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जब वो मुझे बिच और वेश्या कहने लगे...
बीबीसी
Updated Tue, 26 Jul 2016 03:20 PM IST
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26 साल की बलोच को अक्सर ऑनलाइन गालियां दी जाती
- फोटो : BBC
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पाकिस्तानी सोशल मीडिया सेलिब्रिटी क़ंदील बलोच के ऑनर किलिंग से एक बार फिर पाकिस्तान में औरतों के अधिकारों और ऑनलाइन बोलने की आज़ादी पर बहस छिड़ गई है। 26 साल की बलोच को अक्सर ऑनलाइन गालियां दी जाती थीं। उनके कई मुखर और विवादास्पद पोस्ट के लिए उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी गई थी।
लेकिन पाकिस्तान में पत्रकारों समेत महिलाओं को अपनी बात सार्वजनिक तौर पर कहने के लिए अक्सर व्यंग्य और बदनामी का सामना करना पड़ता है। मुझे डर है कि डिजिटल नफ़रत जल्द ही हकीक़त बन सकती है। कुछ महीनों पहले, मैंने क़ंदील बलोच पर एक कहानी बीबीसी उर्दू के लिए की थी। इसमें मैंने उनकी पहचान सांस्कृतिक मील के पत्थर के रूप में की थी। उसके बाद तो मुझ पर अपशब्दों की बारिश शुरू हो गई। बीबीसी उर्दू और मुझ पर आरोप लगे कि हमारे पास इससे बेहतर कोई ख़बर दिखाने को नहीं है। कहा गया कि हमने एक वेश्या को जगह दी जिसने देश को बदनाम किया है।
समस्या कहानी या क़ंदील बलोच को लेकर नहीं थी, जिन्हें खुद भी ऑनलाइन अभद्रता झेलनी पड़ी। बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो ये दर्शाता है कि कैसे महिलाओं को ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। एक महिला पत्रकार के तौर पर उत्पीड़न, व्यक्तिगत हो जाता है। महिलाओं का अपमान करने के लिए लोकप्रिय शब्द वेश्या या उससे भी ख़राब शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। जब मैंने पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा पर कहानी की तो मुझे खंजर की तस्वीरें भेजी गईं। पत्रकारिता से इतर, महिला होने के नाते लोगों की नज़रों में एक अन्य पहलू हो सकता है, यौन संबंधित संदेश।
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लेकिन पाकिस्तान में पत्रकारों समेत महिलाओं को अपनी बात सार्वजनिक तौर पर कहने के लिए अक्सर व्यंग्य और बदनामी का सामना करना पड़ता है। मुझे डर है कि डिजिटल नफ़रत जल्द ही हकीक़त बन सकती है। कुछ महीनों पहले, मैंने क़ंदील बलोच पर एक कहानी बीबीसी उर्दू के लिए की थी। इसमें मैंने उनकी पहचान सांस्कृतिक मील के पत्थर के रूप में की थी। उसके बाद तो मुझ पर अपशब्दों की बारिश शुरू हो गई। बीबीसी उर्दू और मुझ पर आरोप लगे कि हमारे पास इससे बेहतर कोई ख़बर दिखाने को नहीं है। कहा गया कि हमने एक वेश्या को जगह दी जिसने देश को बदनाम किया है।
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समस्या कहानी या क़ंदील बलोच को लेकर नहीं थी, जिन्हें खुद भी ऑनलाइन अभद्रता झेलनी पड़ी। बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो ये दर्शाता है कि कैसे महिलाओं को ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। एक महिला पत्रकार के तौर पर उत्पीड़न, व्यक्तिगत हो जाता है। महिलाओं का अपमान करने के लिए लोकप्रिय शब्द वेश्या या उससे भी ख़राब शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। जब मैंने पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा पर कहानी की तो मुझे खंजर की तस्वीरें भेजी गईं। पत्रकारिता से इतर, महिला होने के नाते लोगों की नज़रों में एक अन्य पहलू हो सकता है, यौन संबंधित संदेश।
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मुझे धमकी का एहसास हुआ और मैं अपनी निजता
- फोटो : BBC
इसमें सेक्स के लिए आमंत्रण से लेकर, बलात्कार की कल्पनाओं का वर्णन करने के ग्राफिक चित्रों तक हर प्रकार के संदेश शामिल हैं। जहां तक हो सके मैं अपने फेसबुक अकाउंट की प्राइवेसी को नियंत्रित करती हूं, इसके बाद भी फेसबुक से मेरी निजी जानकारियां निकालकर मुझपर मेम्स बनाकर इंटरनेट पर फैलाए गए। पाकिस्तान में इस बात का डर हमेशा रहता है कि डिजिटल नफ़रत जल्द ही असल ज़िंदगी में सच हो सकती है।
मुझपर एसिड अटैक की धमकी दी गई। मैं दो ज़ीनत की कहानियां कहना चाह रही थी। एक की मौत हो गई और दूसरी गायब हो गई। लाहौर की ज़ीनत रफ़ीक़, जिसे इज़्ज़त के नाम पर उनकी मां ने जलाकर मार डाला था और दूसरी ज़ीनत शहज़ादी। एक युवा पत्रकार थी जिसे अपना काम करने पर कथित तौर पर सुरक्षा बलों ने अगवा कर लिया था, ये साफ़ हो गया कि महिलाएं किस तरह पाकिस्तानी समाज का सामना कर रही हैं। जैसे ही मैंने ये कहानी कहने की कोशिश की तो पाया कि मैं भी ख़तरे में हूं। अचानक मैंने पाया कि मैं ट्विटर और फेसबुक पर नियमित ट्रोलिंग की शिकार हूं।
हमलों में मेरी कहानी की आलोचना नहीं हो रही थी। वो ज्यादा व्यक्तिगत थे। वो शुरू हुए उन चिर-परिचित शब्दों से जिससे महिलाओं को अक्सर अपमानित किया जाता है जैसे 'बिच' और 'वेश्या'। फिर किसी ने एक दिन मेरा फोन नंबर पोस्ट किया निहित सलाह के साथ की 'मुझे सबक सिखाया जाएगा'। इसके बाद मेरे ऊपर हमले शुरू हुए जिसका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि मेरे लिंग से था। फिर मेरे पास एक मेसेज आया: "आपको रिपोर्टिंग का इतना शौक है। मैं तुम्हारे बैकग्राउंड पर एक जांच रिपोर्ट करूंगा। देखते हैं क्या मिलता है।"
क्योंकि मैं अहमदिया अल्पसंख्यकों के पलायान की ख़बर देती हूं
- फोटो : BBC
मुझे धमकी का एहसास हुआ और मैं अपनी निजता, अपने परिवार और दोस्तों के लिए डरने लगी। मैं अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स की सुरक्षा सेटिंग चेक करने को लेकर जुनूनी हो गई, मैं इस बात से खौफ़ज़दा थी कि कोई मेरे निजी तस्वीरों और जानकारियों को हासिल कर सकता है। ये दम घुटने वाला एहसास था, डर और रोष का मिला जुला मामला था। मैं जवाब देना चाहती थी। मैं चाहती थी कि ऑनलाइन हमलावर ये समझे कि मैं एक इंसान हूं, लेकिन मैं उन्हें और अधिक भड़काने से डर रही थी। इसलिए मैं चुप हो गई। हाल ही में मेरे पास के एक फोन आया। एक अनजान आदमी ने मुझसे कहा कि मैंने जो किया वो उन्हें अच्छा नहीं लगा और मुझे धमकी दी कि मेरे चेहरे पर एसिड फेकेंगे।
उन्होंने मेरा पता मेरे सामने दोहराया। उन्होंने कहा, "तुम महिलाओं पर एसिड अटैक की रिपोर्ट करती हो। चलिए हम तुम्हें व्यक्तिगत तौर पर इसका एहसास कराते हैं।" मैं जानती हूं कि पाकिस्तान में अक्सर महिलाएं एसिड अटैक का शिकार होती हैं। मैं जानती हूं कि किसी भी ड्रग के दुकान से इसे बहुत सस्ते में खरीदा जा सकता है। मैं जानती हूं कि कैसे इन हिंसक धमकियों को असल में करके दिखाया जा सकता है। अब मैं जो भी कहानी कवर करती हूं, पहले उसके असर के बारे में भी सोचती हूं। लेकिन मैं चीज़ों को
