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मुस्लिम होने की सजा भोग रहे हैं स्कूली छात्र?

Mon, 15 Jan 2018 04:27 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Mon, 15 Jan 2018 04:27 PM IST
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School students are being sentenced to be Muslim

ऐसे स्कूल और खेल के मैदान खतरनाक हो सकते हैं जहां बच्चों को अलग-थलग कर दिया जाता है या फिर परेशान किया जाता है। बच्चे अक्सर दिखावट, चमड़ी के रंग, खाने-पीने की आदतों, महिलाओं से द्वेष, होमोफोबिया और जातिवाद के जरिये अपने बराबर वालों को पीड़ा पहुंचाते हैं। और अब आई एक नई किताब के मुताबिक भारत और पूरी दुनिया में बढ़ते इस्लामोफोबिया के कारण नामी स्कूलों में मुस्लिम बच्चों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है।

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लेखिका नाजिया इरम ने अपनी किताब 'मदरिंग अ मुस्लिम' के लिए 12 शहरों में 145 परिवारों और दिल्ली के 25 नामी स्कूलों में पढ़ने वाले 100 बच्चों से बात की। वह बताती हैं कि पांच साल के बच्चे भी निशाने पर लिए जा रहे हैं।
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'ये मजाक नहीं बुलिंग है'
नाजिया इरम ने बताया, "अपने शोध के दौरान मैं हैरान रह गई। मैंने सोचा नहीं था कि इन उच्चवर्गीय स्कूलों में ऐसा हो रहा है।" वह पूछती हैं, "जब पांच और छह साल के बच्चे कहते हैं कि उन्हें पाकिस्तानी या आतंकवादी कहा जा रहा है तो आप क्या जवाब देंगे? आप स्कूल से क्या शिकायत करेंगे?" "इनमें से बहुत सारी बातें मजाक में कही जाती हैं, हंसने के लिए कही जाती हैं। ऐसा लग सकता है कि इस उपहास का कोई नुकसान नहीं है। मगर ऐसा नहीं होता। यह दरअसल बुलीइंग है, उत्पीड़न है।" इरम ने अपनी किताब के लिए जिन बच्चों से बातचीत की, उन्होंने बताया कि कौन-कौन से सवाल उनसे किए जाते हैं या क्या-क्या टिप्पणियां उनके ऊपर की जाती हैं।
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•क्या तुम मुसलमान हो? मैं मुसलमानों से नफरत करता हूं।
•क्या तुम्हारे मां-बाप घर पर बम बनाते हैं?
•क्या तुम्हारे पापा तालिबान में हैं?
•वह पाकिस्तानी है।
•वह आतंकवादी है।
•उसे गुस्सा मत दिलाओ, वह तुम्हें बम से उड़ा देगी।

किताब के लॉन्च होने के बाद स्कूलों में धार्मिक द्वेष और पूर्वाग्रह को लेकर चर्चा छिड़ गई है। पिछले वीकेंड पर #MotheringAMuslim ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा था और लोग अपने अनुभवों को सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे थे।

पेश की जा रही है गलत छवि
भारत की 1.3 अरब में से लगभग 80 फीसदी आबादी हिंदू है और मुस्लिम 14.2 प्रतिशत हैं। वैसे तो ज्यादातर समय दोनों समुदाय शांति से रहे हैं, लेकिन 1947 में जब एक मुल्क से भारत और पाकिस्तान बने, तबसे धार्मिक विद्वेष अंदर ही अंदर उबल रहा था। विभाजन के दौरान बहुत खूनखराबा हुआ और धार्मिक हिंसा में 5 से 10 लाख लोगों की मौत हुई। इरम कहती हैं कि मुस्लिम विरोधी टिप्पणियां 1990 के दशक में हिंदू कट्टरपंथी समूहों द्वारा बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने और उसके बाद हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद से ही की जाती रही हैं मगर हाल के सालों में इनके स्वर और तीव्रता में बदलाव आया है।

2014 में जब वह पहली बार मां बनीं, तब वह इस संबंध में ज्यादा सचेत हुईं। इरम कहती हैं, "जब मैंने अपनी बच्ची माइरा को बांहों में लिया, पहली बार मुझे डर लगा।" वह बताती हैं कि वह तो बेटी को ऐसा नाम देने को लेकर भी चिंतित थीं जिससे यह पता चल जाए कि वह मुस्लिम है। भारत में यह धार्मिक विभाजन का दौर था। भारतीय जनता पार्टी ध्रुवीकरण आधारित चुनाव अभियान चला रही थी जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने में मदद मिली। हिंदू राष्ट्रवाद की भावना बढ़ी हुई थी और कुछ टीवी चैनल मुस्लिमों की खराब छवि पेश करते हुए उन्हें 'आक्रमणकारी, राष्ट्रविरोधी और देश की सुरक्षा के लिए खतरा' बता रहे थे।

