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Nepal: युवाओं का आंदोलन.. अति आक्रामकता से दबाने में गंवाई ओली ने पीएम की कुर्सी, नेपाल में बवाल की पूरी कहानी

Wed, 10 Sep 2025 09:16 AM IST
अभिषेक दीक्षित वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Wed, 10 Sep 2025 09:16 AM IST
सार

भारत का पड़ोसी देश नेपाल लगातार दूसरे दिन हिंसा की आग में जलता रहा। ऊपरी तौर पर भले ही ऐसा लग रहा हो कि वहां यह आग सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाए जाने के कारण भड़की, लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं है कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, आर्थिक मोर्चे पर सरकार की नाकामियां जैसे कई मुद्दे हैं जिनको लेकर लंबे समय से देश में नाराजगी बढ़ रही थी। खासकर युवाओं में गहरा असंतोष पैठ चुका था।

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Nepal Crisis Story: KP Sharma Oli lost the PM chair for suppressing the Gen Z movement with extreme aggression
नेपाल में प्रदर्शन - फोटो : PTI

विस्तार

नेपाल में युवाओं और छात्रों के आंदोलन को आक्रामकता से दबाने की कोशिश प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को भारी पड़ गई और आखिरकार, उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी। काठमांडो की सड़कों पर प्रदर्शन शुरुआत में शांतिपूर्ण ही था पर प्रदर्शनकारी कुछ ही देर में अराजक हो गए। इसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि सरकार की तरफ से प्रदर्शनकारियों पर घातक बल प्रयोग किया गया। आंसू गैस, रबर बुलेट के बाद सुरक्षा कर्मियों ने फायरिंग से भी परहेज नहीं किया।  

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पीएम ओली ने हिंसा के लिए घुसपैठियों को जिम्मेदार ठहराया और जांच समिति गठित करने का आदेश दिया। प्रदर्शन शुरू होने के बाद पहले तो ओली ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध हटाने से इन्कार कर दिया और कहा कि वह उपद्रवियों के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। हालांकि, सोमवार देर रात उन्हें प्रतिबंध हटाने का फैसला करना पड़ा। नेपाल पिछले कुछ समय से गहरी निराशा से ग्रस्त है। इस साल मार्च में देशभर में राजशाही समर्थक प्रदर्शनों में दो लोगों की मौत हो गई थी। इन प्रदर्शनों ने राजशाही की वापसी के लिए बढ़ते समर्थन को रेखांकित किया। लेकिन, कहीं न कहीं लोगों की नाराजगी राजनीतिक व्यवस्था  और बढ़ती बेरोजगारी को लेकर भी थी।  ऐसे में सरकार ने जब 4 सितंबर को 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पाबंदी लगाई तो  गुस्सा और भड़क उठा।

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Nepal Crisis Story: KP Sharma Oli lost the PM chair for suppressing the Gen Z movement with extreme aggression
नेपाल में प्रदर्शन - फोटो : PTI

आक्रोश का त्रिकोण: राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार व बेरोजगारी

क्रांति : साल 2006 से तुलना और इस्तीफे का बढ़ा दबाव
जेन जी के प्रदर्शन की तुलना नेपाल में पूर्व राजशाही शासकों के खिलाफ 2006 की क्रांति से की जा रही है। शुरू में पीएम ओली की तरफ से दिखाए आक्रामक तेवरों से उनकी ही सरकार के सहयोगियों ने खुद को अलग कर लिया था। गृह मंत्री रमेश लेखक ने सोमवार को नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिया, जबकि कृषि  मंत्री ने भी सरकार की अधिनायकवादी कार्रवाइयों के विरोध में मंगलवार को इस्तीफा दे दिया। नेपाली कांग्रेस ने गठबंधन की उपयोगिता पर सवाल उठाए और ओली से पीएम पद छोड़ने को कहा। पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड जैसे विपक्षी नेताओं ने भी सरकार से लोगों की चिंताओं पर गौर करने का आह्वान किया।

