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Nepal: '2007 के गौर नरसंहार की दोबारा जांच करे सरकार', नेपाल की सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश; जानें पूरा मामला
Tue, 19 Aug 2025 08:48 AM IST
निर्मल कांत
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 19 Aug 2025 08:48 AM IST
सार
Nepal: नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के गौर नरसंहार की दोबारा जांच के आदेश दिए हैं, जिसमें 27 लोगों की हत्या और सौ से अधिक घायल हुए थे। यह हिंसक झड़प मधेशी जन अधिकार मंच और माओवादी कार्यकर्ताओं के बीच हुई थी। मामले में 113 आरोपियों के खिलाफ जांच फिर से शुरू की गई है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2007 के गौर नरसंहार की जांच के लिए सरकार को अनिवार्य आदेश (मैंडमस) जारी किया। यह नेपाल के राजनीतिक इतिहास की सबसे हिंसक घटनाओं में से एक मानी जाती है। जस्टिस तिल प्रसाद श्रेष्ठ और जस्टिस नित्यानंद पांडे की बेंच ने आदेश जारी करते हुए कहा कि हत्याओं से जुड़ी शिकायतों में जिनके नाम शामिल हैं, उनकी जांच जरूर होनी चाहिए।
कोर्ट के अधिकारियों के मुताबिक, त्रिभुवन साह और अन्य ने चार जून 2023 को रौतहट के जिला पुलिस कार्यालय और जिला सरकारी वकील कार्यालय के खिलाफ यह याचिका दायर की थी। याचिका में गौर नरसंहार की जांच की मांग की गई थी।
यह 21 मार्च 2007 को रौतहट जिले के गौर स्थित राइस मिल मैदान में हुई थी, जब उस समय के मधेशी जन अधिकार मंच (एमपीआरएफ) और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के बीच हिंसक झड़प हो गई थी। मधेशी जन अधिकार मंच के नेता उपेंद्र यादव थे। इस हिंसा में 27 लोग मारे गए थे और करीब सौ लोग घायल हुए थे।
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विभिन्न मानवाधिकार संगठनों की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, मारे गए ज्यादातर लोग माओवादी समर्थक थे। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद पुलिस ने उपेंद्र यादव और अन्य 113 आरोपियों के खिलाफ मामले की दोबारा जांच शुरू कर दी है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा तब भड़की जब मधेशी जन अधिकार मंच के समर्थकों ने माओवादियों की ओर से तैयार किया गया मंच तोड़ा। इसके बाद नगरपालिका कार्यालयपास गोली चलने की घटनाएं सामने आईं, जिससे दहशत फैल गई और फिर झड़पें और हत्याएं शुरू हो गईं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि कई पीड़ितों को पकड़ा गया, पीटा गया और मार दिया गया। कई लोगों पर धारदार और भारी हथियारों से हमला किया गया। कुछ को जलाया गया और कई शवों को एक मंदिर के आस पास घुमाया गया और फिर मौके पर फेंक दिया गया।
आयोग ने इस घटना को पूर्व नियोजित और योजनाबद्ध हिंसा करार दिया और कहा कि इसके लिए मुख्य रूप से मधेशी जन अधिकार मंच के कार्यकर्ता जिम्मेदार थे। इसने यह भी कहा कि जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन किया गया। हिरासत में लोगों की हत्या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अपराध है।
एनएचआसी की जांच रिपोर्ट में इस हिंसा के चार प्रमुख कारण बताए गए हैं। पहला- 31 जनवरी 2007 को गौर में माओवादियों की ओर से मंच के समर्थकों और नेताओं पर हमला किया गया, जिससे बदले की भावना पैदा हुई। दूसरा- मंच ने 21 मार्च को कार्यक्रम की पूर्व सूचना दी थी, लेकिन माओवादी संगठन की सहयोगी मधेशी मुक्ति मोर्चा ने उसी स्थान पर दो दिन पहले कार्यक्रम तय कर टकराव की स्थिति बना दी। तीसरा- स्थानीय व्यापार संघ ने दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने की कोशिश की थी और प्रशासन ने भी मौखिक रूप से कार्यक्रम अलग-अलग करने को कहा था, लेकिन माओवादी बैठक में नहीं आए और दोनों पक्षों ने प्रशासन की अपील को नजरअंदाज कर दिया। चौथा- 20 मार्च 2007 को जिला सुरक्षा समिति ने अतिरिक्त सुरक्षा बल की मांग की थी, लेकिन संबधित अधिकारियों ने समय पर सुरक्षा व्यवस्था नहीं की।
