आसान शब्दों में समझें क्या है 'वन चाइना' पॉलिसी? क्या है दुनिया का रुख
- चीन सांस्कृतिक और भाषाई समानता वाले ताइवान को अपना हिस्सा मानता है।
- वन चाइना पॉलिसी की मानें तो ताइवान कोई अलग देश नहीं बल्कि चीन का हिस्सा है।
- वर्तमान में चीन के 170 से ज्यादा कूटनीतिक साझेदार जबकि ताइवान के केवल 22 साझेदार है।
- चीन से अलग होने के बावजूद ताइवान खुद को आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ चाइना कहता है।
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विस्तार
ताइवान में स्थानीय चुनावों में चीन समर्थित पार्टी की जीत के बाद वन चाइना के मुद्दे पर फिर से बात होने लगी है। चीन सालों से सांस्कृतिक और भाषाई समानता वाले ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। मगर ताइवान इसे अपनी संप्रभुता का सवाल मानता है। दिलचस्प बात ये है कि चीन से अलग होने के बावजूद ताइवान खुद को आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ चाइना कहता है।
ताइवान के राष्ट्रपति साइ इंग-वेन ने हाल के चुनावों में चीन समर्थित पार्टी की जीत के बाद अपने अधिकारियों को चीन से दूरी बनाने की सलाह दी।
साई को कमजोर करने में लगा है चीन
ताइवान में 2020 में राष्ट्रपति चुनाव होना है मगर चीन वन चाइना पॉलिसी के विरोधी माने जाने वाले साई को अलग-थलग करने में लगा है। पिछले महीने हुए स्थानीय चुनावों में विपक्षी पार्टी ने 22 में से 15 सीटें जीती जिसके बाद हार की जिम्मेदारी लेते हुए साई ने पार्टी प्रमुख का पद छोड़ दिया था। अधिकांश देशों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वन चाइना पॉलिसी को मान्यता दे दी है मगर इस मुद्दे पर अमेरिका का रूख बदला है।
वन चाइना पॉलिसी की मानें तो ताइवान कोई अलग देश नहीं बल्कि चीन का हिस्सा है। 1949 में बना पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) ताइवान को अपना प्रांत मानता है। इस पॉलिसी के तहत मेनलैंड चीन और हांगकांग-मकाऊ जैसे दो विशेष रूप से प्रशासित क्षेत्र आते हैं।
ताइवान खुद को आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ चाइना (आरओसी) कहता है। चीन की वन चाइना पॉलिसी के मुताबिक चीन से कूटनीतिक रिश्ता रखने वाले देशों को ताइवान से संबंध तोड़ने पड़ते है। वर्तमान में चीन के 170 से ज्यादा कूटनीतिक साझेदार जबकि ताइवान के केवल 22 साझेदार है।
वन चाइना पर दुनिया का रूख
अमेरिका चीन के साथ-साथ ताइवान से भी संबंध रखता है। कहा जाता है कि ताइवान से उसके अनाधिकारिक संबंध काफी मजबूत हैं और अमेरिका ताइवान की संप्रभुता का पक्षकार है। चीन अमेरिका से नीति और निर्माण को कूटनीति से ज्यादा अहम मानता है। ताइवान से रिश्ता तोड़ने वाले देशों में अफ्रीका और कैरिबियाई गरीब देश शामिल है। यह देश समय-समय पर संबंध बना और तोड़ चुके हैं।
दुनिया के ज्यादातर देश और संयुक्त राष्ट्र ताइवान को स्वतंत्र देश नहीं मानते, लेकिन इसके बावजूद वो पूरी तरह से अलग नहीं हैं। 22 देशों को छोड़कर बाकी देश ताइवान को अलग नहीं मानते। ओलंपिक जैसे वैश्विक आयोजनों में ताइवान चीन के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता लिहाजा वह लंबे समय से चाइनीज ताइपे के नाम से उतरता है।
मोदी सरकार बनाने के बाद भारत और ताइवान के द्विपक्षीय संबंध मजूबत बनाने के लिए कई समझौते हो चुके हैं। भारत के रूख में आये इस परिवर्तन की ताइवान की मीडिया में काफी सराहना की गई थी। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभालते ही लुक ईस्ट का नारा दिया था। विशेषज्ञों की मानें तो ताइवान के साथ भारत के बढ़ते संबंध इसी नीति का हिस्सा है। मगर भारत ने भी आधिकारिक तौर पर वन चाइना की पॉलिसी को मान्यता दी है।
ताइवान से मोदी का पुराना नाता
कहा जाता है कि भाजपा के महासचिव रहते हुए 1999 में नरेंद्र मोदी ताइवान के दौरे पर गए थे। यहीं नहीं 2011 में गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते उन्होंने सबसे बड़े ताइवानी बिजनेस प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया था। जानकारों की मानें तो 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर ताइवान से संबंधों बढ़ाने पर सहमति बनाई।
नेहरू की नीति को राव ने बदला
भारत ने आजादी के तीन साल बाद ताइवान से सभी द्विपक्षीय संबंधों को तोड़ते हुए चीन का साथ चुनते हुए गुटनिरपेक्ष खेमे में चला गया था। इस फैसले से ताइवान और भारत के अनौपचारिक संबंधों में दरार आई गई और ताइवान अमेरिकी नेतृत्व वाले खेमे में शामिल हो गया। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं होने के बावजूद 1990 के बाद नरसिंहा राव की सरकार बदलाव का दौर शुरू हुआ। 1995 में इंडिया-ताइपे एसोसिएशन (आईटीए) का गठन किया हुआ और भारत-ताइवान के बीच कई समझौते हुए।
चीन Vs ताइवान
| चीन | ताइवान |
| आधिकारिक नाम- पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना | आधिकारिक नाम-रिपब्लिक ऑफ चाइना |
| राष्ट्रपति- शी जिंपिंग | राष्ट्रपति-साइ इंग-वेन |
| आबादी- 140 करोड़ | आबादी- 2.35 करोड़ |
| कूटनीतिक साझेदार- 170+ | कूटनीतिक साझेदार- 22 |
| सेना- 23 लाख | सेना- 2.15 लाख |