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'ड्राइंग बनानी थी, बच्चे ने बनाया पिता की हत्या का स्केच'

Fri, 23 Feb 2018 10:30 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Fri, 23 Feb 2018 10:30 PM IST
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Drawing the sketch of the child's father's murder
नूर
डेढ़ दर्जन बच्चे सुर से सुर मिलाकर म्यांमार के राष्ट्रगान का रियाज कर रहे हैं। वहीं, बगल के कमरे में एक दर्जन महिलाएं हाथ से सिलाई का काम कर रहीं हैं और रोज़ शाम उन्हें इसके लिए 50 टका ( करीब 40 रुपए) मिलते हैं। ये जगह है बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार का बालूखली रिफ्यूजी कैंप जहां ये बच्चे और इनके परिवार म्यांमार से अपनी जान बचाकर पहुंच सके हैं। खुद के देश से पराए हुए इन बच्चों में से कई ने अपनी आंखों के सामने अपनों को मरते देखा है। महीनों पुरानी इन यादों के जख्म आज भी उनके जेहन में ताज़ा हैं।
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इन्हीं बच्चों में से एक बच्चा बेहद खामोश है और रह-रह कर खिड़की से बाहर देखता है। मोहम्मद नूर की उम्र बारह वर्ष है और पिछले साल लंबी बीमारी के बाद उनके पिता का निधन हो गया था। विधवा मां के अलावा उनकी तीन बहनें हैं और रखाइन प्रांत के एक छोटे से गांव में नाबालिग नूर सब्जी उगाकर सबका पेट भरने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन म्यांमार में हुई हिंसा के बाद मोहम्मद नूर की दुनिया एक ही दिन में बदल गई।
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मोहम्मद नूर ने बताया, "उस दिन मैं सब्ज़ी बेचने के लिए बाज़ार में बैठा ही था कि नकाब पहने हुए कुछ लोग आए और धारदार हथियारों से हमला शुरू कर दिया। मैंने अपने दो चचेरे भाइयों को वहीं पर मरते देखा। भाग कर घर पहुंचा और अपने परिवार को लेकर सीमा की तरफ़ चल दिया। अभी भी याद करता हूं मन भारी हो जाता है। आज भी उस बात की बेचैनी है।"
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Drawing the sketch of the child's father's murder
ड्राइंग
पिछले साल अगस्त महीने में म्यांमार में ज़बरदस्त हिंसा भड़की थी। इसके बाद करीब सात लाख रोहिंग्या मुसलमानों ने अपनी जान पर बने खतरे से बचने के लिए बांग्लादेश में शरण ली थी। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का अनुमान है कि इस आंकड़े में कम से कम तीन लाख नाबालिग हैं, जिन्हें लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। ज्यादातर दिक्कतें मनोवैज्ञानिक हैं जो वयस्कों के साथ-साथ नाबालिग बच्चों को बुरी तरह सता रही हैं। बच्चों में अवसाद यानी डिप्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं और साथ ही मनोवैज्ञानिकों की जरूरत भी। महमूदा एक मनोचिकित्सक हैं जो पिछले चार महीनों से संयुक्त राष्ट्र की ओर से कॉक्स बाज़ार में काम कर रही हैं।

उनके मुताबिक लगभग सभी शरणार्थी अपने घरों से बेघर होने के सदमे में हैं, लेकिन बच्चों की हालत सबसे खराब है। उन्होंने बताया, "इन बच्चों में से किसी ने मां-बाप की हत्या देखी तो किसी ने गोलियां चलते देखी। किसी ने अपने घरों को जलते देखा। कई बच्चे हैं जो अभी तक उस भयानक नजारे को भूल नहीं सके हैं। इन्हें मनोवैज्ञानिक सपोर्ट की सख्त जरूरत है वरना ये पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर या पीटीएसडी का शिकार होते चले जाएंगे।"

मानवाधिकार सगठनों के अनुसार बांग्लादेश के इन नए रोहिंग्या कैंपों में कम से कम 5,000 परिवार ऐसे हैं जिनके मुखिया अब नाबालिग बच्चे ही हैं। छोटी उम्र में उनके लिए जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं हैं, लेकिन साधन घट चुके हैं। कैंपों के बीच बने कई मेडिकल कैंपों में जाकर डॉक्टरों से बात करने पर पता चला कि अभी तक ज्यादा ध्यान हैजा, बुखार, फ्लू और कुपोषण से निपटने पर ही दिया जा रहा है। काफी जिद करने पर मेडिकल मदद करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था मेडिका सौं फ्रंतिए (एमएसएफ) ने हमसे बात करने की हामी भरी।

कुतुपालोंग इलाके के एक सुरक्षित से मेडिकल सेंटर में जो दिखा वो काफी अफसोसनाक था। ज्यादातर इलाज बच्चों का चल रहा था, लेकिन एक पूरा हॉल सिर्फ उन नाबालिगों के लिए निर्धारित कर दिया गया है जो मानसिक दिक्कतें झेल रहे हैं। एमएसएफ की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर सिंडी स्कॉट ने हमें एक दिल दहलाने वाली ड्रॉइंग दिखाई।

करीब डेढ़ दर्जन बच्चों के मनोबल को बढ़ाने की एक पाठशाला के दौरान उनसे आसपास के पर्यावरण का चित्र बनाने को कहा गया। 9 साल के एक बच्चे को छोड़कर सभी ने पहाड़, नदियां और पेड़ बनाए। लेकिन इस रोहिंग्या मुस्लिम बच्चे ने रखाइन में अपने घर पर हेलीकॉप्टर के हमले और अपने पिता की हत्या का चित्र खींचा।

डॉक्टर सिंडी स्कॉट ने कहा, "यहाँ पर हालात मुश्किल हैं। लोग बीमार पड़ रहे हैं और बच्चे अपने परिवार को मुश्किलें भुगतते हुए देखते हैं और उन्हें सहारा देने के लिए आस-पास कोई नहीं। कल ही मैं एक बेहद डिप्रेस्ड और परेशान माँ से बात कर रही थी, इस बीच उसके बच्चे कैंप के कोने में डरे-सहमे बैठे थे। उन्हें लग रहा था कि उनकी मां मरने वाली है।

दरअसल, म्यांमार से बांग्लादेश भागकर आए लाखों शरणार्थियों के भविष्य पर अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। हिंसा और खून-खराबे से बच कर जो बच्चे इन कैंपों में पहुंच सके थे उन्हें किस्मत वाला बताया गया था। लेकिन इन्होंने जो देखा है उसकी दहशत आज भी इन्हें सता रही है। इससे बड़ी दिक्कत ये है कि अभी तक इनकी मेन्टल हेल्थ पर ध्यान भी बहुत कम दिया गया है। एक ही तस्वीर है जो इनके जेहन में बस चुकी है। अपने पिता या मां की हत्या की और फिर उस तबाही की जो इन्सानों की शक्ल में आई थी।
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