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यह घटना उस समय घटी, जब पूर्व माओवादी गुरिल्ला समूह नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने राजनीति में प्रवेश किया था। उस समय पार्टी अध्यक्ष पुष्पकमल दहल प्रचंड ने इस हिंसा के लिए राजशाही समर्थकों, भारतीय चरमपंथियों और विदेशी ताकतों को जिम्मेदार ठहराया था। प्रचंड ने यह भी आरोप लगाया था कि जब यह हिंसा घंटों तक चल रही थी, तब राज्य की सुरक्षा एजेंसियां मूकदर्शक बनी रहीं। वहीं, घटना के कुछ समय बाद मधेशी मंच के नेता उपेंद्र यादव भूमिगत हो गए थे।
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कोर्ट के अधिकारियों के मुताबिक, त्रिभुवन साह और अन्य ने चार जून 2023 को रौतहट के जिला पुलिस कार्यालय और जिला सरकारी वकील कार्यालय के खिलाफ यह याचिका दायर की थी। याचिका में गौर नरसंहार की जांच की मांग की गई थी।
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यह 21 मार्च 2007 को रौतहट जिले के गौर स्थित राइस मिल मैदान में हुई थी, जब उस समय के मधेशी जन अधिकार मंच (एमपीआरएफ) और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के बीच हिंसक झड़प हो गई थी। मधेशी जन अधिकार मंच के नेता उपेंद्र यादव थे। इस हिंसा में 27 लोग मारे गए थे और करीब सौ लोग घायल हुए थे।
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विभिन्न मानवाधिकार संगठनों की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, मारे गए ज्यादातर लोग माओवादी समर्थक थे। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद पुलिस ने उपेंद्र यादव और अन्य 113 आरोपियों के खिलाफ मामले की दोबारा जांच शुरू कर दी है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा तब भड़की जब मधेशी जन अधिकार मंच के समर्थकों ने माओवादियों की ओर से तैयार किया गया मंच तोड़ा। इसके बाद नगरपालिका कार्यालयपास गोली चलने की घटनाएं सामने आईं, जिससे दहशत फैल गई और फिर झड़पें और हत्याएं शुरू हो गईं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि कई पीड़ितों को पकड़ा गया, पीटा गया और मार दिया गया। कई लोगों पर धारदार और भारी हथियारों से हमला किया गया। कुछ को जलाया गया और कई शवों को एक मंदिर के आस पास घुमाया गया और फिर मौके पर फेंक दिया गया।
आयोग ने इस घटना को पूर्व नियोजित और योजनाबद्ध हिंसा करार दिया और कहा कि इसके लिए मुख्य रूप से मधेशी जन अधिकार मंच के कार्यकर्ता जिम्मेदार थे। इसने यह भी कहा कि जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन किया गया। हिरासत में लोगों की हत्या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अपराध है।
एनएचआसी की जांच रिपोर्ट में इस हिंसा के चार प्रमुख कारण बताए गए हैं। पहला- 31 जनवरी 2007 को गौर में माओवादियों की ओर से मंच के समर्थकों और नेताओं पर हमला किया गया, जिससे बदले की भावना पैदा हुई। दूसरा- मंच ने 21 मार्च को कार्यक्रम की पूर्व सूचना दी थी, लेकिन माओवादी संगठन की सहयोगी मधेशी मुक्ति मोर्चा ने उसी स्थान पर दो दिन पहले कार्यक्रम तय कर टकराव की स्थिति बना दी। तीसरा- स्थानीय व्यापार संघ ने दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने की कोशिश की थी और प्रशासन ने भी मौखिक रूप से कार्यक्रम अलग-अलग करने को कहा था, लेकिन माओवादी बैठक में नहीं आए और दोनों पक्षों ने प्रशासन की अपील को नजरअंदाज कर दिया। चौथा- 20 मार्च 2007 को जिला सुरक्षा समिति ने अतिरिक्त सुरक्षा बल की मांग की थी, लेकिन संबधित अधिकारियों ने समय पर सुरक्षा व्यवस्था नहीं की।
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यह घटना उस समय घटी, जब पूर्व माओवादी गुरिल्ला समूह नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने राजनीति में प्रवेश किया था। उस समय पार्टी अध्यक्ष पुष्पकमल दहल प्रचंड ने इस हिंसा के लिए राजशाही समर्थकों, भारतीय चरमपंथियों और विदेशी ताकतों को जिम्मेदार ठहराया था। प्रचंड ने यह भी आरोप लगाया था कि जब यह हिंसा घंटों तक चल रही थी, तब राज्य की सुरक्षा एजेंसियां मूकदर्शक बनी रहीं। वहीं, घटना के कुछ समय बाद मधेशी मंच के नेता उपेंद्र यादव भूमिगत हो गए थे।