आसिया बीबी: पाकिस्तान में ईशनिंदा का सबसे बदनाम मुकदमा
- आसिया बीबी को उनके अपने घर से खींच कर बाहर निकाला गया, पीटा गया।
- उन्हें गुस्साई भीड़ के सामने गिरफ्तार किया गया, उसके बाद वो आज तक अपने गांव नहीं लौटी हैं।
- करीब एक दशक तक चले ईशनिंदा के मुकदमे के बाद आसिया को हाल में बरी किया गया है।
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विस्तार
अपने पति और बच्चे के साथ रहने वाली आसिया बीबी घर से निकलकर काम के लिए खेतों में गईं। लाहौर से दक्षिण पूर्व में करीब 40 मील दूरी पर उनका गांव इतानवाला काफी हरा भरा इलाका है, जहां फलों के कई बगीचे हैं। ये पाकिस्तानी पंजाब के सबसे उपजाऊ इलाकों में एक है। गांव की दूसरी महिलाओं की तरह आसिया इन बगीचों में काम करती थीं। वो जून का महीना था जब महिलाएं फालसा इकट्ठा करने के लिए खेतों में जमा हुई थीं। चिलचिलाती धूप में,कई घंटे काम करने के बाद थकी और प्यासी महिलाएं सुस्ताने के लिए थोड़ी देर बैठ गईं थी। किसी ने आसिया को नजदीक के कुएं से पानी निकालकर लाने को कहा था।
उन्होंने पानी निकाला, जग में भरा और लाते वक्त प्यास के चलते उससे दो चार घूंट पानी पी लिया, इसके बाद उन्होंने जग मुस्लिम महिलाओं को थमाया। लेकिन वे सब इस बात से नाराज हो गईं। आप भी सोच रहे होंगे, इसमें ऐसी कौन सी बात हो गई थी। दरअसल आसिया ईसाई हैं। पाकिस्तान में कई कट्टरपंथी मुसलमान दूसरी धार्मिक आस्था वाले के हाथों से खाना पीना पसंद नहीं करते हैं। वे मानते हैं कि जो मुसलमान नहीं हैं, वे अशुद्ध होते हैं।
साथ काम करने वाली महिलाओं ने आसिया से कहा कि तुम गंदी हो और तुम्हें उसी जग में पानी नहीं पीना चाहिए था। बात विवाद तक पहुंच गई, दोनों तरफ से कहासुनी भी हो गई। पांच दिन बाद, आसिया के घर में जबरन पुलिस आ धमकी और कहा कि आसिया ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया है। घर के बाहर गुस्साई भीड़ थी, जिसमें गांव के मौलवी भी शामिल थे। वे आसिया पर ईशनिंदा का आरोप लगा रहे थे। आसिया को जबर्दस्ती खींचकर बाहर निकाला गया।
गुस्से से तमतमाई भीड़ ने पुलिस के सामने ही आसिया को पीटना शुरू कर दिया। आसिया को गिरफ्तार किया गया और उन पर ईशनिंदा का मुकदमा चला। सुनवाई के दौरान आसिया खुद को निर्दोष बताती रहीं, लेकिन साल 2010 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। बीते नौ साल से वे जेल में एकांतवास या कहें काल कोठरी की सजा भुगत रहीं थीं।
पाकिस्तान में इस्लाम और पैगंबर के ख़िलाफ ईशनिंदा करने वालों को आजीवन कैद या फिर मौत की सजा दी जाती है। लेकिन कई बार ईशनिंदा के आरोप निजी खुन्नस निकालने के लिए लगाए जाते हैं। एक बार जिस किसी पर ईशनिंदा के आरोप लग जाते हैं तो सुनवाई शुरू होने से पहले ही उस पर और उसके परिवार वालों पर हमले शुरू हो जाते हैं।
मैं करीब साल भर पहले एक गोपनीय जगह पर आसिया के शौहर आशिक से मिली। आशिक और उनके बच्चे आसिया की गिरफ्तारी के बाद इधर-उधर छिपकर रहने को मजबूर थे।
आशिक ने बताया, "अगर किसी करीबी की मौत हो जाए, तो कुछ दिनों में मरहम लग जाता है। लेकिन मां जीवित हो और उसे उसके बच्चों से अलग कर दिया जाए।।। जिस तरह से आसिया हम लोगों के बीच से ले जाई गईं थीं, तब दुख हद से गुजर जाता है।"
