फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Nepal Pro Monarchy Rally King Gyanendra Shah Yogi Adityanath Posters Hindu Nation Republic protests explained

नेपाल में बवाल!: ज्ञानेंद्र शाह की रैली में कैसे उभरा योगी आदित्यनाथ को लेकर विवाद, कौन सा पक्ष-क्यों नाराज?

Wed, 12 Mar 2025 06:41 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 12 Mar 2025 06:41 PM IST
विज्ञापन
सार
नेपाल में हाल ही में क्या हुआ है? एक रैली में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पोस्टर दिखाए जाने पर विवाद क्या है? नेपाल में यह राजनीति का मुद्दा कैसे बन गया? भारत का नेपाल की लोकतांत्रिक सरकारों और इससे पहले राजशाही से रिश्ता कैसा रहा है? नेपाल में मौजूदा समय में भारत को लेकर क्या चर्चा हो रही है? आइये जानते हैं...
loader
Nepal Pro Monarchy Rally King Gyanendra Shah Yogi Adityanath Posters Hindu Nation Republic protests explained
नेपाल में राजशाही के समर्थन में प्रदर्शन। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नेपाल में इस वक्त राजशाही के समर्थन में जबरदस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। राजधानी काठमांडू में हाल ही में हजारों लोगों ने जुटकर लोकतांत्रिक तौर पर चुनी गई सरकार के विरोध में आवाज बुलंद की और देश में एक बार फिर राजशाही को लौटाने की मांग की। इस घटना के बाद नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आ गया, जब ऐसी ही एक रैली में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पोस्टर लहराया गया। महज एक पोस्टर को लेकर बवाल इतना बढ़ गया कि मसले पर नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तक कूद पड़े और वार-पलटवार का दौर शुरू हो गया।


ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर नेपाल में हाल ही में क्या हुआ है? एक रैली में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पोस्टर दिखाए जाने पर विवाद क्या है? नेपाल में यह राजनीति का मुद्दा कैसे बन गया? भारत का नेपाल की लोकतांत्रिक सरकारों और इससे पहले राजशाही से रिश्ता कैसा रहा है? नेपाल में मौजूदा समय में भारत को लेकर क्या चर्चा हो रही है? आइये जानते हैं...

नेपाल में हालिया घटनाक्रम क्या हुआ है?
नेपाल में 2008 तक राजशाही शासन था। हालांकि, इसके बाद लोकतंत्र समर्थकों के प्रदर्शन शुरू हो गए, जिससे राजशाही को खत्म कर दिया गया और देश में चुनाव कराए गए। 

हालांकि, इस रविवार (9 मार्च) को एक अजब घटना घटी। दरअसल, नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र दो महीने तक धार्मिक दौरे पर पोखरा में रहने के बाद राजधानी काठमांडू लौटे थे। जब वे त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बाहर उतरे तो उनके समर्थन में हजारों लोग जुट गए। इन लोगों में अधिकतर राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) के कार्यकर्ता थे, जो कि राजशाही के समर्थन के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, काठमांडू में जुटी भीड़ इतनी ज्यादा थी कि इसे संभालना भी मुश्किल हो गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व राजा ज्ञानेंद्र का स्वागत करने के लिए सिर्फ एयरपोर्ट पर ही करीब 10 हजार लोग जुटे थे। इनमें आरपीपी के अध्यक्ष लिंगदेन और नेपाल प्रमुख कमल थापा समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। इसके अलावा रास्ते में जुटी यह भीड़ इतनी ज्यादा थी कि राजा ज्ञानेंद्र को एयरपोर्ट से घर तक पांच किमी की दूरी पूरी करने में ढाई घंटे का समय लग गया। 

बताया जाता है कि यह जनसैलाब इतना बड़ा था कि काठमांडू पुलिस को एयरपोर्ट से लेकर निर्मल निवास- राजपरिवार के घर तक सुरक्षा के इंतजाम करने पड़े। इस दौरान ही इस भीड़ में नारेबाजी शुरू हुई- हमें अपना राजा वापस चाहिए। कई लोग हाथों में इससे जुड़े पोस्टर लिए भी दिखाई दिए। इनमें 'नेपाल से संघीय गणतांत्रिक प्रणाली को खत्म किया जाए' और 'राजशाही को वापस लाओ' जैसे नारे लिखे थे। इतना ही नहीं इन पोस्टरों में राजा ज्ञानेंद्र और नेपाल के झंडे की तस्वीरें भी लगाई गई थीं। लोगों ने नेपाल में हिंदू धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित करने की भी मांग की। 

