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मोरोक्को के लिए आसान नहीं इस्राइल से रिश्ता बनाना, अपने ही देश के इस्लामी गुट की धमकी से घबराई सरकार!
Mon, 14 Dec 2020 04:35 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, रबात
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, रबात
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Mon, 14 Dec 2020 04:35 PM IST
सार
मोरक्को चौथा देश बना है, जिसने हाल में अमेरिका की मध्यस्थता में हुए समझौते के तहत इस्राइल से पूर्ण राजनयिक संबंध बनाने का फैसला किया है। इसके पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन और सूडान ऐसा ही फैसला कर चुके हैं...
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Morocco king and Israel PM
- फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
मोरक्को में इस्राइल से संबंध सामान्य बनाने के मुद्दे पर मुश्किलें बढ़ रही हैं। अब ये समझा जा रहा है कि मोरक्को सरकार के लिए इस बारे में हुए समझौते पर अमल करना शायद उतना आसान नहीं हो, जितना शुरुआत में सोचा गया था। इसकी ताजा वजह यह है कि एक प्रमुख इस्लामी गुट ने इस्राइल से संबंध सामान्य बनाने के सरकार के फैसले के खिलाफ मुहिम छेड़ दी है।
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यूनिटी एंड रिफॉर्म मूवमेंट (एमयूआर) नाम के इस संगठन की राय के खिलाफ जाना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। एमयूआर सत्ताधारी पीजेडी पार्टी की ही महजबी शाखा है, जिसे लोगों का समर्थन भी हासिल है। मोरक्को सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर इस्राइल से पूर्ण राजनयिक संबंध बनाने का फैसला किया है। एमयूआर ने इस बारे में एलान होने के दो दिन बाद तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। लेकिन अब उसने कड़े शब्दों में इस निर्णय का विरोध किया है।
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मोरक्को के किंग मोहम्मद षष्ठम की नीति फिलस्तीन का समर्थन करने की रही है। वे फिलस्तीनी इलाकों पर इस्राइली कब्जे का पुरजोर विरोध करते आए हैं। लेकिन इस्लामिस्ट पीजेडी पार्टी की सरकार ने किंग के रुख का समर्थन करने के बावजूद इजराइल से संबंध सामान्य करने का फैसला किया। इसका पीजेडी के गठबंधन में शामिल दलों ने समर्थन किया। लेकिन अब उसकी ही साखा एमयूआर प्रस्तावित समझौते के विरोध में उतर आई है।
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मोरोक्को में संवैधानिक राजतंत्र है। इसके तहत राजा संवैधानिक प्रमुख हैं, लेकिन कुछ मामलों को छोड़ कर असली सत्ता प्रधानमंत्री के हाथ में होती है। प्रधानमंत्री का पद संसद में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मिलता है। एमयूआर ने कहा है कि इस्राइल के साथ संबंध बनाने और इस्राइली घुसपैठ की इजाजत देने की हर कोशिश निंदनीय है।
मोरक्को चौथा देश बना है, जिसने हाल में अमेरिका की मध्यस्थता में हुए समझौते के तहत इस्राइल से पूर्ण राजनयिक संबंध बनाने का फैसला किया है। इसके पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन और सूडान ऐसा ही फैसला कर चुके हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की मध्यस्थता में हुए इस समझौते में पश्चिमी सहारा इलाके पर मोरक्को के कब्जे को मान्यता देने का प्रावधान भी शामिल है। इस इलाके पर मोरक्को के कब्जे को लेकर पिछले चार दशकों से विवाद चल रहा है।
पश्चिमी सहारा का मूलवासी समुदाय यहां स्वतंत्र देश बनाने के लिए संघर्ष चला रहा है। बताया जाता है कि उसके नुमाइंदे पोलिसारियो फ्रंट को अल्जीरिया का समर्थन हासिल है। पोलिसारियो फ्रंट ने मोरक्को के ताजा कदम की निंदा की है। पर्यवेक्षकों ने अंदेशा जताया है कि नए घटनाक्रम का नतीजा पश्चिम सहारा में लड़ाई तेज होने के रूप में सामने आ सकता है।
मोरक्को की सत्ताधारी पार्टी पीजेडी ने इसी प्रावधान के आधार पर सरकार के कदम का स्वागत किया। उसने एक बयान में कहा कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की एक महत्त्वपूर्ण घोषणा से दक्षिणी प्रांतों पर मोरक्को की संप्रभुता पर जोर पड़ा है। इससे अंतरराष्ट्रीय हलकों में मोरक्को का रुख मजबूत होने की नई संभावनाएं खुली हैं। साथ ही इससे मोरक्को की प्रादेशिक अखंडता की विरोधी ताकतें अलग-थलग पड़ेंगी। गौरतलब है कि मोरक्को पश्चिम सहारा को अपने दक्षिणी प्रांत के रूप में अपने नक्शे में दिखाता है।
जानकारों के मुताबिक मोरक्को में कूटनीतिक मामलों में आखिरी फैसला राजा का होता है। किंग मोहम्मद षष्ठम ने अभी तक इस करार के बारे में अपनी राय नहीं जताई है। मोरक्को के सबसे बड़े विपक्षी गुट ने इस फैसले को फिलस्तीन के लोगों की पीठ में छुरा भोंकना बताया है। लेकिन एडीएल वाल इहसान नाम के इस गुट को सरकार ने गैर कानूनी घोषित कर रखा है।
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि प्रस्तावित समझौते के तहत इस्राइल की राजधानी तेल अवीव और मोरक्को की राजधानी रबात में तुरंत संपर्क कार्यालय फिर से खोले जाएंगे। साल 2000 इन कार्यालयों को बंद कर दिया गया था। नेतन्याहू ने कहा है कि जल्द से जल्द दोनों देश राजनयिक संबंध कायम करेंगे। साथ ही मोरक्को के स्कूलों में यहूदी इतिहास और संस्कृति के बारे में पढ़ाया जाएगा। ऐसा पहली बार किसी उत्तरी अफ्रीकी देश में होगा। गौरतलब है कि मोरक्को का राजधर्म इस्लाम है।