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नेपाल में अचानक बढ़ गई है पल्सर बाइक की डिमांड

Fri, 11 Dec 2015 02:54 PM IST
Updated Fri, 11 Dec 2015 02:54 PM IST
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 at blockade timing incinerate of Pulsar

तेज पिकअप के लिए जानी जाने वाली बजाज की बाइक पल्सर का स्लोगन है 'फीयर द ब्लैक'। नेपाल की नाकेबंदी के दौर में सोनौली बार्डर से लगे भारतीय गांवों में यह बाइक कालाबाजारी का सबसे बडा जरिया बन गई है क्योंकि इसकी टंकी में 15 लीटर पेट्रोल समा जाता है।

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बेरोजगार और छात्र इसे 300 रुपए रोज किराए पर लेते हैं, भारतीय पेट्रोल पंपों पर 70 रुपए प्रति लीटर की दर से टंकी भरवाते हैं और नेपाल के भीतर 125-130 रुपए लीटर के हिसाब से बेच आते हैं। जो जितने फेरे लगा ले, उसकी शाम उतनी रंगीन हो जाती है।
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दूसरी मोटरसाइकिलों से भी पेट्रोल की कालाबाजारी हो रही है पर किराया और मुनाफा कम है क्योंकि टंकी छोटी है।तेज रफ्तार से बाइक भगाने वाले ये लडके एक महीने से प्रदूषण मास्क पहनने लगे हैं, खेतों में उडती धूल से बचने के लिए नहीं बल्कि पुलिस और पेट्रोल पंप कर्मियों को चकमा देने के लिए, क्योंकि ज्यादा फेरे करने वालों को पुलिस टोकती है, पंप वाले टरकाते हैं।ट्रैवल एजेंसियां मक्खी मार रही हैं लेकिन टैक्सियों में डीजल फुल कराकर ड्राइवर कमाई कर रहे हैं।

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डीजल के जरीकेन हो रहे हैं पार

 at blockade timing incinerate of Pulsar

नाकेबंदी में कई युवा निवेशक पैदा हुए हैं जिनके किस्से पेट्रोल पंपों पर सुनने को मिलते हैं। सोनौली से 25 किलोमीटर दूर एक छोटे चेकपोस्ट से सटे गांव ठूंठीबारी के एक बेरोजगार युवक ने 15 हजार में सेकेंड हेंड बाइक खरीदी थी। मूल रकम चुकाने के बाद वह अब पैसा पीट रहा है।

सीमा से सटे बरगदवा कस्बे से दो दिन पहले डीजल लेकर गए एक लडके संदीप को नेपाल के नवलपरासी जिले में मधेशी आंदोलनकारियों ने गोली मार दी थी, पर उसका जिक्र करने से पल्सर वाले बचते हैं। उनके लिए यह घटना अपवाद है, जो कालाबाजारी नहीं, आपसी झगडे के कारण हुई थी।

जो बाइक नहीं जुगाड़ पाते, वो साइकिलों पर डीजल के जरिकेन पार करा रहे हैं। यहां तक कि गरीब औरतें और लडकियां भी उधारी के पैसों से पांच-सात लीटर डीजल खरीदकर कुछ न कुछ कमा रही हैं। नौतनवां बाइपास पर सशस्त्र सुरक्षा बल (एसएसबी) के कमांडेंट आफिस से थोडी दूर पेट्रोल पंप पर ही एक चाट वाले ने ठेला लगा लिया है।

'जहां लड़के वहां ठेला'

 at blockade timing incinerate of Pulsar

पिछले महीने तक यह ठेला पास के एक स्कूल के गेट पर लगता था। ठेला लगाने वाले कहते हैं, "जहां लडके वहां ठेला। पहले जिनके पास 10 रुपए नहीं थे, अब रोज हजार-पंद्रह सौ कमा रहे हैं।"इस पंप पर जरिकेनों की लंबी कतार थी। औरतें जल्दी तेल देने के लिए कर्मचारियों की चिरौरी कर रही थीं ताकि अंधेरा होने से पहले वे खेतों के रास्ते दसगज्जा (नो मैंस लैंड) पार कर, बिजनेस करके वापस लौट सकें।

बॉर्डर से सटे कस्बों में कुकिंग गैस की रीफिलिंग करके धडल्ले से एक के दो सिलिंडर बनाए जा रहे हैं।एक सिलिंडर ब्लैक में 720 रुपए का है। सीमा पार होते ही बेलहिया में उसकी कीमत 1500 रुपए हो जाती है, जो भैरवां और काठमांडू पहुंचने पर ढाई से तीन हजार रुपए का बिकने लगता है।

सोनौली में दुकानदार रो रहे हैं कि कालाबाजारी का धंधा चटकने के कारण उनकी दुकानों में काम करने वाले छोकरे भाग गए हैं।बार्डर पास के कस्बों में रिक्शा चलाने वाले नहीं दिख रहे और गेहूं की बुवाई के सीजन में मजदूर नहीं मिल रहे। सीमा के साथ लगे गावों-कस्बों के लोगों के लिए नाकेबंदी किसी वरदान की तरह कमाई का मौका बनकर आई है।

वे चाहते हैं यह सिलसिला लंबा चले। यहां पुरानी कहावत है 'पढाव न लिखाव, बॉर्डर पर बसाव।' यानी अगर पढा-लिखा न हो तो सिर्फ सीमा पर घर हो, तो रोजगार और आमदनी की बहुत फिक्र नहीं करनी पडती। फरेंदा में एक प्राइवेट नर्सिंग होम के सामने खडे एक देहाती ने कहा, "नेपाल को भारत ने वेंटिलेटर पर रख दिया है। ऐसे मरीज के घर वाले डॉक्टर को धकाधक पैसा देते हैं। नेपाल भी इस इलाके के लोगों को दे रहा है।"

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