पर्दे से घिरे बरामदे में बैठे आशिक खुद को संयत रखने की भरसक कोशिश करते हैं लेकिन कई बार उनका चेहरा गमगीन हो उठता है। "हर पल डर में रह रहे हैं, सुरक्षा का डर हमेशा सताता है। हम लोगों के साथ कुछ भी हो सकता है। मैं बच्चों को केवल स्कूल भेजता हूं, घर के बाहर खेलने पर रोक लगी है, हम सबकी आजादी छिन चुकी है।"
"असुरक्षा औरअनिश्चितता के कई साल बीतने के बाद भी आशिक ने आसिया को लेकर उम्मीद नहीं छोड़ी। मैंने अपनी आजादी खोई, मेरा घर और मेरी आजीविका सब छीन गई, लेकिन मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी। मैं आसिया की रिहाई के लिए कोशिश करता रहा।" आसिया की गिरफ्तारी के नौ साल बाद आख़िरकार बीते साल वो 31 अक्टूबर का दिन आ ही गया, जब आशिक की दुआएं कबूल हुईं।
हजारों कट्टर मुसलमानों की उम्मीदों के उलट, पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने सबूत के अभाव में पहले दी गई सजा को रद्द करते हुए आसिया बीबी को रिहा करने का आदेश दिया था। आदेश के कुछ ही घंटों के अंदर सड़कों पर लोग इसके विरोध में उतर आए। ये सब लोग एक ही मांग कर रहे थे, "आसिया बीबी को मौत की सजा दो।आसिया बीबी को मौत की सजा दो।"
विरोध प्रदर्शन
लगातार तीन दिनों तक विरोध प्रदर्शन करने वालों ने सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए हर संभव दबाव डाला। मुख्य सड़कों को बंद कर दिया गया, कारों और बसों को जला दिया गया, टोल बूथों पर तोड़-फोड़ की गई। इतना ही नहीं, पुलिस अधिकारियों पर भी हमले हुए। ख़ासकर पूर्वी पंजाब में, जहां हिंसा की घटनाओं को देखते हुए को देखते हुए दफ्तर,बाजार और स्कूलों को बंद करना पड़ा क्योंकि सड़क पर चलना संभव नहीं रह गया था।
इस दौरान पूरे देश में डर और आतंक का माहौल था जबकि सरकार कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। इसके बाद पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने देश को टेलीविजन के जरिए संबोधित किया। उन्होंने विरोध प्रदर्शन करने वालों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे लोग सरकार से टकराव का रास्ता नहीं चुनें।
तीन दिनों तक चली उथल-पुथल के बाद सरकार ने कहा कि वो किसी भी ख़ून ख़राबे को रोकने के लिए विद्रोह पर उतारू लोगों से बातचीत करेगी। आसिया बीबी की रिहाई के तुरंत बाद ख़ादिम हुसैन रिजवी और उनकी धार्मिक रुझान वाली राजनीतिक पार्टी तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान (टीएलपी) ने सोशम मीडिया के सहारे सामाजिक अव्यवस्था और हिंसा को बढ़ावा दिया था।
इन लोगों ने आसिया को रिहा करने वाले जजों की हत्या तक का फतवा जारी कर दिया, सेना में विद्रोह के लिए सैनिकों को प्रोत्साहित किया गया, इसके लिए सेना प्रमुख के बारे में ये भी प्रचारित किया गया है कि उन्होंने विश्वासघात करते हुए इस्लाम को त्याग दिया है।
इन लोगों को अपनी पार्टी से बाहर भी जोरदार समर्थन मिला, सोशल मीडिया पर फैले वीडियो क्लिप के जरिए समाज के सभी तबकों के हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, व्हीलचेयर पर चलने वाले 53 साल के मौलवी रिजवी ने ट्वीट किया, "आसिया की रिहाई इंसाफ से मरहूम करने जैसा है।"
