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चीन के खिलाफ लामबंदी में अमेरिकी विदेश मंत्री पोम्पियो इंडोनेशिया में भी नाकाम

Fri, 30 Oct 2020 10:46 PM IST
गौरव पाण्डेय डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, जकार्ता
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, जकार्ता Published by: गौरव पाण्डेय Updated Fri, 30 Oct 2020 10:46 PM IST
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Mike Pompeo failed to bring Indonesia against China
अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो - फोटो : एएनआई (फाइल)

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो दक्षिणी और पूर्वी एशिया के देशों की अपनी यात्रा के आखिरी चरण में इंडोनेशिया पहुंचे, लेकिन लगता नहीं है कि वहां उन्हें अपने मकसद में कामयाबी मिली। उनका खास मकसद चीन के खिलाफ लामबंदी में इंडोनेशिया को शामिल करना था। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इंडोनेशिया एक बड़ा और प्रभावशाली देश है। शीत युद्ध के दिनों में यह अमेरिकी खेमे का एक मजबूत सदस्य था। लेकिन अब अमेरिकी मंशा के मुताबिक अपनी नीतियों को ढालने से उसने साफ इनकार कर दिया है।

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गुरुवार को जकार्ता में पोम्पियो से बातचीत के बाद इंडोनेशिया की विदेश मंत्री रत्नो एलपी मारसुदी ने साफ शब्दों में कहा कि इंडोनेशिया स्वतंत्र विदेश नीति रखने के अपने रुख पर कायम रहेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ रही प्रतिद्वंद्विता के बीच उनका देश तटस्थ रहेगा। जबकि पोम्पियो ने द्विपक्षीय वार्ता के दौरान उत्तर नतुना सागर में 'समुद्री संप्रभुता' की रक्षा करने के लिए इंडोनेशिया की तारीफ की थी। साथ ही चीन के इस दावे को गैर-कानूनी बताया था कि दक्षिण चीन सागर पर उसका अधिकार है। हालांकि इंडोनेशियाई विदेश मंत्री ने कहा कि पोम्पियो से उनकी बातचीत सद्भावपूर्ण और लाभदायक रही, लेकिन साथ ही उन्होंने जोड़ा कि 'हम इस प्रतिद्वंद्विता (अपना प्रभाव बढ़ाने की अमेरिकी और चीन की होड़) में नहीं फंसना चाहते।'
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समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक कुछ समय पहले इंडोनेशिया ने अमेरिका के पी-8 निगरानी विमानों को अपने देश में उतरने और वहां दक्षिण चीन सागर में चीन की सैनिक गतिविधियों पर नजर रखने का अधिकार देने से इनकार कर दिया था। पिछले महीने चीन के रक्षा मंत्री इंडोनेशिया की यात्रा पर आए थे। तब उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि इंडोनेशिया चीन के लिए एक सैनिक अड्डा बनाए। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री प्रभोवो सुबियान्तो ने इसे तुरंत ठुकरा दिया था। विश्लेषकों के मुताबिक इस तरह इंडोनेशिया ने इन दोनों में किसी एक देश के ज्यादा करीब आने से इनकार कर रखा है। लेकिन अतीत पर ध्यान दें, तो चीन से इंडोनेशिया के संबंध पिछली सदी में कभी अच्छे नहीं रहे। अब उसका अमेरिका और चीन से समान दूरी रखने की नीति एक तरह से चीन की कामयाबी है।
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इंडोनेशिया आसियान (एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स) का सदस्य है। आसियान ने हाल में मुक्त व्यापार के लिए क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) की संधि की है, जिसमें चीन भी शामिल हुआ है। चीन अपनी आर्थिक शक्ति के कारण इन देशों में निवेश के स्रोत और उनके माल के बाजार के रूप में मौजूद है। इसका ही असर है कि फिलपींस जैसे देशों का रुख भी चीन के प्रति नरम हो गया है, जबकि समुद्री अधिकार को लेकर उसका चीन के साथ सीधा टकराव है। उत्तरी नतुना सागर में मछली मारने को लेकर इंडोनेशिया का भी चीन से टकराव है। इस सागर को इंडोनेशिया अपना विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र समझता है। बीते समय में यहां आए चीन के जहाजों को इंडोनेशियाई नौसेना खदेड़ चुकी है। मगर पोम्पियो की यात्रा से साफ यह हुआ कि ऐसे विवादों को इंडोनेशिया द्विपक्षीय ही रखना चाहता है। वह चीन के खिलाफ अमेरिकी लामबंदी का हिस्सा नहीं बनना चाहता। 

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