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नेपाल: नहीं टलेंगे आम चुनाव, देउबा ने दिए नवंबर में मतदान के संकेत

Mon, 06 Jun 2022 06:19 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 06 Jun 2022 06:19 PM IST
सार

विश्लेषकों के मुताबिक देउबा के ताजा बयान से इन कयासों पर विराम लग जाएगा कि आम चुनाव को अगले साल फरवरी तक टाला जा सकता है। सत्ताधारी गठबंधन के कुछ नेताओं ने चुनाव फरवरी तक टालने की मांग की थी। इसी मांग के बारे में पूछे जाने पर देउबा ने कहा- ‘अगर चुनाव तय समयसीमा से आगे टाले गए, तो विवाद खड़ा होगा...

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PM sher bahadur deuba give clear indication about general elections in Nepal could be held in November 2023
शेर बहादुर देउबा - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

नेपाल में संसदीय आम चुनाव अगले साल नवंबर में होंगे। प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने इस बारे में साफ संकेत दिया है। अखबार कांतिपुर समाचार से बातचीत में देउबा ने कहा- ‘हम सत्ताधारी गठबंधन के भीतर इस बारे में चर्चा कर रहे हैं। चुनाव नवंबर खत्म होने से पहले संपन्न करा लिया जाएगा।’

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विश्लेषकों के मुताबिक देउबा के ताजा बयान से इन कयासों पर विराम लग जाएगा कि आम चुनाव को अगले साल फरवरी तक टाला जा सकता है। सत्ताधारी गठबंधन के कुछ नेताओं ने चुनाव फरवरी तक टालने की मांग की थी। इसी मांग के बारे में पूछे जाने पर देउबा ने कहा- ‘अगर चुनाव तय समयसीमा से आगे टाले गए, तो विवाद खड़ा होगा। आप (मीडिया) आलोचना करेंगे कि चुनावों में देर की जा रही है।’

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स्थानीय चुनावों में जीत से बढ़ा हौसला

विश्लेषकों के मुताबिक हाल के स्थानीय चुनावों के नतीजों से देउबा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस का हौसला बढ़ा हुआ है। बीते 13 मई को हुए इन चुनावों में नेपाली कांग्रेस पहले नंबर पर आई। बताया जाता है कि पार्टी के प्रति दिखे मजबूत समर्थन के कारण देउबा चुनाव टालने के पक्ष में नहीं हैं। वे जल्द से जल्द चुनाव करवा कर वर्तमान स्थिति का लाभ उठाने के मूड में हैं।

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नेपाली कांग्रेस का आकलन है कि सत्ताधारी गठबंधन में शामिल बाकी चारों दल इस समय बचाव की मुद्रा में हैं। वैसे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) को स्थानीय चुनावों में अच्छी सफलता मिली, लेकिन सत्ताधारी गठबंधन छोड़ने का विकल्प फिलहाल उसके पास नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड सोशलिस्ट) को यह शिकायत जरूर है कि गठबंधन सहयोगियों ने स्थानीय चुनावों में उसके उम्मीदवारों का साथ नहीं दिया, इसके बावजूद विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) से उसके कड़वे संबंध के कारण सत्ताधारी गठबंधन में बने रहना उसकी मजबूरी है। जनता समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनमोर्चा की ताकत काफी घट गई है। ऐसे में वे अलग होती हैं, तब भी सत्ताधारी गठबंधन पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों की भी राय है कि जल्द चुनाव होना नेपाली कांग्रेस के फायदे में रहेगा। इसीलिए देउबा ने गठबंधन सहयोगियों से चुनाव के समय के बारे में विचार-विमर्श शुरू कर दिया है। शनिवार को उन्होंने गृह मंत्री बाल कृष्ण खनाल को माओइस्ट सेंटर के नेता पुष्प कमल दहल से मिलने के लिए भेजा। दहल के कार्यालय ने इसके बाद एक बयान जारी किया, जिसके मुताबिक खनाल के साथ उनकी चुनाव की तारीख और सत्ताधारी गठबंधन जारी रखने के बारे में बातचीत हुई।

लेफ्ट एलायंस पर नजर

विश्लेषकों के मुताबिक देउबा की पूरी कोशिश यह है कि 2017 की तरह अगले चुनाव में लेफ्ट एलायंस न बन सके। तब आज की तीनों कम्युनिस्ट पार्टियां केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में एकजुट हो गई थीं। उसका नतीजा उन्हें चुनावी जीत के रूप में मिला था। लेकिन बाद में आपसी लड़ाई के कारण कम्युनिस्ट बिखर गए। उस कारण नेपाली कांग्रेस को सत्ता में आने का मौका मिला।

नेपाली संसद के निचले सदन की 165 सीटों के लिए प्रत्यक्ष मतदान होता है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक सत्ताधारी गठबंधन के सामने असल चुनौती इन सीटों के बंटवारे की होगी। बताया जाता है कि नेपाली कांग्रेस बाकी चारों दलों के लिए सिर्फ 65 सीटें छोड़ना चाहती है। जबकि दहल चाहते हैं कि सिर्फ उनकी पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए 65 सीटें दी जाएं। विश्लेषकों के मुताबिक इस मुद्दे पर सहमति बनाना सत्ताधारी गठबंधन के लिए बेहद मुश्किल हो सकता है।



काठमांडो में तिब्बती शरणार्थियों ने स्थानीय नेताओं को चुना
काठमांडो में तिब्बती शरणार्थियों ने ‘बुद्ध’ और ‘जोरपति’ से अपने स्थानीय नेताओं को चुना। जोरपति एक आबादी वाला इलाका है और बागमती क्षेत्र में स्थित है, जबकि बुद्ध फुबरी के पास और नेपाल में गुंबा के करीब स्थित है। यद्यपि तिब्बती लोग नेपाल में शरणार्थी हैं लेकिन उन्होंने स्थानीय चुनाव कराते हुए बाबू कलसांग और फुरबू तानसी को अपना नेता चुना है। बाबू को 577 और फुरबू को 476 मत मिले। नेपाल सरकार ने लोकतंत्र व मानवाधिकारों के लिए तिब्बती शरणार्थियों को आंतरिक चुनाव कराने की अनुमति दी है।

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