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नेपाल में सेना के रेडियो स्टेशन पर क्यों हुआ हंगामा?
बीबीसी, हिन्दी
Updated Fri, 04 Aug 2017 12:46 PM IST
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nepal army
- फोटो : EPA
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नेपाली आर्मी के रेडियो स्टेशन चलाने के प्रस्ताव पर पूरे देश में जोरदार बहस चल रही है। स्थानीय मीडिया की खबरों से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लोग सवाल
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पूछ रहे हैं कि किसी लोकतंत्र में सेना को प्रसारक की भूमिका निभानी चाहिए या नहीं।
दूसरी तरफ नेपाली आर्मी का कहना है कि रेडियो स्टेशन का इस्तेमाल लोगों को सेना की गतिविधियों और कामकाज के बारे में बताने के लिए किया जाएगा। हालांकि
आलोचक इस पर आशंका जाहिर कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन रेडियो स्टेशनों के दुरुपयोग की संभावना है और आने वाले समय में सेना अपना प्रभुत्व कायम करने
की कोशिश कर सकती है।
नेपाल फिर से बनेगा हिंदू राष्ट्र?
पिछले महीने सेना ने देश के सुदूर पश्चिमी शहर दीपायल में एक एफ़एम रेडियो चैनल का टेस्ट ट्रांसमिशन शुरू किया। दिसंबर, 2016 में नेपाल के सूचना और प्रसारण
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मंत्रालय ने इस योजना को मंजूरी दी थी जिसके तहत सेना ये कदम उठा रही है।
सेना की गतिविधियां
योजना के तहत नेपाल की सेना को देश के सभी सात राज्यों में एफ़एम रेडियो स्टेशन चलाने की इजाजत दी गई थी। देश की असैनिक परियोजनाओं में नेपाली सेना भूमिका
निभाती रहती है जैसे मेडिकल कॉलेज चलाना, पेयजल संयंत्र लगाना और यहां तक कि शादी के लिए बैंक्वेट वेन्यू का भी वो प्रबंधन करती है।
सेना ने रेडियो स्टेशन चलाने की योजना को अपनी इन्हीं गतिविधियों के हिस्से के तौर पर देखा। पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल की सरकार ने मई में एक सड़क परियोजना
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का काम सेना को सौंप दिया था जिसके लिए विपक्षी पार्टियों और लोकल मीडिया ने उन्हें जमकर आड़े हाथों लिया था। और अब ये सवाल उठ रहा है कि सेना एक स्वतंत्र
प्रसारक के तौर पर क्यों काम करना चाहती है।
ऐसा क्यों हुआ?
नेपाल के अंग्रेजी अखबार काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक रॉयल नेपाली आर्मी ने साल 2006 की शुरुआत में आर्मी रेडियो स्टेशन शुरू करने की योजना बनाई
थी। उस वक्त माओवादी बागियों से चल रहे संघर्ष के मद्देनजर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने नेपाली आर्मी को पांच रेडियो स्टेशन शुरू करने की इजाजत दे दी। लेकिन बाद
में आंतरिक मतभेदों और विरोध के चलते इस योजना को वापस ले लिया गया।
काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक नई योजना पुरानी के तर्ज पर है। अखबार ने नेपाली आर्मी के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल झंकार बहादुर कदायत के हवाले से लिखा है, इन रेडियो स्टेशनों का इस्तेमाल आपदा प्रबंधन की सूचनाएं देने के लिए किया जाएगा, सेना का कहना है कि नए रेडियो स्टेशन का उपयोग राहत और बचाव अभियानों में प्रभावशाली संचार के लिए किया जाएगा। प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में सेना की बढ़ती भूमिका के मद्देनजर सेना अपने प्रसारण तंत्र की जरूरत का दावा कर रही है।
आलोचना
फ्रीडम फोरम ने इस कदम की तीखी आलोचना की है और इसे लोगों के अधिकारों का अतिक्रमण बताया है। फोरम ने एक बयान जारी कर कहा, नेपाल सेना का मीडिया
चलाना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि निंदनीय भी है। क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों के हितों को सर्वोच्च अहमियत देने के कारण इससे लोगों के अधिकारों की रक्षा के बजाय
उनका हनन होने की संभावना है। स्थानीय मीडिया का कहना है कि इससे लोकतांत्रिक मूल्यों को खतरा है।
नेपाल के लोग
10 जुलाई को काठमांडू पोस्ट में छपी एक खबर में नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से कहा गया, वैसे तो सरकार का मीडिया पर कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए....तो
सेना को अलग रेडियो स्टेशन की आवश्यकता क्यों है?