इसकी आड़ में उन्होंने घृणा फैलाने वाला अपना भाषण भी दिया। रिजवी ने ये भी आरोप लगाया कि पश्चिमी देश इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ ईशनिंदा को बढ़ावा दे रहे हैं। अपने एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि लोग जानबूझकर ईशनिंदा करते हैं ताकि उन्हें पश्चिमी देशों से पैसा और संरक्षण मिल सके।
कुछ साल पहले तक रिजवी एक छोटी सी मस्जिद में मौलवी हुआ करते थे। वे सरकारी कर्मचारी थे और लगभ नामालूम सी शख़्सियत फिर भी वे अपने विवादास्पद धार्मिक भाषणों के लिए जाने जाते थे।
धार्मिक उपदेश देते वक्त रिजवी आम तौर पर सलमान तासीर की हत्या को प्रशंसात्मक लहजे से बताते रहे हैं। तासीर उन राजनेताओं में एक थे, जो सार्वजनिक तौर पर आसिया बीबी से सहानुभूति रखते थे और ईशनिंदा कानून में बदलाव की वकालत करते थे।
पंजाब के गवर्नर के तौर पर तासीर ने साल 2010 में आसिया बीबी से मुलाकात के लिए शेखुपुरा जेल का दौरा किया था। नकाब पहने आसिया के साथ उनकी जो प्रेंस कॉन्फ्रेंस आई थी, उसमें तासीर ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति से आसिया को माफी दिए जाने की अपील की थी।
कुछ ही हफ्ते बाद जनवरी की एक सर्द सुबह तासीर की हत्या उनके अपने ही बॉडीगार्ड ने कर दी। इस्लामाबाद के व्यस्त खोसार बाजार के बीचोंबीच 26 साल के पुलिस कमांडो मलिक मुमताज हुसैन कादरी ने गवर्नर तासीर को प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से 27 गोलियां दागीं थीं।
इसके बाद कादरी रातों रात लाखों लोगों के लिए हीरो बन गए थे। उन्होंने खुद कोअधिकारियों के सामने पेश करते हुए कहा था, "मुझे तासीर की हत्या करने पर कोई पछतावा नहीं है, ये मेरी धार्मिक ड्यूटी थी।" उन्होंने पुलिस अधिकारियों को कहा था, "ईशनिंदा करने वालों की सजा तो मौत ही हो सकती है।"
सुरक्षा कारणों के चलते कुछ दिनों की देरी के बाद जब मामले की सुनवाई शुरू हुई तब कादरी का सैकड़ों समर्थकों ने उत्साह बढ़ाया था और उन पर गुलाब बरसाए थे। लेकिन कादरी को मौत की सजा मिली और साल 2016 में उन्हें फांसी दे दी गई।
मुमताज कादरी का जनाजा, 2016
रिजवी को कादरी की तारीफ करने और उन्हें शहीद बताने के चलते मौलवी की नौकरी से निकाल दिया गया। वे राजनीति में आ गए और उन्होंने अपने राजनीतिक दल टीएलपी की स्थापना की। पार्टी के गठन के कुछ ही महीनों के अंदर, उनके कार्यकर्ताओं ने मुख्य हाइवे को बंद कर दिया। इसके चलते राजधानी इस्लामाबाद 20 दिनों तक प्रभावित रहा।
रिजवी ने उस वक्त सरकार पर ही ईशनिंदा का आरोप लगाया था। इसकी वजह ये थी कि चुनावी शपथ के संशोधित संस्करण में पैगंबर मोहम्मद को अंतिम सत्य बताने वाला रिफ्रेंस शामिल नहीं किया गया था।
इसके बाद बीते साल हुए चुनाव में रिजवी ने खुद को पैगंबर मोहम्मद के सम्मान का रक्षक बताया, जिसके आधार पर उनकी छोटी सी राजनीतिक पार्टी को 20 लाख से ज्यादा मत मिले। पूरे अभियान के दौरान इनके पोस्टर और बैनरों पर कादरी को शहीद बताने वाली तस्वीरें लगी हुई थीं।
बहरहाल तीन दिनों तक पाकिस्तान में चले टीएलपी के विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने सुलह का रास्ता बनाया। सरकार इस बात पर तैयार हुई कि आसिया की रिहाई को बदलने वाली याचिका का विरोध नहीं करेगी और आसिया के देश छोड़ने पर पाबंदी लगाएगी।
