सत्ता की गली बंदूक की नली से निकलती है... जब चीन की बर्बर सेना ने इसे सच कर दिखाया
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चीन में 30 साल पहले थियानमेन चौक पर हुए बर्बर नरसंहार को याद करके आज भी लोग सिहर उठते हैं। यह वही चीन है जो वैश्विक महामारी कोरोना वायरस की प्रसार का कारण बना हुआ है। इस महामारी के चलते उसके अपने हजारों नागरिकों की जान जा चुकी है। परंतु वह महज चार हजार लोगों की मौत होने की बात कबूल करता है। थियानमेन चौक पर हुए नरसंहार के आंकड़ों को चीन आज तक छिपाता रहा है।
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चीन में 30 साल पहले थियानमेन चौक पर हुए बर्बर नरसंहार को याद करके आज भी लोग सिहर उठते हैं। यह वही चीन है जो वैश्विक महामारी कोरोना वायरस की प्रसार का कारण बना हुआ है। इस महामारी के चलते उसके अपने हजारों नागरिकों की जान जा चुकी है। परंतु वह महज चार हजार लोगों की मौत होने की बात कबूल करता है। थियानमेन चौक पर हुए नरसंहार के आंकड़ों को चीन आज तक छिपाता रहा है।
बहरहाल, यह नरसंहार माउत्से तुंग के उस वक्तव्य का नतीजा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि सत्ता की गली बंदूक की नली से निकलती है। दूसरा वक्तव्य था राजनीति रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति। माओवादी विचारधारा से जुड़े इन दोनों सिद्धांतों का धीरे-धीरे प्रसार होता गया। इन्हीं मूल वाक्यों को चीन की सेना ने जून 1989 में थियानमेन चौक पर प्रदर्शन कर रहे निहत्थे छात्रों का हिंसक दमन करके साबित कर दिखाया। गोलियां बरसती रहीं और लहूलुहान छात्र दम तोड़ते रहे।
थियानमेन चौक क्या और कैसे हुआ था सबकुछ
- मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि थियानमेन चौक पर हुए नरसंहार में करीब 10 हजार लोग मारे गए थे, जबकि चीन 200 लोगों के मारे जाने और करीब सात हजार लोगों के घायल होने की बात कहता है। चीन से इतर देशों में कुछ साल पहले जारी हुए दस्तावेजों से इस बात की पुष्टि होती है।
- ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्ज में मिले एक खुफिया राजनयिक दस्तावेज में इस नरसंहार का ब्यौरा है। सार्वजनिक किए गए इस पुरालेख के मुताबिक शहर के थियानमेन चौक पर जून, 1989 में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर चीनी सेना की कार्रवाई में कम से कम 10,000 आम लोग मारे गए थे।
- तब चीन में ब्रिटेन के राजदूत रहे एलन डोनाल्ड ने इन दस्तावेजों को लंदन भेजा था। डोनाल्ड ने टेलीग्राम करके कहा था कि कम से कम 10 हजार आम नागरिक मारे गए। नरसंहार के एक दिन बाद पांच जून, 1989 को बताई गई संख्या उस समय आम तौर पर बताई गई संख्या से करीब 10 गुना ज्यादा है।
दो स्वतंत्र सूत्र एक बात कह रहे
- चीन के इतिहास, भाषा और संस्कृति के जानकार एक फ्रांसीसी विशेषज्ञ ज्यां पीए काबेस्तन भी मानते हैं कि ब्रिटिश आंकड़ा भरोसेमंद है और सार्वजनिक किए गए अमेरिकी दस्तावेजों में भी ऐसा ही आकलन है।
- हांगकांग बैपटिस्ट यूनिवसिर्टी के प्रोफेसर काबेस्तन ने कहा कि दो स्वतंत्र सूत्र हैं, जो एक ही बात कह रहे हैं। इससे सच्चाई साफ हो जाती है। बता दें कि जून, 1989 के अंत में चीनी सरकार ने दावा करते हुए कहा था कि क्रांति विरोधी दंगों के दमन में 200 असैन्य मारे गए और दर्जनों पुलिस एवं सेनाकर्मी घायल हो गए।
चीन की सरकार बोलने नहीं देती
- इस नरसंहार के करीब तीन दशक बाद भी चीन की कम्युनिस्ट सरकार इस विषय पर किसी भी तरह की बहस, उल्लेख वगैरह की मंजूरी नहीं देती है। यहां तक कि स्कूली किताबों और मीडिया में घटना के उल्लेख की मंजूरी नहीं दी गई है और इंटरनेट पर इससे जुड़ी सूचना प्रतिबंधित है।
- बता दें कि चीन की राजधानी बीजिंग के थियानमेन चौक पर 1989 में छात्रों के नेतृत्व में विशाल विरोध प्रदर्शन हुआ था। ये विरोध प्रदर्शन अप्रैल 1989 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव और उदार सुधारवादी हू याओबांग की मौत के बाद शुरू हुए थे। हू चीन के रूढ़िवादियों और सरकार की आर्थिक और राजनीतिक नीति के विरोध में थे और हारने के कारण उन्हें हटा दिया गया था। छात्रों ने उन्हीं की याद में एक मार्च आयोजित किया था।
मार्शल लॉ लागू होते ही मचा तांडव
- थियानमेन चौक पर तीन और चार जून 1989 को सरकार के खिलाफ प्रदर्शन और तेज हो गए थे। छात्र यहां सात सप्ताह से डेरा जमाए बैठे थे। इसे देखते हुए बीजिंग में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने बंदूकों और टैंकरों का सहारा लेकर नि:शस्त्र नागरिकों के शांतिपूर्वक प्रदर्शन को बुरी तरह से कुचल डाला।
- ऐसा चीन के इतिहास में कभी नहीं हुआ था। इसे लेकर आज भी चीन को आलोचना झेलनी पड़ती है। सरकारी आंकड़े यही कहते हैं कि 200 लोग मारे गए और लगभग 7 हजार घायल हुए। परंतु मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे झूठ मानते हुए यह आंकड़ा कहीं अधिक होने की बात कहते हैं।