26 जुलाई को काठमांडू पोस्ट में इस विषय पर एक संपादकीय भी छपा, जिसमें पूछा गया कि अगर सेना खुद को मीडिया गतिविधियों में शामिल करती है तो क्या वो उन चुनौतियों के लिए भी तैयार है जिनका सामना दूसरे मीडिया संस्थानों को करना पड़ता है। मसलन, प्रेस काउंसिल की निगरानी में रहना या सिविल कोर्ट में मुकदमों का सामना करना. अख़बार ने पूछा है कि इस पर नजर कौन रखेगा?
अभी तक सेना ने सभी तरह के कयासों पर सधी हुई प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि वह जिम्मेदार और पेशेवर हैं और राष्ट्र और लोगों की सेवा करने के अलावा उसका
कोई और दूसरा इरादा नहीं है।
पाकिस्तान का उदाहरण
सेना ने पाकिस्तान और थाईलैंड का उदाहरण भी दिया है जहाँ सेना सूचनाप्रद कार्यक्रमों के लिए रेडियो स्टेशन चलाती है। सेना ने दीपायल में अपने पहले एफएम रेडियो
स्टेशन से टेस्ट ट्रांसमिशन शुरू कर दिया है। हालांकि स्थानीय मीडिया का मानना है कि सेना का ये कदम बताता है कि उसे राज्य के दूसरे प्रसारकों पर यकीन नहीं है,
लेकिन सरकार का कहना है कि सेना को जब भी कोई सूचना देने की जरूरत होती है, वो हर बार निजी रेडियो स्टेशनों का रुख नहीं कर सकती।
थी। उस वक्त माओवादी बागियों से चल रहे संघर्ष के मद्देनजर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने नेपाली आर्मी को पांच रेडियो स्टेशन शुरू करने की इजाजत दे दी। लेकिन बाद
में आंतरिक मतभेदों और विरोध के चलते इस योजना को वापस ले लिया गया।
काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक नई योजना पुरानी के तर्ज पर है। अखबार ने नेपाली आर्मी के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल झंकार बहादुर कदायत के हवाले से लिखा है, इन रेडियो स्टेशनों का इस्तेमाल आपदा प्रबंधन की सूचनाएं देने के लिए किया जाएगा, सेना का कहना है कि नए रेडियो स्टेशन का उपयोग राहत और बचाव अभियानों में प्रभावशाली संचार के लिए किया जाएगा। प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में सेना की बढ़ती भूमिका के मद्देनजर सेना अपने प्रसारण तंत्र की जरूरत का दावा कर रही है।
आलोचना
फ्रीडम फोरम ने इस कदम की तीखी आलोचना की है और इसे लोगों के अधिकारों का अतिक्रमण बताया है। फोरम ने एक बयान जारी कर कहा, नेपाल सेना का मीडिया
चलाना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि निंदनीय भी है। क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों के हितों को सर्वोच्च अहमियत देने के कारण इससे लोगों के अधिकारों की रक्षा के बजाय
उनका हनन होने की संभावना है। स्थानीय मीडिया का कहना है कि इससे लोकतांत्रिक मूल्यों को खतरा है।
नेपाल के लोग
10 जुलाई को काठमांडू पोस्ट में छपी एक खबर में नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से कहा गया, वैसे तो सरकार का मीडिया पर कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए....तो
सेना को अलग रेडियो स्टेशन की आवश्यकता क्यों है?
26 जुलाई को काठमांडू पोस्ट में इस विषय पर एक संपादकीय भी छपा, जिसमें पूछा गया कि अगर सेना खुद को मीडिया गतिविधियों में शामिल करती है तो क्या वो उन चुनौतियों के लिए भी तैयार है जिनका सामना दूसरे मीडिया संस्थानों को करना पड़ता है। मसलन, प्रेस काउंसिल की निगरानी में रहना या सिविल कोर्ट में मुकदमों का सामना करना. अख़बार ने पूछा है कि इस पर नजर कौन रखेगा?
अभी तक सेना ने सभी तरह के कयासों पर सधी हुई प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि वह जिम्मेदार और पेशेवर हैं और राष्ट्र और लोगों की सेवा करने के अलावा उसका
कोई और दूसरा इरादा नहीं है।
पाकिस्तान का उदाहरण
सेना ने पाकिस्तान और थाईलैंड का उदाहरण भी दिया है जहाँ सेना सूचनाप्रद कार्यक्रमों के लिए रेडियो स्टेशन चलाती है। सेना ने दीपायल में अपने पहले एफएम रेडियो
स्टेशन से टेस्ट ट्रांसमिशन शुरू कर दिया है। हालांकि स्थानीय मीडिया का मानना है कि सेना का ये कदम बताता है कि उसे राज्य के दूसरे प्रसारकों पर यकीन नहीं है,
लेकिन सरकार का कहना है कि सेना को जब भी कोई सूचना देने की जरूरत होती है, वो हर बार निजी रेडियो स्टेशनों का रुख नहीं कर सकती।