याचिका दाखिल होने के बाद भीड़ हटी, आसिया को जेल से रिहा किया गया लेकिन सुरक्षा के लिहाज से उन्हें फिर हिरासत में ले लिया गया। आख़िरकार आसिया को रिहा होने के लिए तीन महीने का इंतजार करना पड़ा।
भीड़ का इंसाफ
पाकिस्तान में बीते 30 साल से पैगंबर मोहम्मद की निंदा करने पर मौत की सजा काप्रावधान है लेकिन ईशनिंदा के चलते अभी तक किसी को मौत की सजा नहीं दी गई है। पाकिस्तान के सेंटर फॉर सोशल जस्टिस के मुताबिक अब तक पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफनिंदा वाले या फिर कुरान की बेअदबी जैसे गंभीर आरोपों वाले ईशनिंदा के 1549 मामले सामनेदर्ज किए गए हैं।
इनमें से 75 अभियुक्तों की हत्या सुनवाई शुरू होने से पहलेकर दी गई। कई अभियुक्तों की मौत पुलिस हिरासत में हुई, कुछ को भीड़ ने मार डाला। ऐसा ही एक वाकया लाहौर से 30 मील दक्षिण में हिंदू देवताओं के नाम पर बसे एक छोटे से शहर कोट राधा किशन में देखने को मिला था। कोट राधा किशन के चारों तरफ हरे भरे खेत नजर आते हैं। लेकिन हर आधे मील की दूरी पर यहां आग उगलती चिमनियां नजर आती हैं, जिनकी भट्ठियों में ईंटें पक रही होती हैं।
ईशनिंदा के आरोप में ईसाई जोड़े शहजाद और शमा मसीह को साल 2014 में भीड़ ने जिंदा जला दिया था। स्थानीय पत्रकार राणा खालिद उस घटना को याद करते हुए एक चिमनी के पास ईंट के बने एक छोटे से कमरे की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, "उन दोनों को इसी कमरे में बंद रखा गया था ताकि उन्हें भीड़ से बचाया जा सके।"
लेकिन जैसा कि खालिद बताते हैं कि स्थानीय मौलवी के नेतृत्व में जमा भीड़ इतनी गुस्साई थी कि कुछ लोग इस कमरे की छत पर चढ़ गए और उन्होंने छत तोड़कर दोनों को बाहर निकाल लिया। खालिद कहते हैं, "उन दोनों को पहले तो लाठी और ईंटों से बुरी तरह मारा पीटा गया और उसके बाद गांव के आक्रोशित लोगों ने उन दोनों को भट्ठी में झोंक दिया।"
शमा तब चार महीने की गर्भवती थीं। भीड़ इस बात पर यकीन कर रही थी कि शहजाद और शमा ने कुरान के कई पन्नों को जलाया है। शहजाद का परिवार आज भी इससे इनकार करता है। उनका कहना है कि दोनों ने अपने पिता के कुछ पुराने दस्तावेजों को जलाया था।
शमा और शहजाद की हत्या के आरोप में स्थानीय मौलवी सहित पांच लोगों को मौत की सजा हुई और गांव के ही आठ अन्य लोगों को हिंसा करने के आरोप में दो-दो साल की जेल की सजा हुई। पाकिस्तान के इस विवादास्पद कानून की आग केवल ईसाइयों को नहीं जला रही है। इसका इस्तेमाल पाकिस्तान के अहमदिया मुसलमानों को सताने के लिए भी किया जा रहा है।
अहमदिया मुसलमानों को पाकिस्तान में गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक माना जाता है। कानून के मुताबिक अहमदिया अपनी इबादत की जगह को ना तो मस्जिद कह सकते हैं और ना ही कुरान की आयातें पढ़ सकते हैं। इतना ही नहीं सार्वजनिक जगहों पर उन्हें अपनी धार्मिक आस्था को प्रदर्शित करने की इजाजत भी नहीं है। असलम जमील (असली नाम नहीं) एक अहमदिया किसान हुआ करते थे। वे साल 2009 में दक्षिण पंजाब में अपने गेहूं के खेत में काम कर रहे थे, तब कुछ स्थानीय लोगों ने आकर कहा कि यहां से भागो।
