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चुनावी गहमागहमी से सत्ताधारी क्यों गायब?

Sat, 11 May 2013 11:43 AM IST
Updated Sat, 11 May 2013 11:43 AM IST
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why pakistan peoples party is not active in pakistan elections

‘तुम हमें मौत से डराते हो, अरे हम तो वो लोग हैं जो मौत का पीछा करते हैं।’

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ये तेवर थे राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के जो 4 अप्रैल 2012 को गढ़ी खुदा बख्श में दिखे थे।

वही गढ़ी खुदा बख्श जहां पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो और उनके पिता और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के संस्थापक जुल्फिकार अली भुट्टो दफन हैं।

रॉकेट हमले और फ़ायरिंग के बीच वोटिंग जारी


और फिर इसी गढ़ी खुदा बख्श में बिलावल को बाकायदा तौर पर पार्टी के युवराज के तौर पर मुख्य वक्ता की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

इसके बाद न जाने क्या हुआ और क्या होता चला गया।

बेकार बैठे हैं कार्यकर्ता

अब ये हाल है कि सिंध को छोड़ कर बाकी हिस्सों में तीर उड़ तो रहा है, मगर अंधेरे में।

45 साल पहले पाकिस्तान में रैलियों के चलन को शुरू करने वाली पीपल्स पार्टी की जियाला ब्रिगेड को ऐसी फुरसत कभी नहीं मिली थी कि किसी चुनावी दफ्तर में बैठने के बजाय वो टीवी पर अपनी पार्टी का प्रचार अभियान देखती रहे।
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पाकिस्तानी प्रांत पंजाब की राजधानी लाहौर से जुल्फिकार अली भुट्टो को लाड़काना (भुट्टो परिवार का पैतृक शहर) जैसा लगाव था।

यहीं से बेनजीर भुट्टो अपनी चुनावी मुहिम की आखिरी रैली का आयोजन करती रहीं थीं।

उसी लाहौर में कई जियाले ऐसे भी मिले जिन्हें चुनावी दिनों वाली व्यस्तता की कमी अंदर ही अंदर खाए जा रही है।

होगा वो जो पहले कभी नहीं हुआ


कुछ इस तरह जैसे नई दुल्हन को पति की बेरुखी खाए जाती है।

पार्टी नेतृत्व या तो वीडियो में कैद है या ऊंची दीवारों के पीछे या फिर अपनी पारिवारिक दुनिया में हैं।

चुनावी फ्रेंचाइजी

पहले पीपल्स पार्टी की हर सरकार के दौरान ये होता था कि कार्यकर्ता भले ही खुद को सत्ता के दिनों कितना ही नजरअंदाज महसूस करते हो।

लेकिन चुनावी मौसम में वो सब कुछ भुला कर नाराज बेटों की तरह घर लौट आते थे।

किसी का शिकवा गले लगाकर दूर हो जाता था कोई अफसोस जताने भर पर ही राजी हो जाता था।

कोई दो गालियां देकर खुद को हल्का कर लेता और फिर दीवानों की तरह अपनी पार्टी की प्रचार मुहिम में व्यस्त हो जाता था।

अब की बार वो हुआ है जो पहले नहीं हुआ था। जितने भी टिकट बंटे उनमें से ज्यादातर परिवारों में बंट गए।

मसलन पंजाब के ओकाड़ा में पीपल्स पार्टी का मतलब है विटो खानदान। मुल्तान में चुनावी फ्रेंचाइजी गिलानी परिवार के पास है।

इसी तरह सिंध में मखदूम, मिर्जा और जरदारी परिवार ने टिकटों का स्टॉक ले लिया है।

खैबर पख्तून ख्वाह में सैफुल्लाह परिवार और उनक चेले चपाटे टिकटों टिकट हो गए और बाकी टिकट अरबपति चुनाव जिताऊ उम्मीदवार ले उड़े।

यहां तक हुआ कि कुछ चुनाव जिताऊ उम्मीदवारों ओं ने एक शाम टिकट ले लिए और अगली शाम किसी और पार्टी से अच्छी डील होने पर वापस कर दिए।

फिर भी जो टिकट बच गए, वो कार्यकर्ताओं को दे दिए गए जैसे शराब के जाम में कुछ बूंदें छोड़ दी जाएं।

जैसे मेज पर बचा हुआ खाना नौकरों में बांट दिया जा। अगर ऐसे में कार्यकर्ता गायब है तो हैरानी क्यों?

खतरों का डर


पीपल्स पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कह रहा है कि पारंपरिक रैलियों और जनसभाओं से इसलिए गुरेज बरता जा रहा है।

क्योंकि वो अपने कार्यकर्ताओं और आम लोगों की जान को खतरे में नहीं डालना चाहते हैं।

पार्टी के अनुसार उसने पांच साल में बेनजीर इनकम सपोर्ट प्रोग्राम, कृषि उत्पादों की कीमतों में वृद्धि और संविधान में 18वें संशोधन (जिसके तहत राष्ट्रपति से एकतरफा तौर पर संसद को भंग करने की शक्ति छीनी गई है) जैसे कुछ बुनियादी कदम उठाए हैं कि आम आदमी वोट डालते वक्त उन्हें ध्यान में रखे।
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अगर ये तर्क सही है तो बेनजीर को पाकिस्तान आना ही नहीं चाहिए था।

सभी वोटर जानते हैं कि वो किसकी बेटी थी? तानाशाहों के खिलाफ उनका कितना योगदान था?

और पाकिस्तान आने पर बेनजीर भुट्टो को स्टेट और नॉन स्टेट की तरफ से किस कदर जान का खतरा था?

अगर वो वो आ भी गई थीं तो 18 अक्तूबर 2007 को कार बम धमाके के बाद अगले दिन उन्हें दुबई में होना चाहिए था।

दरअसल जिस खतरे पर बेनजीर भुट्टो ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। आज उसी खतरे से उनकी पार्टी भागी फिर रही है।

ये जाने बगैर कि पीछे हटने वाली का नुकसान खड़ी फौज से दोगुना होता है।

(वुसतुल्लाह ख़ान, बीबीसी संवाददाता, गुजरात, पाकिस्तान)

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