क्या है नेपाल में इन प्रदर्शनों की वजह?
गौरतलब है कि नेपाल में राजशाही के अंत और लोकतंत्र के पूरी तरह से स्थापित होने के बावजूद देश में बीते 17 साल में 14 सरकारें बदल चुकी हैं। नेपाल में हालिया बदलाव मार्च 2024 और उसके बाद जुलाई 2024 में आया था। 

1. मार्च 2024 में क्या हुआ था
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) के प्रमुख पुष्प कमल दहल प्रचंड ने शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस पार्टी के साथ 15 महीने पुराना गठबंधन तोड़ दिया और केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनिफाइड मार्क्सवादी लेनिनवादी (सीपीएन-यूएमएल) के साथ गठबंधन बनाया। 

2. जुलाई 2024 में फिर कैसे बदली सरकार
हालांकि, संसद में फ्लोर टेस्ट के दौरान प्रचंड बहुमत साबित नहीं कर पाए। इसके बाद राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने बाकी पार्टियों को सरकार के लिए दावा पेश करने का न्योता दिया। केपी शर्मा ओली ने शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस का साथ हासिल करते हुए सरकार बना ली। 

चौंकाने वाली बात यह है कि 2008 के बाद से नेपाल में कभी भी एक पार्टी की सरकार नहीं बनी है। यहां हमेशा दो या इससे ज्यादा पार्टी के गठबंधन से ही सरकार बनी है, जिससे देश में राजनीतिक अस्थिरता का भी माहौल रहा है। नेपाल में बड़ी संख्या में लोग इस अस्थिरता को विकास कार्यों में बाधा मानते हैं। बताया जाता है कि इसके चलते ही नेपाल में एक बड़ा तबका इस हफ्ते राजशाही समर्थक प्रदर्शनों में शामिल हुआ। 

रैली में योगी आदित्यनाथ का पोस्टर दिखाने पर विवाद क्यों?
पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के समर्थन में जब काठमांडू एयरपोर्ट के बाहर रैली चल रही थी, तब इनमें कुछ पोस्टरों का दिखना सबसे चौंकाने वाला रहा। यह पोस्टर थे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के। नेपाल के पूर्व राजा की रैली में मौजूद इन्हीं पोस्टरों को लेकर पूरा विवाद भड़क उठा। 

इस बीच नेपाल से भागकर भारत के गोरखपुर आए एक व्यक्ति विक्रम सिंह राणा ने दावा किया है कि उन्हें सिर्फ आदित्यनाथ का पोस्टर लहराने के लिए नेपाल पुलिस ने ढूंढना शुरू कर दिया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जुलुस की अगुवाई करने वाले राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी राष्ट्रवादी के पूर्व पदाधिकारी प्रदीप विक्रम राणा ने कहा कि नेपाल के लोग हिंदूवादी और योगी आदित्यनाथ के समर्थक हैं। इसीलिए वहां की सरकार पोस्टर को लेकर बखेड़ा खड़ा कर रही है। 

रिपोर्ट्स की मानें तो नेपाल नरेश के समर्थन में की गई रैली के बाद नेपाल पुलिस ने राणा की खोज शुरू कर दी। इसके बाद वह काठमांडू से भागकर पहले बिहार के रक्सौल पहुंचे। इसके बाद वे यात्री ट्रेन से गोरखपुर आए। उन्होंने कहा कि नेपाल के लोग यूपी सीएम को हिंदू गौरव के तौर पर देखते हैं, लेकिन नेपाल में उनका पोस्टर लहराने पर ही विवाद हो गया। 

नेपाल में इस पोस्टर को लेकर विवाद क्यों?
हालांकि, नेपाल में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर को लेकर विवाद शुरू हो गया। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने राजशाही के समर्थन में किए गए प्रदर्शनों पर तो टिप्पणी नहीं की, लेकिन उन्होंने इन रैलियों में योगी आदित्यनाथ की तस्वीरों को लेकर कटाक्ष किया। ओली ने कहा कि किसी देश को ऐसी स्थिति में नहीं होनी चाहिए, जहां विदेशी नेताओं की तस्वीरों का इस्तेमाल प्रदर्शनों में हो। ओली के समर्थकों ने भी इस दौरान आरोप लगाया कि ज्ञानेंद्र के समर्थन के पीछे भारत का हाथ है। 

