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पाकिस्तानः सेना और न्यायपालिक में टकराव, क्या अब सेना पर सचमुच कसेगी कानून की नकेल?

Sun, 09 Jan 2022 01:10 PM IST
अजय सिंह वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद। Published by: अजय सिंह Updated Sun, 09 Jan 2022 01:10 PM IST
सार

विश्लेषकों के मुताबिक हाईकोर्ट का आदेश और टिप्पणियां पाकिस्तान जैसे देश में एक बड़ी घटना है, जहां सेना खुद को संविधान और कानून से ऊपर मानती रही है।

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Pakistan judiciary and army conflict:  Islamabad High Court has ordered the demolition of the Navy yachting club and farmhouse
पाकिस्तानी सेना - फोटो : iStock

विस्तार

पाकिस्तान में न्यायपालिका सेना से टकराव के रास्ते पर बढ़ रही है। पर्यवेक्षक इस पर सेना की प्रतिक्रिया पर नजर रख रहे हैं। अब एक ताजा घटनाक्रम में इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने नौसेना के नौकायन कल्ब और फार्महाउस को गिराने का आदेश जारी कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि क्लब और फार्महाउस का निर्माण नेशनल पार्क के अंदर किया गया, जो गैर-कानूनी है। 
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पाकिस्तान में सेना से जुड़े मसलों को आम तौर पर कानून और जांच के दायरे से बाहर समझा जाता है। लेकिन हाल में न्यायपालिका ने ऐसे कई आदेश दिए हैं, जिनमें सेना और सैन्य अधिकारियों की सुविधाओं पर लगाम कसने की कोशिश की गई है। ताजा मामले में हाई कोर्ट ने इस्लामाबाद के राजधानी विकास प्राधिकरण से कहा है कि वह नौ सेना के फार्महाउस को अपने कब्जे में ले ले। कोर्ट ने कहा कि रावल झील के किनारे की जमीन पर नौ सेना ने गैर कानूनी ढंग से कब्जा कर लिया। जबकि ये जमीन नेशनल पार्क क्षेत्र का भी हिस्सा है। 
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कोर्ट ने यह आदेश भी दिया है कि क्लब की इमारत को किसी भी रूप में नियमबद्ध (रेगुलराइज) नहीं किया जाना चाहिए। यानी कोर्ट ने सरकार और अधिकारियों के हाथ बांध दिए हैं। ऐसे मामलों में ये संभावना रहती है कि प्रशासन बीती तारीख से जमीन का आवंटन कर दे या वहां हुए नियमों के उल्लंघन को माफ कर दे। कोर्ट ने नौ सेना को रावल झील में अपनी सभी गतिविधियां तुरंत रोक देने को कहा है। उसने आदेश दिया कि नौ सेना झील को लघु बांध से संबंधित विभाग को सौंप दे। साथ ही वन्य जीव प्रबंधन बोर्ड को आदेश दिया गया है कि वह झील के आपस प्राकृतिक परिवास को बहाल करे।
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कोर्ट अपने फैसले में यहीं तक नहीं रुका। बल्कि इस गैर कानूनी काम की जवाबदेही तय करने का निर्देश भी उसने दिया है। पर्यावरण संबंधी कानूनों के एक विशेषज्ञ को इस बात का अंदाजा लगाने को कहा गया है कि नौ सेना की गतिविधियों से वहां पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा। उधर ऑडिटर जनरल से यह आकलन करने को कहा गया है कि इन गतिविधियों के कारण सरकारी खजाने को कितनी क्षति पहुंची। कोर्ट ने कहा है कि जो नुकसान हुआ, उसे उन अधिकारियों से वसूला जाए, जो यह गैर कानूनी कार्य करने के दोषी हैं।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि हाई कोर्ट ने इस फैसले में जो टिप्पणियां की हैं, उनसे सशस्त्र सेनाओं में अधिक नाराजगी पैदा होने का अंदेशा है। कोर्ट ने कहा कि सशस्त्र सेनाएं संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ व्यापारिक या रियल एस्टेट जैसी गतिविधियों में शामिल हों, यह सार्वजनिक हित में नहीं है। सेना को अपनी ताकत का सीमित इस्तेमाल ही करना चाहिए। उसे ऐसा सिर्फ उन्हीं मामलों में करना चाहिए, जिसकी संविधान से उन्हें अनुमति मिली हुई है।


विश्लेषकों के मुताबिक हाईकोर्ट का आदेश और टिप्पणियां पाकिस्तान जैसे देश में एक बड़ी घटना है, जहां सेना खुद को संविधान और कानून से ऊपर मानती रही है। जमीन हड़पने या गैर कानूनी निर्माण के दोषी अधिकारियों को दंडित करना पाकिस्तान के इतिहास में एक नई मिसाल की तरह है। 
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