे दिए। 20 मिनट पूछताछ के बाद जाने दिया लेकिन हल्की चेतावनी के साथ, "जर्नलिस्ट वीजा है तब भी, आप लोग यहाँ वीडियो नहीं बना सकते"। चाहे सरकारी कर्मचारी हों या टैक्सी-बस वाले, इस अनोखे शहर में सभी कहते है कि बड़े खुश हैं। बात ये भी है कि म्यांमार में दशकों तक रहे फौजी शासन के चलते मीडिया की मौजूदगी नहीं के बराबर रही है। 2011 के बाद से देश में राजनीतिक सुधारों का सिलसिला शुरू होने के बाद ही लोगों में मीडिया के प्रति जागरूकता बढ़ी है। लेकिन अभी भी ज्यादातर लोग खुल कर बात करने के बजाय हर चीज की 'तारीफ' करना पसंद करते हैं। सिवाय एक शख्स के जो हमें नेपिडो की एक बड़ी सरकारी कॉलोनी के बाहर मिले।

तुन औंग और उनकी पत्नी एक रेस्टोरेंट चलाते हैं

उन्होंने कहा, "हम लोग म्यांमार के शान राज्य के रहने वाले हैं और चार साल पहले यहाँ रोजगार की तलाश में आए थे। बिजनेस तो थोड़ा जमने लगा है लेकिन यहाँ अच्छे कॉलेज नहीं हैं तो हमें अपने दोनों बच्चों को दूसरे शहर में रिश्तेदारों के पास भेजना पड़ा।"

दूतावास यांगोन में

Ground Report: What is hard to get in 'Ghost Capital'?
नेपिडो - फोटो : bbc
म्यांमार में सभी विदेशी दूतावास अब भी यांगोन में है और नेपिडो जाने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं। सबसे बड़ा शहर होने के अलावा यांगून देश की कॉमर्शियल कैपिटल भी है। इधर, नेपिडो में ये ढूंढ़ना मुश्किल भी नहीं कि राजधानी शिफ्ट करने का फैसला किनका रहा होगा। शहर में हर तरफ फौज का 'जलवा' साफ पता चलता है। खास ध्यान देते हुए एक मिलिट्री म्यूजियम बनाया गया है जो हजारों एकड़ में फैला है। अस्त्र-शस्त्र के अलावा करोड़ों रुपए खर्च करके, न सिर्फ म्यांमार, बल्कि दुनिया भर से प्लेन लाए गए हैं जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध के खतरनाक 'स्पिटफायर' और वियतनाम वार में इस्तेमाल हुए 'जंबो हेलीकॉप्टर' भी खड़े है। लेकिन हकीकत ये है कि इन्हें देखने के लिए यहाँ बहुत कम लोग आते हैं।

हालांकि नेपिडो में हमरी मुलाकात देश के केंद्रीय मंत्री विन म्यात आए से हुई और उन्होंने इस बात को सिरे से खारिज किया कि शहर 'घोस्ट कैपिटल' है। "अगर 2007 में आप मुझसे ये सवाल करते तो मैं मान भी लेता। अब नहीं। अभी तो यहाँ जो आते हैं, वो यहीं के होकर रह जाते हैं। यहाँ न तो प्रदूषण है, न ही ट्रैफिक की मारामारी और न ही घरों की दिक्कत।" बहरहाल, शहर का सबसे बड़ा शॉपिंग मॉल भी ज्यादातर खाली ही पड़ा रहता है। अंदर जाकर तस्वीरें लेने पर रोक है, लेकिन दुनिया के टॉप ब्रांड्स यहाँ जरूर मिलते हैं। फिलहाल तो राजधानी के साथ यहां भेजे गए सरकारी नौकर ही खरीददार हैं।
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