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पश्चिम एशिया में नए समीकरण: क्या रंग लाएगा तुर्की और यूएई में बनता नया रिश्ता?

Wed, 29 Sep 2021 08:00 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, आबू धाबी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, आबू धाबी Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 29 Sep 2021 08:00 PM IST
सार

पर्यवेक्षकों का कहना है कि यूएई की नीतियों में बदलाव से टर्की को अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाने में मदद मिल रही है। आर्दोआन टर्की को पूरी इस्लामी दुनिया के नेता बनाना चाहते हैं। पर्यवेक्षकों की निगाह अब यह देखने पर है कि इसमें यूएई कितना मददगार बनता है...

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New alliance in West Asia: will the new relationship between Turkey and the UAE could change the situation in afghanistan
टर्की के राष्ट्रपति रजिब तैयिब अर्दोआन - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद इस इलाके में बदले हालात के मद्देनजर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) इस क्षेत्र में अपनी नई भूमिका की तलाश कर रहा है। इस पर चर्चा के लिए हाल में कई सम्मेलन आयोजन किए गए। उनमें वरिष्ठ राजनेताओं और राजनयिकों ने भाग लिया। खबरों के मुताबिक आने वाले समय में ऐसी बैठकों का सिलसिला जारी रहेगा।

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वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक खबर के मुताबिक नए हालात के मद्देनजर यूएई टर्की और कतर से अपने संबंध सुधारने पर खास ध्यान दे रहा है। साथ ही उसने फ्रांस और ब्रिटेन के साथ अपने रिश्तों को मजबूती देने की कोशिश की है। पहले यूएई को सऊदी अरब का खास दोस्त समझा जाता था। लेकिन हाल में इस रिश्ते में खटास आई है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि नए हालात में यूएई किसी एक देश पर निर्भर रहना नहीं चाहता।
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बताया जाता है कि यूएई के युवराज मोहम्मद बिन जायद (जिन्हें बोलचाल में एमबीजेड कहा जाता है) ने देश की ताजा कूटनीतिक पहल की कमान संभाल रखी है। वे यूएई के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शेख तन्हून बिन जावेद की मदद से देश की नई विदेश नीति को ठोस रूप देने में लगे हुए हैं। जानकारों के मुताबिक अतीत में यूएई ने यमन और लीबिया में की घटनाओं में दखल दिया था। लेकिन उन प्रयासों में उसे नाकामी हाथ लगी।
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पश्चिम एशिया की राजनीति के जानकार क्रिश्चियन कोट्स अलरीचसन ने एशिया टाइम्स से कहा- ‘अबू धाबी में अब एक नई समझ बनी है। वो यह है कि यूएई अब हर जगह आग बुझाने नहीं जा सकता।’ उन्होंने कहा- हाल में अमेरिका ने कहा कि वह इस क्षेत्र के प्रति अपनी वचनबद्धताएं बदल रहा है। अफगानिस्तान में उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। उससे यूएई में ये समझ बनी है कि उसके सामने उससे कहीं ज्यादा चिंताजनक स्थितियां हैं, जितना पहले समझा जाता था।

जानकारों के मुताबिक अब यूएई अपने पुराने दुश्मनों से मेलमिलाप की नीति पर चल रहा है। इस सिलसिले में जिस देश ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है, वह टर्की है। दस साल पहले अरब स्प्रिंग (अरब देशों में जन प्रदर्शनों) के समय यूएई और टर्की के रिश्ते बहुत बिगड़ गए थे। तब टर्की ने मोरोक्को और सीरिया में बागी इस्लामी गुटों का समर्थन किया था, जबकि यूएई ने अपना समर्थन वहां के शासकों को दिया था। तब लीबिया में भी दोनों देश अलग-अलग गुटों के साथ थे।

यूएई टर्की के साथ विवादों में ग्रीस और साइप्रस का समर्थन करता रहा है। वह इस्राइल को अरब देशों की मान्यता दिलाने में जुटा रहा है, जबकि टर्की इसके सख्त खिलाफ है। 2017 में यूएई उन चार अरब देशों में शामिल हुआ, जिन्होंने टर्की के सहयोगी देश कतर की घेरेबंदी की। ये घेराबंदी इस साल जनवरी में जाकर हटाई गई है।

आपसी संबंधों में इतने पेंच होने के कारण ही उस समय पर्यवेक्षक हैरत में रह गए, जब अगस्त के मध्य में शेख तन्हून ने अंकारा जाकर टर्की के राष्ट्रपति रजिब तयिब आर्दोआन से भेंट की। तब आर्दोआन ने उम्मीद जताई थी कि भविष्य में यूएई से बड़ी मात्रा में निवेश टर्की आएगा। उसके बाद से दोनों देशों के नेताओं और राजनयिकों में कई मुलाकातें हुई हैं।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि यूएई की नीतियों में बदलाव से टर्की को अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाने में मदद मिल रही है। आर्दोआन टर्की को पूरी इस्लामी दुनिया के नेता बनाना चाहते हैं। पर्यवेक्षकों की निगाह अब यह देखने पर है कि इसमें यूएई कितना मददगार बनता है।

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