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अभी नहीं बदले तो जलवायु और भोजन दोनों पर खतरा, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में चेतावनी

Fri, 09 Aug 2019 06:02 AM IST
संदीप भट्ट वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, जिनेवा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, जिनेवा Published by: संदीप भट्ट Updated Fri, 09 Aug 2019 06:02 AM IST
सार

  • अभी हिम-रहित 13 करोड़ वर्ग किमी क्षेत्र में से 3.34 करोड़ वर्ग किमी में ही वन बचे हैं।
  • 2050 तक 1.2 करोड़ वर्ग किमी जंगल बढ़ाना होगा।
  • 1961 के मुकाबले विश्व का अनाज उत्पादन 240 प्रतिशत और कपास उत्पादर 162 प्रतिशत बढ़ा।
  • एक-तिहाई खाद्य उत्पादन बेकार जा रहा है।
  • -कृषि उत्पादों की सप्लाई, बड़ी फूड चेन और इनसे जुड़े उद्योग हानिकारक गैसों के 37 प्रतिशत उत्सर्जन के जिम्मेदार हैं।

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New Report on Climate and Lands Carries Both Dire Warnings and Hopeful Solutions

विस्तार

 बीते दशकों में धरती के बढ़ा तापमान ने हमें ऐसी स्थिति में पहुंचा रहा है, जहां खाद्य सुरक्षा या तापमान पर नियंत्रण में से किसी एक को चुनने की नौबत आ सकती है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर बने अंतरराष्ट्रीय पैनल ने जिनेवा में यह दावा किया है। पैनल के अनुसार खत्म होते जंगलों, खेती के नुकसानदेह तौर-तरीकों और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के हालात सुधारने के लिए अब भी काम नहीं हुआ, तो ऐसा होगा। पैनल ने भूमि के उपयोग और जलवायु परिवर्तन पर हजार पृष्ठों की रिपोर्ट भी जारी की।
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रिपोर्ट के अनुसार इन खतरों के बीच तेजी से बढ़ती आबादी और उसकी जरूरतों की वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने के प्रयास विफल हो सकते हैं। उष्णकटिबंधीय वन और वैकल्पिक ऊर्जा के लिए तैयार किए जा रहे बड़े प्रोजेक्ट्स भी पर्यावरण को नुकसान से नहीं बचा पाएंगे। वहीं कृषि व संबंधित कार्यों पर पृथ्वी की एक तिहाई धरती और 70 प्रतिशत ताजे पानी की खपत हो रही है, जो चिंताजनक है। मानव आबादी 10 अरब होने जा रही है, ऐसे में सरकारों, उद्योगों और किसानों को पर्यावरण का नुकसान को घटाने के लिए काम करना होगा। 
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रिपोर्ट में यह भी दावा

  • अभी हिम-रहित 13 करोड़ वर्ग किमी क्षेत्र में से 3.34 करोड़ वर्ग किमी में ही वन बचे हैं।
  • 2050 तक 1.2 करोड़ वर्ग किमी जंगल बढ़ाना होगा।
  • 1961 के मुकाबले विश्व का अनाज उत्पादन 240 प्रतिशत और कपास उत्पादर 162 प्रतिशत बढ़ा।
  • एक-तिहाई खाद्य उत्पादन बेकार जा रहा है।
  • -कृषि उत्पादों की सप्लाई, बड़ी फूड चेन और इनसे जुड़े उद्योग हानिकारक गैसों के 37 प्रतिशत उत्सर्जन के जिम्मेदार हैं।

धरती का इस्तेमाल

1 प्रतिशत : आधारभूत संरचनाएं
14 प्रतिशत : खेती
37 प्रतिशत : चारागाह व पशुपालन
20 प्रतिशत : पेड़-पौधे लगाने और एग्रो-फॉरेस्ट्री में
28 प्रतिशत : वन व बंजर भूमि

 

भारत में जलवायु परिवर्तन से नुकसान

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1. तीन गुना बढ़ी बाढ़ : वर्ष 1950 से 2015 के बीच मध्य भारत के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ तीन गुना बढ़ीं। मिट्टी का कटान भी बढ़ा। भारत व बांग्लादेश के 10 लाख हैक्टेयर सुंदरबन में धान की खेती बढ़ी, जिससे चक्रवात ज्यादा हो गए। 


2. गोडावणों को सौर ऊर्जा परियोजनाओं से खतरा : रेगिस्तानी क्षेत्रों में सौर व पवन ऊर्जा परियोजनाओं से गोडावण पक्षी के अस्तित्व पर खतरा आया है। देश में 150 ही गोडावण बचे हैं। इनके आखिरी बचे प्राकृतिक आवास में बिजली सप्लाई लाइनें विश्व से गोडावण को पूरी तरह मिटा सकती है।

3. खाद्य पदार्थों में पोषण घटा : वातावरण में बढ़ती कार्बन का असर खाद्य पदार्थों में जिंक, आयरन आदि पोषक तत्वों की कमी भी ला रहा है। इससे भारत में 2050 तक 48 करोड़ लोग प्रभावित होंगे।

4. सिंचाई का मानसून पर असर : एक थियोरी दी गई कि भारत में मानसून पूर्व सिंचाई से धरती ठंडी हो जाती है। इस वजह से मानसून लेट हो रहा है, उसकी गहनता भी घटी है। वहीं पश्चिमी भारत में बारिश बढ़ने लगी है।

5. गेहूं की उत्पादकता 5.2 प्रतिशत घटी : 1981 से 2009 के बीच भारत में गेहूं की औसत प्रजाति की उत्पादकता 5.2 प्रतिशत तक घटी है। इसमें रात के समय बढ़ा औसत तापमान भी वजह बना। 
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