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नेपाल के बारे में अब कौन सी नीति बनाएगा चीन? भारत की चुप्पी पर दहल ने उठाए सवाल
Wed, 30 Dec 2020 03:01 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Wed, 30 Dec 2020 03:01 PM IST
सार
- नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में एकता के लिए चीन का ‘प्लान बी’ तैयार
- प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली बने मुसीबत की सबसे बड़ी वजह
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Chinese Ambassador to Nepal Hou Yanqi
- फोटो : File Photo
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विस्तार
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी पर छाए संकट के बीच ऐसा लगता है कि चीन अपना मकसद हासिल करने में नाकाम रहा है। यहां आए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के चार सदस्यों वाले दल की मंगलवार दिनभर नेपाली नेताओं से चली बातचीत से यही संकेत मिला। चीनी दल का पहला मकसद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में एकता बहाल करना था। ऐसा ना होने के कारण चीनी दल ने अपना प्लान बी पेश किया।
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इसके तहत प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और अब पार्टी का अपना अलग गुट बना चुके नेता पुष्प कमल दहल गुट से कहा गया कि वे अगला चुनाव गठबंधन करके लड़ने को तैयार हो जाएं। लेकिन स्थानीय मीडिया में छपी जानकारियों के मुताबिक प्रधानमंत्री ओली ने इन दोनों विकल्पों को ठुकरा दिया है।
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विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस के सूत्रों से मिली जानकारियों के आधार पर यहां के अखबारों ने छापा है कि ओली के रुख से मायूसी हाथ लगने के बाद चीनी दल ने यह संकेत दिया कि मुमकिन है कि अब चीन नेपाल के बारे में नई नीति तैयार करे। अपनी यात्रा के तीसरे दिन यानी मंगलवार को चीनी दल ने नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा से मुलाकात की। इसके अलावा इस दल ने जनता समाजवादी पार्टी के नेता बाबूराम भट्टराई से भी बातचीत की है।
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देउबा के विदेश नीति संबंधी सलाहकार रह चुके दिनेश भट्टराई ने यहां पत्रकारों को बताया कि चीनी दल ने देउबा को चीन यात्रा का आमंत्रण दिया है। इसे एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक अपने पहले मकसद में नाकाम रहने के बाद चीनी दल की कोशिश ओली विरोधी तमाम गुटों को एकजुट करने की है। अगर इसमें भी उसे नाकामी हाथ लगी, तभी चीन नेपाल से अपने संबंधों पर पुनर्विचार करेगा।
नेपाल में चीन की बड़े निवेश की योजना रही है। नेपाल चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड इनिशिएटिव का हिस्सा रहा है। पर्येवक्षकों के मुताबिक अगर सत्ता का समीकरण ओली गुट की तरफ झुका, तो चीन अपनी नेपाल संबंधी नीति में बड़ा बदलाव कर सकता है।
इस बीच नेपाल के अंदरूनी घटनाक्रम में भारत के पहलू की यहां खुल कर चर्चा होने लगी है। पुष्प कमल दहल ने कांतिपुर टीवी को दिए एक इंटरव्यू में यह सवाल उठया कि नेपाल के संवैधानिक संकट पर भारत ने अभी तक क्यों कुछ नहीं बोला है। बाद में एक राजनीतिक रैली में उन्होंने भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन ये सवाल पूछा कि नेपाल में प्रधानमंत्री ओली के लोकतंत्र विरोधी आचरण पर दुनिया के बड़े लोकतांत्रिक देश चुप क्यों हैं। विश्लेषकों के मुताबिक इन सवालों से दहल ने परोक्ष रूप से हालिया घटनाक्रम के बीच भारत और अमेरिका का हाथ होने का आरोप लगा दिया है।
यहां के अनेक पर्यवेक्षकों ने भी राय जताई है कि अक्तूबर और नवंबर में भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के प्रमुख, सेनाध्यक्ष और विदेश सचिव की यात्राओं के बाद ही ओली के रुख के बदलाव देखा गया। उसके पहले अगस्त तक ओली ने उग्र भारत विरोधी रुख अपना रखा था। ओली के नेतृत्व में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने पिछला चुनाव नेपाली राष्ट्रवाद की रक्षा के नाम पर लड़ा था। तब निशाना भारत ही था। इसीलिए चीन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की अंदरूनी खींचतान को लेकर पहले ज्यादा चिंतित नहीं था। लेकिन ओली ने अचानक संसद के निचले सदन को भंग करवा कर उसे हैरान कर दिया है। उसके बाद ही अब चीन को नई नेपाल नीति की संभावनाओं पर भी विचार करना पड़ रहा है।
पूर्व प्रधानमंत्री झालानाथ खनाल के विदेश नीति संबंधी सलाहकार मिलन तुलाधर ने यहां के अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा कि इसके पहले कि चीन नई नेपाल नीति बनाए, उसे यहां की जमीनी हालत को समझना होगा। चीनी दल यहां अब इसी कोशिश में जुटा है। लेकिन तुलाधर ने इस धारणा का खंडन किया कि ओली के नेतृत्व वाले सीपीएन (यूएमएल) और दहल के नेतृत्व वाले माओइस्ट सेंटर के विलय के पीछे चीन का हाथ था। उन्होंने कहा की चीन की भूमिका को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है, जबकि एकता और विभाजन दोनों के पीछे स्थानीय कारण रहे।
इसी अखबार से बातचीत में बीजिंग में नेपाल के राजदूत रह चुके महेश मासके ने कहा कि जब तक चीनी दल काठमांडू पहुंचा, दोनों गुट अलग हो चुके थे। इसलिए ऐसा नहीं लगता कि चीनी दल दोनों गुटों का फिर से विलय कराने का लक्ष्य लेकर आया था। लेकिन चीनी दल ने यहां अपना काफी वक्त गुजारा है, जो उल्लेखनीय है। इसके बावजूद यही लगता है कि चीनी दल यहां के हालात को समझने की कोशिश में है, ताकि जरूरत के मुताबिक चीन अपनी नीति बना या बदल सके।