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गाजा शांति योजना पर उलझे मुनीर: ट्रंप से रिश्ते क्यों दांव पर, कैसे पाकिस्तान में घिर सकते हैं फील्ड मार्शल?

Wed, 17 Dec 2025 07:54 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 17 Dec 2025 07:54 PM IST
सार

गाजा की शांति योजना के तहत इस्राइल और हमास को दूर रखने के लिए जिस स्थायित्व बल का गठन होना है, वह क्या है? पाकिस्तान का इसमें क्या योगदान हो सकता है? कैसे इस मुद्दे को लेकर आसिम मुनीर पाकिस्तान में ही विरोध का सामना कर सकते हैं? आइये जानते हैं...

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Pakistan Field Marshal Asim Munir US President Donald Trump Gaza Peace Plan Stabilisation Force news updates
डोनाल्ड ट्रंप-आसिम मुनीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के सामने बड़ी चुनौती पैदा हो गई है। यह समस्या पाकिस्तान में किसी विद्रोह या सरकारी फैसले की वजह से नहीं, बल्कि अब तक अमेरिका से अपने रिश्ते बेहतर करने की मुनीर की कोशिशों की वजह से ही बढ़ सकती है। दरअसल, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इस्राइल-हमास के बीच संघर्ष विराम को स्थायी तौर पर लागू करने के लिए इस्लामिक देशों से गाजा में स्टेबिलाइजेशन फोर्स में योगदान देने की मांग की है। जिन देशों से यह मांग की गई है, उनमें एक हिस्सा पाकिस्तान का भी है। अमेरिका की यही मांग अब मुनीर के गले की फांस बन हो सकती है। 
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बता दें कि आसिम मुनीर कुछ ही दिनों में अमेरिका का दौरा करने वाले हैं। वे यहां अमेरिकी राष्ट्रपति से भी मिलेंगे। ऐसे में गाजा शांति योजना को लेकर पाकिस्तान के योगदान को लेकर दोनों के बीच चर्चा तय मानी जा रही है। ट्रंप गाजा में शांति के लिए 20 बिंदुओं की योजना दे चुके हैं, जिसे संयुक्त राष्ट्र की तरफ से मंजूरी भी मिली है। ऐसे में ट्रंप से मुलाकात के दौरान आसिफ मुनीर को अपने फैसले के बारे में भी उन्हें बताना होगा। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर गाजा की शांति योजना के तहत इस्राइल और हमास को दूर रखने के लिए जिस स्थायित्व बल का गठन होना है, वह क्या है? पाकिस्तान का इसमें क्या योगदान हो सकता है? कैसे इस मुद्दे को लेकर आसिम मुनीर पाकिस्तान में ही विरोध का सामना कर सकते हैं? आइये जानते हैं...

पहले जानें- क्या है इस्राइल-हमास संघर्ष को रोकने के लिए तय हुआ बल?
ट्रंप ने प्रस्ताव रखा है कि इस्राइल और हमास के बीच गाजा में चले संघर्ष को स्थायी तौर पर रोकने के लिए इस्राइल यहां से चरणबद्ध तरीके से अपनी सेनाएं हटाएगा। इसके बदले में गाजा से हमलों और रॉकेटों की रोकथाम सुनिश्चित की जाएगी। सुरक्षा निगरानी की बात की जाए तो गाजा में एक बहुराष्ट्रीय फोर्स की तैनाती की बात कही गई है, जिसमें अधिकतर इस्लामिक देशों की हिस्सेदारी होगी। वहीं हथियारबंदी के तहत हमास और दूसरे उग्रवादी संगठनों को निहत्था करने की प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय निगरानी में होगी।

इस योजना के तहत, अमेरिका अरब और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर एक अस्थायी अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (आईएसएफ) विकसित करेगा जिसे गाजा में तुरंत तैनात किया जाएगा। आईएसएफ, मिस्र और जॉर्डन के परामर्श से, जांच-परख वाले फलस्तीनी पुलिस बलों को प्रशिक्षण देगा। दीर्घकालिक आंतरिक सुरक्षा समाधान कहे जाने वाले आईएसएफ, इस्राइल और मिस्र के साथ सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा में मदद करेगा। आईएसएफ की तरफ से नियंत्रण स्थापित होते ही आईडीएफ इस क्षेत्र से हट जाएगा। यह वापसी विसैन्यीकरण से जुड़े मानकों, लक्ष्यों और समय-सीमाओं पर आधारित होगी, जिन पर आईडीएफ, आईएसएफ, गारंटर और अमेरिका के बीच सहमति होगी।