मैं डरपोक नहीं हूं। लेकिन मैंने असहाय महसूस किया है। पत्रकार के तौर पर सरकारी दफ्तर में इंटरव्यू के लिए प्रतीक्षा करने के दौरान मुझे सिर से पांव तक घूरे जाने का अनुभव है। एक राजनीतिक रैली को कवर करने के दौरान एक युवक ने मुझे ज़बरदस्ती छू लिया। समय के साथ मुझमें ऐसे लोगों को सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा करने की हिम्मत आ गई है। लेकिन अब ऑनलाइन भी मुझे गाली दी जाती है। मुझे हाल ही में फेसबुक पर ट्रोल किया गया, जब मैंने पोस्ट लिखी कि कैसे क़ंदील बलोच के लिए एक समाज के तौर पर हम विफल रहे। एक यूज़र ने लिखा मेरा पारिवारिक बैकग्राउंड अच्छा नहीं है। एक ने सवाल किया कि कैसे मैं एक नामी परिवार से आती हूं, जब मैं बिना बांह के शर्ट्स पहनती हूं। इसी कारण से एक यूज़र ने कहा कि मैं "गंदी" और "गैर-इस्लामी" कपड़े पहनती हूं। इस तरह की ऑनलाइन गाली की मैं ज़्यादा परवाह नहीं करती क्योंकि मैं मोटी चमड़ी की हो गई हूं। लेकिन वो अलग बात है जब कोई मुझे बेवफ़ा घोषित करता है।
मुझे ये कई बार बोला गया क्योंकि मैं अहमदिया अल्पसंख्यकों के पलायान की ख़बर देती हूं। जिन लोगों पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गाय था उनकी रिपोर्टिंग के बाद मुझे धमकियां मिलीं। मुझे कहा गया कि वो जानते हैं कि मैं कहां रहती हूं और मेरा दफ्तर कहां है। मैं डर गई। मैं जब भी अपने दफ्तर या घर आती हूं तो मेरे मन में डर रहता है। मैं बहुत असहाय महसूस करती हूं, जब कोई मुझसे केवल इसलिए नफ़रत करता है क्योंकि मैं कहानी के दूसरे पक्ष की रिपोर्टिंग कर रही हूं। ऑनलाइन की दुनिया में मैं ख़ास तौर पर डर महसूस करती हूं। मुझे जान का ख़तरा रहता है जब भी मैं ऑनलाइन धर्म पर टिप्पणी या बात करती हूं। और सबसे ख़राब बात यह है कि मैं डरपोक नहीं हूं। मैं हर परिस्थिति से लड़कर यहां पहुंची हूं। लेकिन ये मामले कई बार मुझे अंदर तक हिला देते हैं।
उन्होंने मेरा पता मेरे सामने दोहराया। उन्होंने कहा, "तुम महिलाओं पर एसिड अटैक की रिपोर्ट करती हो। चलिए हम तुम्हें व्यक्तिगत तौर पर इसका एहसास कराते हैं।" मैं जानती हूं कि पाकिस्तान में अक्सर महिलाएं एसिड अटैक का शिकार होती हैं। मैं जानती हूं कि किसी भी ड्रग के दुकान से इसे बहुत सस्ते में खरीदा जा सकता है। मैं जानती हूं कि कैसे इन हिंसक धमकियों को असल में करके दिखाया जा सकता है। अब मैं जो भी कहानी कवर करती हूं, पहले उसके असर के बारे में भी सोचती हूं। लेकिन मैं चीज़ों को
मैं डरपोक नहीं हूं। लेकिन मैंने असहाय महसूस किया है। पत्रकार के तौर पर सरकारी दफ्तर में इंटरव्यू के लिए प्रतीक्षा करने के दौरान मुझे सिर से पांव तक घूरे जाने का अनुभव है। एक राजनीतिक रैली को कवर करने के दौरान एक युवक ने मुझे ज़बरदस्ती छू लिया। समय के साथ मुझमें ऐसे लोगों को सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा करने की हिम्मत आ गई है। लेकिन अब ऑनलाइन भी मुझे गाली दी जाती है। मुझे हाल ही में फेसबुक पर ट्रोल किया गया, जब मैंने पोस्ट लिखी कि कैसे क़ंदील बलोच के लिए एक समाज के तौर पर हम विफल रहे। एक यूज़र ने लिखा मेरा पारिवारिक बैकग्राउंड अच्छा नहीं है। एक ने सवाल किया कि कैसे मैं एक नामी परिवार से आती हूं, जब मैं बिना बांह के शर्ट्स पहनती हूं। इसी कारण से एक यूज़र ने कहा कि मैं "गंदी" और "गैर-इस्लामी" कपड़े पहनती हूं। इस तरह की ऑनलाइन गाली की मैं ज़्यादा परवाह नहीं करती क्योंकि मैं मोटी चमड़ी की हो गई हूं। लेकिन वो अलग बात है जब कोई मुझे बेवफ़ा घोषित करता है।
