पाकिस्तान: क्या बचे 16 महीने का कार्यकाल पूरा कर पाएगी शाहबाज शरीफ सरकार?
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विस्तार
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने आखिरकार अपना मिलाजुला मंत्रिमंडल बना लिया है। लेकिन यहां आम राय है कि अब आगे का उनका रास्ता कांटों भरा है। नई सरकार के सामने सबसे पहली चुनौती अपनी प्राथमिकता तय करने की है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान देश को सामाजिक उथल-पुथल की तरफ ले जाने पर आमादा दिखते हैं। इसके बीच आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।
बढ़ सकते हैं पेट्रोलियम पदार्थों के दाम
आर्थिक विश्लेषक जैग़म खान ने अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून से बातचीत में कहा- ‘सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक है। खासकर बढ़ती महंगाई और चालू खाते के बढ़ रहे घाटे से निपटना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए।’ खान ने कहा कि नई सरकार को तुरंत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास जाना चाहिए और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को तर्कसंगत बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब चुनाव सिर पर हों, तो कोई सरकार अलोकप्रिय फैसले नहीं लेती, लेकिन नई सरकार के पास ऐसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
थिंक टैंक पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ लेजिस्लेटिव डेवलपमेंट एंड ट्रांसपैरेंसी से जुड़े विश्लेषक अहमद बिलाल महबूब ने भी कहा है कि अर्थव्यवस्था की हालत भयानक है। सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर भारी सब्सिडी दे रही है, जिसे जारी रखना संभव नहीं है। ऐसे में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। महबूब ने कहा कि पाकिस्तान में सैन्य एस्टैब्लिशमेंट के साथ तालमेल बनाए रखना हर सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होता है। उधर बलूचिस्तान में जारी विरोध प्रदर्शनों और अफगानिस्तान सीमा पर बढ़ते तनाव ने हालात और मुश्किल बना दिए हैं।
फजलुर रहमान ने की राष्ट्रपति पद की मांग
लेकिन आम समझ यह है कि इन सबसे भी बड़ी समस्या सत्ताधारी गठबंधन में पड़ रही दरार है। जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम (फजलुर) के अध्यक्ष मौलाना फजलुर रहमान ने तुरंत चुनाव कराने की मांग कर शाहबाज शरीफ की मुश्किल बढ़ा दी है। फजलुर रहमान की पार्टी भी सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है। बताया जाता है कि रहमान ने मांग रखी है कि उन्हें राष्ट्रपति बनाया जाए। इस मांग पर सहमति न बनने के बाद उन्होंने नए चुनाव की मांग कर दी।
सत्ताधारी गठबंधन में कुल 13 पार्टियां शामिल हैं। इसके अलावा कुछ प्रभावशाली निर्दलीय सांसद भी इसका समर्थन कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इन सबकी अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। उन सभी को पूरा करना शाहबाज शरीफ के लिए आसान नहीं होगा। बलूचिस्तान नेशनल मूवमेंट (एम) ने मंत्रिमंडल के गठन को लेकर अपना असंतोष सार्वजनिक कर दिया है। उसने सरकार में शामिल होने से फिलहाल इनकार कर दिया है। महबूब ने कहा- ‘इस सरकार के लिए बचे 16 महीनों के कार्यकाल को पूरा करना कठिन होगा।’
इस बीच इमरान खान जनता के बीच उतर चुके हैं। वे लगातार सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दलों को ‘गद्दार, अमेरिकी एजेंट और चोर’ कह रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने न्यायापालिका को भी कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। इमरान खान के समर्थक सोशल मीडिया पर सेना के खिलाफ माहौल बनाए हुए हैं। इससे सामाजिक तनाव पैदा होने का अंदेशा जताया जा रहा है। इमरान लगातार तुरंत चुनाव की मांग कर रहे हैं। लेकिन संभवतया यही चुनौती सरकार को टिकाए रख सकती है। जैगम खान ने कहा- ‘वर्तमान सत्ताधारी ये सोच सकते हैं कि इमरान खान के नैरेटिव की धार खत्म करने में कुछ वक्त लगेगा।’ संभावना जताई जा रही है कि तब तक चुनाव टालने के लिए गठबंधन एकजुट रहेगा।