योजना के बिंदु 6 में कहा गया है कि जो हमास सदस्य शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और 'अपने हथियारों को छोड़ने के लिए तैयार होंगे, उन्हें माफी दी जाएगी। हमास के जो सदस्य गाजा छोड़ना चाहते हैं, उन्हें सुरक्षित मार्ग दिया जाएगा। वे जॉर्डन, मिस्र, कतर और ईरान जा सकते हैं। हमास ने लगभग दो दशकों तक गाजा पट्टी पर शासन किया है और इस्राइली रक्षा बलों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है, यह समझौता लागू करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। वहीं इस्राइल को भी अपना वादा निभाना होगा। मजेदार बात यह है कि हमास की तरफ से अधिकतर वादों को मुकम्मल करवाने की जिम्मेदारी इस्लामिक देशों की तरफ से भेजे गए सैनिकों से बने स्थिरीकरण बल की होगी। इस पर कतर से लेकर मिस्र तक चिंता जाहिर कर चुके हैं। 
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अब जानें- पाकिस्तान के लिए यह कितनी बड़ी चुनौती?
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रंप-मुनीर की मुलाकात में गाजा में तैनात होने वाले स्थिरिकरण बल और इसमें पाकिस्तान के योगदान को लेकर चर्चा होगी। विश्लेषकों का कहना है कि अगर पाकिस्तान, जो कि इस्लामिक दुनिया का इकलौता परमाणु संपन्न देश है, गाजा में शांति योजना के तहत अपने सैनिकों को भेजने के लिए तैयार हो जाता है तो मुनीर को देश में ही विरोध का सामना कर पड़ सकता है। 

दरअसल, मुनीर लंबे समय बाद पाकिस्तान के सबसे ताकतवर सैन्य प्रमुख बने हैं। ऐसे में देश में उनकी बढ़ती शक्तियों और विदेश नीति में भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब अगर पाकिस्तानी सैनिक गाजा में तैनात होते हैं और हमास के निरस्रीकरण से जुड़े कार्यक्रमों का हिस्सा बनते हैं तो इसे लेकर पाकिस्तान में ही विरोध के स्वर उठ सकते हैं, क्योंकि इस्राइल को रोकने के लिए हमास से हथियार छीनना नकारात्मक संदेश होगा। इतना ही नहीं फलस्तीन के नागरिक भी पाकिस्तान की इस भूमिका को लेकर उसके खिलाफ हो सकते हैं। 

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हालिया हफ्तों में मुनीर ने इंडोनेशिया, मलयेशिया, सऊदी अरब, तुर्किये, जॉर्डन, मिस्र और कतर के सैन्य और सियासी शख्सियतों के साथ बैठकें की हैं। इन बैठकों में मुनीर ने गाजा शांति योजना को लेकर चर्चाएं भी कीं। इसके बाद मंगलवार को कतर में दर्जन भर इस्लामिक देश जुटे थे। इनमें पाकिस्तान, मिस्र, अजरबैजान, इंडोनेशिया, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) शामिल थे। इसके अलावा यूरोप से इटली, फ्रांस और ब्रिटेन शामिल रहे। हालांकि, इस बैठक में तुर्किये शामिल नहीं रहा, जो कि अपने आप को हमास का बड़ा समर्थक और इस्राइल का विरोधी करार देता रहा है। ऐसे में बाकी इस्लामिक देशों और खासकर पाकिस्तान पर भी स्थिरिकरण बल से पीछे हटने का दबाव बना है। 

गाजा शांति योजना में क्या हो सकती है पाकिस्तान की भूमिका?
पाकिस्तान के पास ऐसी सेना है, जिसके पास मजबूत सेना है। भारत से अलग-अलग संघर्षों में हार के बावजूद पाकिस्तानी सेना के पास काफी अनुभव है। ट्रंप इसी अनुभव को गाजा में शांति स्थापित करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। बीते महीने ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा था कि इस्लामाबाद गाजा में शांति स्थापित करने के मकसद से सैनिक भेजने पर विचार कर सकता है, लेकिन हमास को निरस्त्र करना उन सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं होगी। 

तो क्या मुनीर के लिए ही भारी पड़ेगी ट्रंप से करीबी?
डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद से आसिम मुनीर ने लगातार पाकिस्तान का नेतृत्व करते हुए दोनों देशों के संबंधों को आगे बढ़ाया। इसी कड़ी में डोनाल्ड ट्रंप ने मुनीर को पहली बार व्हाइट हाउस बुलाया। यह पहला मौका था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने बिना किसी सियासी चेहरे की मौजूदगी के पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख से सीधी मुलाकात की थी। तब से ही माना जा रहा है कि ट्रंप से बातचीत के लिए पाकिस्तान की तरफ से आसिम मुनीर ही सबसे अहम चेहरा बन चुके हैं। 

अटलांटिक काउंसिल में सीनियर फेलो और दक्षिण-मध्य एशिया मामलों के जानकार माइकल कुगलमैन के मुताबिक, अगर मुनीर गाजा शांति योजना में योगदान के लिए ट्रंप की बात नहीं मानते हैं तो इससे अमेरिकी राष्ट्रपति झुंझला सकते हैं, जो कि पाकिस्तान के लिए नकारात्मक हो सकता है। पाकिस्तान लंबे समय से ट्रंप के साथ रिश्ते बेहतर करने की कोशिश में है। वह अमेरिका के निवेश और सुरक्षा में सहायता जुटाने की कोशिश भी करता रहा है।

विश्लेषक के मुताबिक, पाकिस्तान में जोखिम लेने की जो क्षमता मुनीर के पास है, उतनी शायद ही किसी के पास हो। उनके पास संविधान से सुरक्षित हुई बेरोकटोक ताकत है। ऐसे में गाजा में पाकिस्तानी सेना की किसी तरह भागीदारी का फैसला उनका अपना होगा। 

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