मुझे ये कई बार बोला गया क्योंकि मैं अहमदिया अल्पसंख्यकों के पलायान की ख़बर देती हूं। जिन लोगों पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गाय था उनकी रिपोर्टिंग के बाद मुझे धमकियां मिलीं। मुझे कहा गया कि वो जानते हैं कि मैं कहां रहती हूं और मेरा दफ्तर कहां है। मैं डर गई। मैं जब भी अपने दफ्तर या घर आती हूं तो मेरे मन में डर रहता है। मैं बहुत असहाय महसूस करती हूं, जब कोई मुझसे केवल इसलिए नफ़रत करता है क्योंकि मैं कहानी के दूसरे पक्ष की रिपोर्टिंग कर रही हूं। ऑनलाइन की दुनिया में मैं ख़ास तौर पर डर महसूस करती हूं। मुझे जान का ख़तरा रहता है जब भी मैं ऑनलाइन धर्म पर टिप्पणी या बात करती हूं। और सबसे ख़राब बात यह है कि मैं डरपोक नहीं हूं। मैं हर परिस्थिति से लड़कर यहां पहुंची हूं। लेकिन ये मामले कई बार मुझे अंदर तक हिला देते हैं।
मुझ पर राजद्रोह और बेवफाई के आरोप लगे
मुझ पर राजद्रोह और बेवफाई के आरोप लगे
- फोटो : BBC
मुझ पर राजद्रोह और बेवफाई के आरोप लगे। कुछ समय पहले मैंने पाकिस्तान के अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय पर एक कहानी की थी। वैसे तो पाकिस्तान में सभी अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न होता है। लेकिन जितना ज्यादा अहमदियों का अपमान होता है वो ख़ासतौर पर दिखता है। ये इसलिए भी है क्योंकि आधिकारिक तौर पर सरकार ने इसी अल्पसंख्यक समुदाय को दबाने के लिए बाकायदा कानून बनाए हैं। मैंने वीडियो, रेडियो और ऑनलाइन के लिए कहानियां बनाईं कि कैसे दुश्मनी के बीच ज़िंदा रहने और खुद का अस्तित्व बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।
मैंने ख़बर बनाई दोनों तरफ़ के पक्षों से बात- पीड़ित अहमदी और उनके खिलाफ़ मुख्यधारा के धार्मिक संगठनों के सदस्य। इसके बावजूद मुझे पूरे देश से धमकी भरे मैसेज और फोन कॉल आने लगे कि मैंने अहमदियों की तरफ सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाया। जब मेरी कहानी अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुई तो मुझे इतनी ज्यादा आलोचना का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन स्थानीय भाषा उर्दू में जब कहानियां छापी गई तो इसकी प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग थी। सोशल मीडिया पर जब इस कहानी को लगाया गया तो एक घंटे के अंदर उसे हटाना पड़ा क्योंकि धमकी भरी टिप्पणियों की भरमार हो गई थी। हत्या की धमकी से लेकर, अपना धर्म त्यागे की घोषणाओं, राजद्रोह और विदेशी मीडिया के कारण अपने धर्म और देश को धोखा देने तक टिप्पणियां की गईं। इस तरह के अनुभव आपको असहाय महसूस कराते हैं और कुछ समय के लिए पागल, क्योंकि ऐसा ना हो कि कोई न्याय को अपने हाथों में लेने की ठान ले।
मैंने ख़बर बनाई दोनों तरफ़ के पक्षों से बात- पीड़ित अहमदी और उनके खिलाफ़ मुख्यधारा के धार्मिक संगठनों के सदस्य। इसके बावजूद मुझे पूरे देश से धमकी भरे मैसेज और फोन कॉल आने लगे कि मैंने अहमदियों की तरफ सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाया। जब मेरी कहानी अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुई तो मुझे इतनी ज्यादा आलोचना का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन स्थानीय भाषा उर्दू में जब कहानियां छापी गई तो इसकी प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग थी। सोशल मीडिया पर जब इस कहानी को लगाया गया तो एक घंटे के अंदर उसे हटाना पड़ा क्योंकि धमकी भरी टिप्पणियों की भरमार हो गई थी। हत्या की धमकी से लेकर, अपना धर्म त्यागे की घोषणाओं, राजद्रोह और विदेशी मीडिया के कारण अपने धर्म और देश को धोखा देने तक टिप्पणियां की गईं। इस तरह के अनुभव आपको असहाय महसूस कराते हैं और कुछ समय के लिए पागल, क्योंकि ऐसा ना हो कि कोई न्याय को अपने हाथों में लेने की ठान ले।