असलम पर स्थानीय इमाम ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने का आरोप लगाया था, इसके बाद उनके जान के पीछे स्थानीय लोगों की भीड़ पड़ गई थी। भरे हुए गले से असलम बताते हैं, "मौलवी ने आरोप लगाया था कि मैंने पैगंबर का नाम शौचालय में लिखने के लिए चार अहमदिया बच्चों को उकसाया, हालांकि खुदा जानता है कि ये झूठ है।"
असलम ने अंधेरा होने का इंतजार किया और अपने घर के पिछले दरवाजे से निकल भागे लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि भागने से उनकी मुश्किल और बढ़ जाएगी। ऐसे में वो कहां जाएं, ये सवाल बना हुआ था।
अगली सुबह, उन्होंने खुद को स्थानीय पुलिस स्टेशन के हवाले कर दिया। उनके केस की सुनवाई शुरू होने में दो महीने का वक्त लगा और उन्हें छह महीने जेल में बिताने पड़े। उनका चेहरा उत्तेजित हो जाता है जब वो बताते हैं, "जज पर काफी दबाव था। अदालत का पूरा कमरा मौलवियों से भरा था, लेकिन जज ने काफी साहस दिखाया।"
असलम पर लगे आरोपों को सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया गया। लेकिन घर लौटने के बाद असलम ने देखा कि उनके घर को लूट लिया गया है, उनके मवेशियों को भी चुरा लिया गया था। उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि अब उन्हें देश छोड़ना होगा। उन्होंने कनाडा में शरण मांगी है।
असलम बताते हैं, "मेरे परिवार को धमकी दी गई, उन्हें परेशान किया गया। मेरी रोजी रोटी छीन ली गई। मुझे तबाह कर दिया गया। जिंदगी बचाने के लिए हम लोगों ने गांव छोड़ दिया।" जिन लोगों पर ईशनिंदा के मामले चलते हैं और जिन्हें ईशनिंदा का दोषी पाया जाता है, उनके साथ ये कलंक अदालत और जेल के बाहर भी चिपक जाता है।
शकील वाजिद (असली नाम नहीं) भी अहमदिया हैं। वे बताते हैं कि किस तरह से सुनवाई के दौरान भीड़ जमा होती है।
वे कहते हैं, "सुनवाई के दौरान जमा होने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों से निचली अदालतों के जजों पर ऊपरी अदालत के जजों की तुलना में कहीं ज्यादा दबाव होता है। निचली अदालतों के जज के पास नाममात्र की सुरक्षा व्यवस्था होती है, उन्हें अपनी जान को भी देखना पड़ता है।"
ईशनिंदा के आरोप में दोषी ठहराए जाने के बाद शकील ने पंजाब के तीन बेहद सुरक्षित जेलों में दो साल बिताए हैं। उन्होंने बताया कि किस तरह से ईशनिंदा के आरोपों का सामना कर रहे अभियुक्तों को एकदम अलग, अति सुरक्षा वाले बैरकों में रखा जाता है। अमूमन उन्हें मानसिक रूप से बीमार लोगों के साथ भी रखा जाता है।
ज्यादातर समय उन्हें अपने बैरकों में बंद रखा जाता है और उनकी सुरक्षा के चलते ही उन्हें आम कैदियों के साथ खाने के लिए नहीं भेजा जाता, आशंका ये भी रहती है कि कोई उनको जहर ना दे दे।
शकील बताते हैं, "मेरे साथ रावलपिंडी की जेल में एक कैदी थे। वो यूनिवर्सिटी प्रोफेसर थे। वे जिस तरह से जन्नत और दोजख के बारे में बताते थे, उससे एक छात्र सहमत नहीं हुआ और उसने ईशनिंदा का मुकदमा दर्ज करा दिया।"
शकील मानते हैं कि वे उन गिने-चुने खुशकिस्मत लोगों में से हैं जिन्हें अपनी आजादी वापस मिली है, लेकिन आजादी मिलने से ज्यादा वे इस आरोप से बरी होना चाहते हैं। वे कहते हैं, "ईशनिंदा के इलजाम का चस्पा, मौत के डर से भी भयावह है। मैं इस गंभीर आरोप के साथ मरना नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि इस मामले में मैं बरी हो जाऊं ताकि समाज में मेरा परिवार गरिमा के साथ रह पाए।"