चुनौती : खस्ताहाल अर्थव्यवस्था  और बार-बार सत्ता परिवर्तन
नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता, भष्टाचार और बेरोजगारी के त्रिकोण देश के युवाओं को निराश और नाराज किया। पिछले 17 साल में वहां 14 सरकारें बदली हैं। यानी लगभग हर साल नया प्रधानमंत्री। इतना ही नहीं भ्रष्टाचार को लेकर भी युवा पीढ़ी में आक्रोश पनपता रहा। निवर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा, पुष्प कमल दहल प्रचंड, बाबूराम भट्टराई, लगभग सभी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के मुताबिक नेपाल की साल 2025 में नॉमिनल प्रति व्यक्ति आय 1404 डॉलर (करीब 1.23 लाख रुपये) है। नौकरी और अवसरों की बेहद कमी है। नेपाल के लोग रोजगार के लिए बड़े पैमाने पर देश से पलायन करने को मजबूर हैं। मौजूदा विरोध प्रदर्शन दर्शाते हैं कि राजनीतिक अभिजात वर्ग के परिवारों व आमजन की जीवनशैली में जमीन-आसमान का अंतर भी युवा वर्ग में आक्रोश को भड़काता रहा है। सोशल मीडिया पर नेपोबेबी हैशटैग जमकर वायरल होना इसी का संकेत है।

Nepal Crisis Story: KP Sharma Oli lost the PM chair for suppressing the Gen Z movement with extreme aggression
नेपाल में प्रदर्शन - फोटो : PTI

सिर्फ सोशल मीडिया पर पाबंदी ने जेन-जी को नहीं बनाया आंदोलनकारी
नेपाल में मौजूदा विरोध-प्रदर्शनों में शामिल अधिकांश युवा 28 वर्ष से कम उम्र हैं, इसलिए इसे जेन-जी का आंदोलन कहा जा रहा है। यह संभवत: पहला मौका है, जब युवा पीढ़ी इस तरह सड़कों पर उतरी। लेकिन, क्या इतनी नाराजगी सिर्फ सोशल मीडिया पर पाबंदी को लेकर है? इसके जवाब में यही कहा जा सकता है....शायद नहीं।

युवाओं के आक्रोश को भड़काने वाले ऐसे ही कुछ कारणों पर एक नजर...

  • भ्रष्टाचार पर निशाना साधने का हथियार था सोशल मीडिया- सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ सड़कों पर उतरने से पहले युवा लोग सत्ताधारी वर्ग में व्याप्त भ्रष्टाचार और नेपो बेबीज को लेकर पोस्ट कर रहे थे। उनके लिए सोशल मीडिया अपनी नाराजगी जाहिर करने का एक हथियार बन चुका था। नेपो बेबीज और नेपो किड्स शब्द ऑनलाइन ट्रेंड कर रहे थे, लोग प्रमुख परिवारों के युवा सदस्यों की तस्वीरें पोस्ट करके सवाल उठा रहे थे कि उनकी जीवनशैली का खर्च कैसे उठाया जाता है। ऐसे में इस पर प्रतिबंध युवाओं के लिए अपना हथियार छिनने जैसा भी था।
  • कारोबार से लेकर परिवार से संपर्क तक सब कुछ हुआ प्रभावित- प्रतिबंधों पर प्रधानमंत्री ओली ने रविवार को दलील दी कि उनकी पार्टी सोशल मीडिया के खिलाफ नहीं है, लेकिन यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि जो नेपाल में व्यापार कर रहे हैं, पैसा कमा रहे हैं, लेकिन कानून का पालन नहीं कर रहे हैं। हालांकि, आलोचकों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आलोचनाओं को दबाने और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश की कोशिश माना। नेपाल की पर्यटन-संचालित अर्थव्यवस्था में कई लोग अपने व्यवसायों के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर हैं, जबकि प्रवासियों के लिए सोशल मीडिया परिवार से संपर्क का तरीका है।
  • सत्ता में बारी-बारी से नेताओं की एक ही जमात का वर्चस्व- नेपाल के 2008 में लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के बाद से कुछ नेताओं की एक जमात ही सत्ता के केंद्र में रही है। वही नेता बारी-बारी से कुर्सी पर आते-जाते रहे। सत्ता का चक्र आमतौर पर प्रधानमंत्री ओली, माओवादी केंद्र के पुष्प कमल दहल प्रचंड और पांच बार प्रधानमंत्री रहे शेर बहादुर देउबा के बीच ही चलता रहता है, जिनके गठबंधन अक्सर बनते-टूटते रहते हैं।
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