फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Myanmar poltics crisis : Rohingya's suffering was understood majority community of Myanmar

म्यांमार में राजनीतिक संकट : अब जाकर समझ आई बहुसंख्यक समुदाय को रोहिंग्याओं की पीड़ा

Sun, 07 Mar 2021 02:22 PM IST
दीप्ति मिश्रा पीटीआई, यंगून
पीटीआई, यंगून Published by: दीप्ति मिश्रा Updated Sun, 07 Mar 2021 02:22 PM IST
विज्ञापन
Myanmar poltics crisis : Rohingya's suffering was understood majority community of Myanmar
आंग सान सू की
म्यांमार में लोकतंत्र समर्थक आंदोलनकारियों पर सैनिक शासन की जारी बर्बरता के बीच बड़ी संख्या में वहां से लोगों का पलायन शुरू हो गया है। वहां से भाग रहे दर्जनों लोग भारत की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं। उससे भी ज्यादा संख्या में लोग इसी मकसद से सीमा के आसपास मौजूद हैं। जानकारों ने कहा है कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि पिछले वर्षों में रोहिंग्या और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ जो हुआ, वह अब देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ दोहराया जाता लग रहा है।
विज्ञापन


बता दें कि म्यामांर के अल्पसंख्यक समूह दशकों से सेना का उत्पीड़न झेलते रहे हैं। पहाड़ी और जंगली क्षेत्रों में रहने वाले अल्पसंख्यक समूहों पर अत्याचार की कहानियां बहुचर्चित रही हैं। उन इलाकों में नरसंहार, बलात्कार, यातना, जबरिया मजबूरी, विस्थापन आदि लंबे समय से रोजमर्रा की बात रही है। 2016-17 में रखाइन प्रांत में सेना के अत्याचार के कारण सात लाख 40 हजार से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान पलायन कर बांग्लादेश चले गए थे। 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने रखाइन, चिन, शान, कचिन और करेन राज्यों में अल्पसंख्यकों के साथ सेना के सलूक को ‘मानव अधिकारों का घोर हनन’ बताया था। 
विज्ञापन


विश्लेषकों के मुताबिक, ये विडंबना है कि उस वक्त बहुसंख्यक समुदाय और आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) सेना के साथ खड़े थे। अब वो खुद सेना के निशाने पर आ गए हैँ।
विज्ञापन
विज्ञापन


अब मौजूदा आंदोलन के बीच अल्पसंख्यक समुदायों ने अपनी पीड़ा की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की है। मौजूदा आंदोलन पिछले महीने सेना के सत्ता हथिया लेने के बाद शुरू हुआ। पिछले चुनाव में एनएलडी को जीत मिली थी। लेकिन नई संसद की बैठक शुरू होने से कुछ घंटे पहले ही सेना तख्ता पलट दिया। अब आंदोलनकारी लोकतंत्र बहाली और आंग सान सू ची, हटाए गए राष्ट्रपति विन मिंत और अन्य सरकारी अफसरों की रिहाई की मांग कर रहे हैं। लेकिन अल्पसंख्यक समूहों के संगठनों ने कहा है कि ये मांगें मोटे तौर पर देश के बहुसंख्यक बौद्ध बामर समुदाय की हैं।


बहुसंख्यक देश के मैदानी इलाकों और यंगून और मंडाले जैसे बड़े शहरों में रहते हैं। अल्पसंख्यक समूहों का कहना है कि उनकी लड़ाई सेना बनाम एनएलडी के बजाय कहीं ज्यादा बड़े सवालों पर है। अल्पसंख्यकों के म्यांमार में लगभग 135 संगठन हैं।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed