Pakistan: टीटीपी के आतंकी अफगानिस्तान ने नहीं सौंपे, तो पाकिस्तान में शुरू किया ये गंदा खेल
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विस्तार
पाकिस्तान को लगा था जब तालिबानियों का अफगानिस्तान पर शासन हो जाएगा, तो वह उस देश में अपनी मनमर्जी से सब कुछ कर लेगा। लेकिन शुरुआती दिनों को छोड़ दें, तो पाकिस्तान के बदले रंग को अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार ने भांप लिया। नतीजा हुआ कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते तल्ख होने लगे। इसी दौरान पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के शरणार्थियों को अपने देश में बसाने के लिए अमेरिका से और यूरोप से तकरीबन 60 मिलियन डॉलर की पुनर्वास के नाम पर मदद भी ले ली। लेकिन अब पाकिस्तान में अफगानिस्तान के शरणार्थियों को बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की नीयत विदेश से मिलने वाले उसे बजट पर खराब हुई है, जो उसे पिछले साल अमेरिका और यूरोप से मिले थे। अब अफगानिस्तान में रह रहे शरणार्थियों को बाहर निकालने को कार्रवाई के नाम पर एक बार फिर से विदेशी बजट लेने की जुगाड़ में लग गया है। वहीं, शरणार्थियों को निकालने के पीछे पाकिस्तान की एक मंशा यह भी रही थी कि वह टीटीपी के आतंकियों को अफगानिस्तान की जेल से रिहा करवाने की बजाय उनको खुद को सौंपे जाने की मांग करता आया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दरअसल पाकिस्तान में रह रहे अफगानिस्तान शरणार्थियों को 3 अक्तूबर को एक आदेश दिया जाता है कि वह लोग 31 अक्तूबर तक पाकिस्तान की सीमा को छोड़ दें। यह तय समय सीमा मंगलवार को समाप्त हो गई। लेकिन अफगानिस्तान के शरणार्थी पाकिस्तान की दी गई तय सीमा पर देश से नहीं गए। विदेशी मामलों के जानकार रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जितेंद्रमणि चौधरी कहते हैं कि अब पाकिस्तान में अपने देश में रह रहे शरणार्थियों को जबरदस्ती निकालने के साथ-साथ उनका कठोर सजा देने के लिए कार्रवाइयां शुरू कर दी हैं। लेफ्टिनेंट कर्नल चौधरी कहते हैं कि कहने को तो पाकिस्तान अपने देश में अवैध रूप से रह रहे शरणार्थियों को निकालने की बात कर रहा है, लेकिन इसके पीछे की मंशा पाकिस्तान की बदनीयती है। उनका कहना है कि पाकिस्तान ऐसा करके अमेरिका और यूरोप से दी जाने वाली मदद को दोबारा लेने का प्रयास कर रहा है, ताकि उसकी गरीबी को कुछ दूर होने में मदद तो मिल सके।
विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि जब अफगानिस्तान में तालिबानियों की सरकार बनी, तो बहुत से शरणार्थी अफगानिस्तान छोड़कर पाकिस्तान आ गए। हालांकि उससे पहले भी अफगानिस्तान के शरणार्थी पाकिस्तान में रह रहे थे। विदेशी मामलों के जानकार कर्नल (रि) आरएन दुआ कहते हैं कि शरणार्थियों को मदद देने के नाम पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने पाकिस्तान को 60 मिलियन डॉलर की पिछले साल ही मदद की थी। अब पाकिस्तान उनको जब बाहर निकल रहा है, तो उसको उम्मीद है कि एक बार फिर से अमेरिका और यूरोपीय देश वित्तीय मदद देंगे। इसके अलावा दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य भी है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच में रिश्ते उस तरीके के नहीं रहे, जो कि पाकिस्तान ने सोचे थे। कर्नल दुआ कहते हैं कि दरअसल जब अफगानिस्तान में सरकार बनी तो पाकिस्तान में नई बनी सरकार पर अनाधिकृत रूप से बड़ा दबाव डालने की कोशिश की। उस दौरान पाकिस्तान के आईएसआई प्रमुख से लेकर सेना के बड़े-बड़े अधिकारी अफगानिस्तान की राजधानी में डेरा डालने पहुंच गए थे। बहुत हद तक अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार शुरुआती दौर में पाकिस्तान के दबाव में भी थी। लेकिन बाद में पाकिस्तान की मंशा को समझते हुए मामले बिगड़ने लगे।
विदेशी मामलों की जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्तों में सबसे ज्यादा कड़वाहट तब आई, जब अफगानिस्तान ने अपनी जेल में बंद टीटीपी के आतंकियों को रिहा कर दिया। भारतीय खुफिया एजेंसी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि इस मामले में पाकिस्तान यह चाहता था कि इन आतंकियों को उनके हवाले कर दिया जाए या उन्हें सौंप दिया जाए। लेकिन अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान की यह बात नहीं मानी। सूत्रों का कहना है कि उसे घटना के बाद से ही पाकिस्तान का अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार से मनमुटाव शुरू हो गया। रही सही कसर तब पूरी हो गई जब अफगानिस्तान की जेल से रिहा किए गए टीटीपी के आतंकियों ने पाकिस्तान में ही जाकर दहशत फैलानी शुरू कर दी। इस मामले में पाकिस्तान अफगानिस्तान पर आरोप लगाता रहा कि उसकी ओर से छोड़े गए आतंकियों ने पाकिस्तान में हालात खराब कर दिए।
भारतीय खुफिया एजेंसी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि जब पाकिस्तान लगातार इस बात का आरोप लगा रहा है कि उनके यहां पर दहशत टीटीपी के आतंकी फैला रहे हैं, तो वह भारत के ऊपर बेवजह और बेमुनियाद आरोप लगाना बंद क्यों नहीं करता है। रक्षा मामलों से जुड़े अधिकारियों का कहना है पाकिस्तान का खुले स्तर पर यह कबूल करना कि उसके देश में दहशत टीटीपी के आतंकी ही फैला रहे हैं, तो भारत के ऊपर लगाए जाने वाले आरोप तो पाकिस्तान स्वतः ही खारिज हो जाते हैं। हालांकि रक्षा मामलों की जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान में जिस तरह से अफगानिस्तान के शरणार्थी बच्चों और महिलाओं पर जुल्म किए जाने शुरू किए हैं, वह मानवाधिकार का खुला उल्लंघन है।
विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान में अपने देश में रह रहे लाखों अफगानी शरणार्थियों को निकाले जाने पर जिस तरीके से कारवाइयां शुरू की हैं, वह न सिर्फ गलत हैं बल्कि उसे समझौते के खिलाफ भी है, जिसमें उनके पुनर्वास की बात की गई थी। विदेशी मामलों के जानकार विपुल तनेजा कहते हैं कि दरअसल पाकिस्तान अपनी ही बोई हुई वह फसल काट रहा है, जिसके लिए उसने टीटीपी के आतंकी खुद तैयार किए थे। तनेजा कहते हैं कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बॉर्डर पर माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए पाकिस्तान की सेना और आईएसआई हमेशा से एक धड़े को न सिर्फ आगे बढ़ाती आई थी, बल्कि उनको शस्त्र और गोला बारूद भी उपलब्ध करा रही थी। क्योंकि अब पाकिस्तान अफगानिस्तान के साथ अच्छे संबंध नहीं रखना चाहता है इसलिए उसने अपने यहां रह रहे लाखों शरणार्थी, जिसमें 70 फ़ीसदी से ज्यादा महिलाएं और बच्चे हैं, उनके साथ बदसलूकी कर बाहर निकालने की साजिश शुरू कर दी है। उनका कहना है कि अगर पाकिस्तान इस मामले में ऐसा ही रवैया अपनाता है, तो निश्चित तौर पर आने वाले दिनों में यह उसके लिए बड़ा घातक कदम साबित हो सकता है।