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अमेरिका : एक माह की लापरवाही ने बढ़ाई महामारी, जांच में बरती गई कोताही

Wed, 01 Apr 2020 06:25 AM IST
संजीव कुमार झा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: संजीव कुमार झा Updated Wed, 01 Apr 2020 06:25 AM IST
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One month of negligence has increased epidemic in usa, the investigation was extinguished
डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : एएनआई

अमेरिका में बेकाबू कोरोना ने प्रशासन और व्यवस्था की पोल खोल दी है। अमेरिकी प्रशासन की सबसे ज्यादा आलोचना लोगों की समय रहते जांच न कर पाने को लेकर हो रही है। बताया जा रहा है कि जब चीन से अमेरिका में संक्रमण फैलने के संकेत मिले थे तब व्हाइट हाउस में आयोजित हुई एक बैठक में कोरोना वायरस टास्क फोर्स ने इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया।

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टास्क फोर्स के सदस्यों ने अमेरिका में टेस्टिंग समेत अन्य उपायों पर 10 मिनट से ज्यादा चर्चा तक नहीं की। इस बैठक में रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के पदाधिकारियों ने वहां मौजूद सदस्यों को बताया कि उसने एक जांच मॉडल विकसित कर लिया है और जल्द ही इसका उपयोग किया जाने लगेगा। लेकिन जनवरी अंत से लेकर मार्च की शुरुआत तक अमेरिकी में संक्रमण बहुत तेजी से फैला। सोमवार को यहां कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या डेढ़ लाख के पार पहुंच गई है और तीन हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
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सीडीसी के पूर्व निदेशक डॉ थॉमस फ्रीडमैन का कहना है कि लोगों की स्क्रीनिंग शुरू होने से पहले सरकार की घोर नाकामी उजागर हुई है। विशेषज्ञ जैनिफर नज्जो के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने कोरोना के संभावित प्रभावों को काफी हल्के में लिया।

महाभियोग के कारण बंटा हुआ था राष्ट्रपति ट्रंप का ध्यान : जब अमेरिकी सरकार को कोरोना से बचाव के उपाय करने तब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ध्यान महाभियोग को लेकर बंटा हुआ था। इसके बाद ट्रंप ने दावा किया कि यह वायरस अमेरिका में टिकने वाला नहीं है। यह गायब हो जाएगा। मार्च की शुरुआत में जब राज्यों के अधिकारियों ने आखिरकार लोगों की जांचें बढ़ाने का निर्णय लिया, तब तक काफी देर हो चुकी थी।

सबसे प्रशिक्षित वैज्ञानिक और डॉक्टरों का नहीं उठाया लाभ:  अमेरिका के 50 से ज्यादा पूर्व और वर्तमान स्वास्थ्य अधिकारियों, वरिष्ठ वैज्ञानिकों और उच्च पदाधिकारियों ने इस विफलता के पीछे बड़ी वजह तकनीकी खामियां, नौकरशाहों के लचर रवैये समेत राजनीतिक नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है। नतीजतन एक महीना गंवा दिया। वक्त पर जांच शुरू हो जाती तो बड़ी आबादी को संक्रमण से बचाया जा सकता था। सबसे प्रशिक्षित वैज्ञानिक और विशेषज्ञों की मौजूदगी के बावजूद अमेरिका नाकामयाब रहा। असल में एक बड़े खतरे के मुहाने पर लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया।

सीडीसी की टेस्टिंग किट रही नाकाम

सात जनवरी की सीडीसी ने कोरोना वायरस को लेकर एक इंसिडेंट मैनेजमेंट सिस्टम तैयार किया। चीनी वैज्ञानिकों द्वारा कोरोना का जेनेटिक सिक्वेंस साझा करने के दो हफ्ते बाद 20 जनवरी तक सीडीसी ने अपना पहला टेस्ट किट तैयार कर लिया था। हालांकि जिस वक्त जांच की सबसे ज्यादा जरूरत थी तकनीकी खामियों की वजह से इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सका। 

एफडीए बना बाधा

एफडीए अमेरिका में शोधकर्ताओं और डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरा। कई वर्तमान और पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, शोधकर्ताओं और डॉक्टरों ने कोविड-19 का पता लगाने के लिए

तेजी से टेस्ट करने शुरू कर दिए थे लेकिन एफडीए की मंजूरी प्रक्रिया उनकी राह में रुकावट डाल रही थी। इस दौरान नए टेस्ट किट देशभर में बिना इस्तेमाल किए पड़े रहे।

भरोसे की कमी

फरवरी में गहराते संक्रमण को लेकर अमेरिकियों में गुस्सा फूटने लगा। इस दौरान सारा ध्यान स्वास्थ्य एवं मानव सेवा (एचएचएस) सचिव पर आ टिका। उनके विभाग और अधिकारियों की जमकर आलोचना होने लगी। 27 फरवरी को एफडीए और एचएचएस के बीच बैठकें हुईं। इसके बाद तेजी से जांच का दायरा बढ़ाया।

फरवरी में होने चाहिए थे ज्यादा से ज्यादा टेस्ट

फरवरी के मध्य तक अमेरिका में प्रतिदिन महज 100 लोगों की ही जांच हो पा रही थी। डॉ. नुज्जो ने बताया कि अगर फरवरी में ही अधिक जांच हो जातीं तो अमेरिका आज विकट परिस्थिति में नहीं फंसता।

फरवरी के अंत तक इसके दुष्परिणाम भी आने लगे, जब सिएटल में पहली बार बिना विदेश यात्रा किए और संक्रमण के स्रोत से अनभिज्ञ व्यक्ति में कोरोना का संक्रमण मिला। शोधकर्ताओं ने पाया कि वायरस लगातार हफ्तों तक फैल रहा था लेकिन स्वास्थ्य महकमा नाकाम रहा।

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