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क्या भारतीयों को पाकिस्तान चुनाव की परवाह है?

Fri, 10 May 2013 12:20 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Fri, 10 May 2013 12:20 PM IST
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भारत और पाकिस्तान की सरकारों के बीच तना-तनी का माहौल मौसम की तरह बदलता रहता है। लेकिन पड़ोसी देश में फिलहाल चल रही लोकतंत्र की बयार से दुनिया के सबसे बड़ा लोकतंत्र यानी भारत की राजनीति अछूती रहे, ऐसा तो हो नहीं सकता।

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राजनीति के गलियारों से परे क्या भारत की जनता को इस बात की परवाह है कि पाकिस्तान में आने वाली सरकार का क्या प्रारूप होगा?
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दिल्ली के चांदनी चौक में बीबीसी से बातचीत में ज़्यादातर लोगों ने पाकिस्तान की अस्थिरता पर चुटकी लेते हुए कहा कि भले ही पाकिस्तान में कोई भी सरकार आए, भारत के लिए परेशानी तो बनी ही रहेगी।
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दिल्ली के रहने वाले एच एस नागपाल का कहना था, "क्या फर्क पड़ता है पाकिस्तान में किस तरह की सरकार बनती है। जो भी सरकार बनेगी, वो स्थिर तो रह नहीं पाएगी। सेना की कठपुतली है, उसके कहने पर ही चलेगी।"

'सरकार स्थाई नहीं'
उन्हीं की तरह गुलशन ने कहा, "पाकिस्तान में सिर्फ एक ही चीज़ स्थिर रह सकती है, और वो है चरमपंथ। सिवाय चरमपंथ के वहां कुछ और नहीं फल-फूल सकता, लोकतंत्र तो कभी नहीं।"

लेकिन इलाहाबाद से दिल्ली आई सुनिता आहुजा ने एक संतुलित बयान दिया।

उनका कहना था, "चूंकि पाकिस्तान में सेना के साथ-साथ न्यायपालिका भी सरकार पर हावी है, इसलिए वहां की सरकार स्थाई नहीं रह पाती है। जब तक ये स्थिति नहीं बदलती, तब तक मुझे नहीं लगता कि आने वाली सरकार भी पांच साल पूरे कर पाएगी।"

भारतीय जनता के एक तबके को भले ही संदेह हो, लेकिन कुछ लोग पाकिस्तान में हो रहे लोकतांत्रिक चुनाव को एक अच्छी खबर बताते हैं।

आखिर ये पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार है कि एक लोकतांत्रिक सरकार दूसरी को रास्ता दे रही है।

लेकिन विश्लेषक इस बात को याद दिलाना नहीं भूलते कि पाकिस्तान में जनतांत्रिक शासन के दौरान ही भारत-विरोधी गतिविधियां हुई हैं।

सेना का असर
पाकिस्तान में उच्चायुक्त रहे कूटनीतिक मामलों के जानकार पार्थ सारथी का कहना है कि भारत को अपनी आंख और कान खुले रखने होंगें।

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "हम जानते हैं कि राष्ट्रपति ज़रदारी भारत के साथ सामान्य रिश्ते बहाल करने के बहुत ही इच्छुक थे। लेकिन कट्टरवाद को फौज का समर्थन ज्यों का त्यों है। तो हम ये समझते हैं कि अगर मुंबई में हमला हुआ, तो उसके लिए हम पाकिस्तान की सरकार को दोषी नहीं ठहरा सकते, लेकिन फौज से मिले हुए कट्टरपंथी तत्वों को ही दोष दे सकते हैं।"

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीर के शासन के दौरान हुए कारगिल युद्ध का ज़िक्र करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक सरकार होने का मतलब ये नहीं है कि वो सशक्त ही हो।

तो फिर सवाल ये उठता है कि जिस पाकिस्तानी सेना का इतना रौब बताया जाता है, वो आगे आकर पाकिस्तान की सत्ता क्यों नहीं संभालती।

इसका सीधा जवाब देते हुए पार्थ सारथी ने कहा, "पाकिस्तान अब एक गंभीर राजनीतिक व आर्थिक स्थिति से गुज़र रहा है। सेना ने ये समझ लिया है कि वो इन समस्याओं के चलते सत्ता नहीं संभाल सकेगी। ये कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र सिर्फ इसलिए आगे बढ़ रहा है क्योंकि सेना खुद को इन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं समझती।"

तालिबानीकरण
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की बागडोर चाहे नवाज़ शरीफ के हाथों आए, या इमरान खान के हाथ, दोनों ही भारत के लिए जाने-पहचाने चेहरे हैं और भारत उनके साथ संबंध कायम कर सकता है।


लेकिन पाकिस्तान में बढ़ते तालिबानीकरण पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा, "तालिबान अब प्रभावी हो गया है। हालात ये हैं कि पाकिस्तान में आज बंदूक का राज़ है और आत्मघाती हमलों का दौर है। ये वो दौर है जब कोई पार्टी अगर भारत के प्रति सार्वजनिक रूप से कोई नर्मी दिखाए तो उनकी जान को खतरा हो जाता है।"

उन्होंने कहा कि भारत के लिए ये चिंता का विषय ज़रूर है लेकिन सच्चाई ये भी है कि इनसे निपटने के लिए भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को मज़बूत करना होगा।

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