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Nepal Congress: धर्मनिरपेक्षता पर क्यों सिल गई नेपाली कांग्रेस की जुबान, घोषणापत्र पर उठे सवाल

Mon, 31 Oct 2022 07:20 PM IST
Atul Sinha Atul Sinha
Updated Mon, 31 Oct 2022 07:20 PM IST
सार

नेपाल में संसद और प्रांतीय असेंबलियों की प्रत्यक्ष निर्वाचन वाली सीटों पर मतदान अगले 20 नवंबर को होगा। संसद के निचले सदन में प्रत्यक्ष निर्वाचन वाली 165 सीटें हैं। सात प्रांतीय असेंबलियों में ऐसी 330 सीटें हैं। 

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Nepal Congress Manifesto doesnt describe Secular word enshrined in Constitution special report news in hindi
नेपाली कांग्रेस - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

सत्ताधारी नेपाली कांग्रेस ने अगले आम चुनाव के लिए जारी अपने घोषणापत्र में धर्मनिरपेक्षता का जिक्र नहीं किया है, जिस पर यहां कई हलकों से सवाल उठाए जा रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता नेपाल के संविधान के प्रमुख सिद्धांत है। समझा जाता है कि देश में दक्षिणपंथ के बढ़े प्रभाव के कारण नेपाली कांग्रेस ने रक्षात्मक रुख अपना लिया है। नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में पांच दलों का गठबंधन इस चुनाव में सत्ता का प्रमुख दावेदार है। 
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नेपाल में संसद और प्रांतीय असेंबलियों की प्रत्यक्ष निर्वाचन वाली सीटों पर मतदान अगले 20 नवंबर को होगा। संसद के निचले सदन में प्रत्यक्ष निर्वाचन वाली 165 सीटें हैं। सात प्रांतीय असेंबलियों में ऐसी 330 सीटें हैं। इस आम चुनाव में मुख्य मुकाबला नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की नेपाल की कम्यनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के बीच है। नेपाली कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र शनिवार को जारी किया। उसमें संघीय व्यवस्था को मजबूत करने का वादा उसने किया है।
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सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) है। धर्मनिरपेक्षता की रक्षा इस पार्टी का प्रमुख एजेंडा रहा है। हालांकि सत्ताधारी गठबंधन एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरा है, लेकिन इसमें शामिल पार्टियों ने अलग-अलग घोषणापत्र जारी करने का फैसला किया है। 
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नेपाली कांग्रेस का घोषणापत्र जारी होने के बाद कई हलकों से यह मांग उठी है कि पार्टी धर्मनिरपेक्षता के बारे में अपना रुख स्पष्ट करे। उन्होंने कहा है कि जिस समय कई समूह नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहे हैं, इस मुद्दे पर चुप रहने का विकल्प नेपाली कांग्रेस के पास नहीं है। राजनीति विश्लेषक उद्धब प्याकुरेल ने नेपाली कांग्रेस के इस रुख पर एतराज जताते हुए कहा है कि पार्टी को अपने घोषणापत्र में धर्मनिरपेक्षता के बारे में अपनी राय का स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए था।  

विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि नेपाली कांग्रेस के पूर्व महासचिव शशांक कोइराला अब हिंदू राष्ट्र के मुखर समर्थक हो गए हैं। उधर पार्टी में प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के विरोधी माने जाने वाले नेता शेखर कोइराला ने भी इस मुद्दे पर अपना रुख नरम कर लिया है। देउबा के बारे में भी माना जाता है कि उनकी प्राथमिकता भारत की वर्तमान सरकार से संबंध मजबूत करना है। इसलिए वे धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर जोर नहीं देना चाहते हैं। 

नेपाली कांग्रेस की घोषणापत्र समिति के प्रवक्ता जीवन परियार से जब इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा- ‘इस मुद्दे पर कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं बचा है।’ वैसे एक बार फिर पार्टी ने बढ़-चढ़ कर दावे किए हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि ऐसे वादों की अब ज्यादा साख नहीं बची है। प्याकुरेल ने कहा- ‘नेपाल में राजनीतिक दलों के घोषणापत्र खूब आकर्षक रहते आए हैं। लेकिन समस्या अमल में आई है। इसीलिए मतदाता अब इनकी ज्यादा चिंता नहीं करते। पार्टियों के लिए भी यह रस्म-अदायगी ही रह गया है।’


नेपाली कांग्रेस ने कुल 52 पेज का घोषणापत्र जारी किया है, जिसे उसने ‘प्रतिबद्धता पत्र’ कहा है। इसे तैयार करने के लिए 41 सदस्यों की समिति बनाई गई थी, जिसका नेतृत्व पार्टी महासचिव विश्व प्रकाश शर्मा ने किया। 
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