पूरी दुनिया में हो रहा है ऐसा
इरम कहती हैं, "2014 से एक मुसलमान के तौर पर मेरी पहचान आगे हो गई और अन्य पहचानें पीछे छिप गईं। पूरे समुदाय में एक डर साफ महसूस किया जा सकता था। इसके बाद से दरार और चौड़ी हो गई। टीवी पर ध्रुवीकरण वाले तर्कों और बहसों ने पूर्वाग्रह बढ़ा दिए और अब वे बड़ों से बच्चों तक फैल गए हैं।" इरम कहती हैं, "खेल के मैदान, स्कूल, क्लास और स्कूल बस तक में मुस्लिम बच्चे को निशाने पर लिया जाता है, उसे अलग-थलग किया जाता है, उसे पाकिस्तानी, आईएस, बगदादी और आतंकवादी कहा जाता है।" अपनी किताब में वह कुछ बच्चों की आपबीती बताती हैं जो काफी डरावनी हैं।

•एक पांच साल की बच्ची इस बात से डरी हुई है कि 'मुस्लिम आ रहे हैं और वे हमें मार डालेंगे।' विडंबना यह है कि उसे यह नहीं पता कि वह खुद मुस्लिम है।
•एक 10 साल के बच्चे को तब बहुत शर्मिंदगी और गुस्सा महसूस हुआ जब यूरोप में एक आतंकवादी हमले के बाद एक सहपाठी ने पूछा- ये तुमने क्या किया?
•एक 17 साल के लड़के को 'आतंकवादी' कहा गया। जब उसकी मां ने ऐसा कहने वाले बच्चे की मां से संपर्क किया तो जवाब आया- मगर तुम्हारे बेटे ने मेरे बेटे को मोटा कहा।

धर्म के आधार पर परेशान किए जाने का मामला भारत तक सीमित नहीं है, पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। अमरीका में इसे 'ट्रंप इफेक्ट' कहा जाता है क्योंकि उनके यहां ऐसी रिपोर्टें आई थीं कि उनके राष्ट्रपति चुनाव के लिए अभियान से बच्चों के बीच डर और चिंता का स्तर बढ़ गया था और कक्षाओं में नस्लीय आधार पर तनाव में भी बढ़ोतरी हुई थी। तो क्या भारत के स्कूलों में मुस्लिम बच्चों को परेशान किए जाने की घटनाओं में बढ़ोतरी को 'मोदी इफेक्ट' कहा जा सकता है? इरम कहती हैं, "सभी राजनेता एक जैसी भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं और इनमें इस्लामी पार्टियां भी शामिल हैं।"

वह कहती हैं कि स्कूलों ने ये मानने से ही इनकार कर दिया कि उनके यहां धार्मिक आधार पर बच्चों को परेशान किया गया है। वह कहती हैं कि ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि बहुत से मामलों की शिकायत नहीं की जाती। बच्चे नहीं चाहते कि लोग उन्हें चुगलखोर के तौर पर देखें। साथ ही बहुत से माता-पिता इसे सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।

मगर चिंताजनक बात यह है कि इनके परिवार में सेल्फ-सेंसरशिप हावी हो गई है। मुस्लिम माता-पिता अपने बच्चों को कहने लगे हैं कि हमेशा सही से आचरण करें- बहस न करें, बम और बंदूकों वाली कंप्यूटर गेम्स में अच्छा प्रदर्शन करें, एयरपोर्ट पर चुटकुले न सुनाएं, बाहर जाते समय पारंपरिक परिधान न पहनें। इरम कहती हैं कि ये चेताने वाला संकेत हैं और माता-पिता और स्कूलों को सांप्रदायिक आधार पर होने वाली बुलीइंग का मुकाबला करने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए। वह कहती हैं, "पहला कदम तो यही है कि समस्या को स्वीकार किया जाए और फिर इस पर बात की जाए। आरोप-प्रत्यारोप से कुछ होने वाला नहीं है।"


"अगर इस समस्या को हल नहीं किया गया तो यह टीवी पर रात नौ बजे की बहसों या अखबारों की सुर्खियों तक सीमित नहीं रहेगी। क्योंकि नफरत सबकुछ निगल जाती है। इसका असर अत्याचारी और पीड़ित दोनों पर बराबर पड़ता है।"

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