हालांकि, नेपाल नरेश ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उनकी तरफ से कहा गया कि रैली में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर राजशाही समर्थक आंदोलन की छवि खराब करने की कोशिश है। उन्होंने इसके पीछे केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने ओली सरकार पर रैली में घुसपैठ कराने का आरोप भी लगाया। 

दूसरी तरफ राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के प्रवक्ता ज्ञानेंद्र शाही ने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया- "रैली में योगी आदित्यनाथ की फोटो केपी शर्मा ओली की सलाह पर दिखाई गई। उन्होंने इसके पीछे ओली के मुख्य सलाहकार बिष्णु रिमल का हाथ बताया।" 

योगी आदित्यनाथ के नेपाल राजपरिवार के साथ कैसे हैं रिश्ते?
नेपाल के पूर्व नरेश के समर्थकों ने रविवार की रैली में योगी की तस्वीर दिखाए जाने के पीछे किसी भी एजेंडे से इनकार किया है। हालांकि, यूपी सीएम के नेपाल राजपरिवार से अच्छे रिश्ते जगजाहिर हैं। दरअसल, योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मठ से हैं, जिसका नेपाल के राजपरिवार के साथ ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। इस मठ को स्थापित करने वाले बाबा गोरखनाथ नेपाल पर कई वर्षों तक शासन करने वाले शाह परिवार के इष्टदेव रहे हैं। 

इतना ही नहीं ज्ञानेंद्र शाह के भाई बीरेंद्र शाह ने लंबे समय तक योगी आदित्यनाथ के गुरु रहे महंत अवैद्यनाथ की गुरु के तौर पर सेवा की है। राजा बनने के बाद बीरेंद्र 1992 में खुद गाड़ी चलाकर काठमांडू से गोरखपुर मठ तक पहुंचे थे। माना जाता है कि 1990 में जब नेपाल में संविधान संशोधन किया गया तब महंत अवैद्यनाथ की सलाह पर ही राजा बीरेंद्र ने नेपाल को हिंदू राष्ट्र के तौर पर आगे बढ़ाने का फैसला किया। 

नेपाल राजपरिवार और गोरखनाथ मठ के यह करीबी रिश्ते नेपाल के लोकतंत्र बनने के बाद भी जारी रहे हैं। 2015 में जब नेपाल में भीषण भूकंप आए थे, तब गोरखपुर के सांसद रहे योगी आदित्यनाथ ने सीमाई इलाकों पर खुद निर्माण कार्यों की निगरानी की थी। इतना ही नहीं राहत और बचाव कार्यों में मठ के कई लोग भी जुटे थे। 

नेपाल में कैसे और क्यों खत्म हुई थी राजशाही?
  • नेपाल में राजशाही का इतिहास करीब 240 साल तक चला। 1768 में स्थापित हुए नेपाल साम्राज्य का अंत ज्ञानेंद्र के राजा रहते हुए ही हुआ। 
  • 2002 में ज्ञानेंद्र के बड़े भाई (और नेपाल के राजा) बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह के साथ उनके पूरे परिवार की हत्या हो गई थी। 
  • इसके बाद ज्ञानेंद्र शाह नेपाल के राजा बने। उन्होंने नेपाल के संवैधानिक प्रमुख के तौर पर काम किया। हालांकि, 2005 में उन्होंने सत्ता अपने हाथ में ले ली। 
  • ज्ञानेंद्र ने यह कदम राजशाही का विरोध कर रहे माओवादी विद्रोहियों को खत्म करने के लिए उठाया था। उन्होंने संसद भंग करने के साथ सरकार भी गिरा दी थी।
  • इस दौरान नेपाल के कई नेताओं और पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया। साथ ही इमरजेंसी लगाकर संचार व्यवस्था को भी बंद कर दिया गया और सुरक्षा व्यवस्था सेना के हाथ में दे दी गई।  
  • हालांकि, ज्ञानेंद्र का सत्ता हासिल करने का यह कदम उल्टा पड़ गया। उनके विरोध में नेपाल की सड़कों पर जबरदस्त प्रदर्शन हुए। आखिरकार 2006 में उन्हें सत्ता को छोड़ना पड़ा।
  • इसके बाद सरकार का माओवादियों के साथ शांति समझौता हुआ, जिससे देश में गृह युद्ध का भी अंत हो गया। 2008 में आखिरकार संसद ने नेपाल की शासन व्यवस्था में राजशाही की भूमिका को खत्म कर दिया और देश को धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के तौर पर स्थापित किया। 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed