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चीन की दरियादिली के आगे श्रीलंका पर नहीं पाया अमेरिकी जादू, चीनी मदद की राजपक्ष ने की जमकर तारीफ
Thu, 29 Oct 2020 01:48 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Thu, 29 Oct 2020 01:48 PM IST
सार
- अमेरिका की भी मदद लेने से श्रीलंका को कोई परहेज नहीं
- राजपक्षे ने दिया किसी के दबाव में नहीं आने का संकेत
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Mike Pompeo with Srilanka President Gotabaya Rajapaksa
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो जिन उम्मीदों के साथ श्रीलंका पहुंचे थे, वो शायद पूरी नहीं हुईं। इसके विपरीत उन्हें सीधे राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे से ऐसी बातें सुनने को मिलीं, जिसकी अपेक्षा उन्होंने नहीं की होगी। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने कहा कि चीन ने श्रीलंका के इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और अलगाववादी युद्ध के खात्मे में मदद दी है। उन्होंने कहा कि चीन की मदद की वजह से श्रीलंका कर्ज के किसी जाल में नहीं फंसा है। ये बातें अहम हैं, क्योंकि पोम्पियो की मौजूदा यात्रा का मकसद चीन के खिलाफ माहौल बनाना था।
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पोम्पियो और अमेरिकी अधिकारी विभिन्न देशों में हो रहे चीनी निवेश को ‘ऋण कूटनीति’ कहते हैं। उनका आरोप है कि ऐसे निवेश के बाद गरीब देश चीन के कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। मगर श्रीलंका ने इस पूरे कथानक को सिरे से नकार दिया है। गौरतलब है कि जब पोम्पियो की दक्षिण एशिया यात्रा का एलान हुआ, तब एक अमेरिकी अधिकारी ने श्रीलंका से अपील थी कि वह आर्थिक संबंधों के मामले में ‘कठिन चयन’ करे। जाहिर है, उस अधिकारी का इशारा श्रीलंका पर चीन के बढ़ रहे प्रभाव की तरफ था।
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पोम्पियो ने बुधवार को कोलंबो में कहा कि आर्थिक विकास हासिल करने के प्रयास में जुटे श्रीलंका के साथ अमेरिका लगातार संपर्क में बने रहने को तैयार है। वह श्रीलंका के साथ द्विपक्षीय संबंधों को और बढ़ाने की उम्मीद रखता है। पोम्पियो ने कहा कि अब श्रीलंका में अमेरिकी निवेश बढ़ाने को प्राथमिकता दी जाएगी।
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मगर गोटाबया राजपक्षे ने पोम्पियो से कहा कि वे अपने देश की स्वतंत्रता, संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं। इसके जरिए उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री को संदेश दिया कि चीन के साथ बढ़ रहे रिश्तों से श्रीलंका की स्वतंत्रता या संप्रभुता पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। हालांकि उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिकता अधिक से अधिक विदेशी निवेश जुटाना है। यानी श्रीलंका को अमेरिकी निवेश से भी कोई गुरेज नहीं है।
ऐसा लगता है कि कोरोना वायरस से फैली महामारी के बाद दुनिया में बनते हालात के बीच श्रीलंका जैसे देशों के लिए अधिक अनुकूल स्थितियां बन गई हैं। चीन अकेला बड़ा देश है, जिसने महामारी पर फिलहाल काबू पा लिया है और जिसकी अर्थव्यवस्था अभी भी वृद्धि दर हासिल कर रही है। ऐसे में समझा जा रहा है कि उसके लिए अपने रणनीतिक निवेश को आगे बढ़ाना ज्यादा आसान है।
जिन देशों में चीन ने निवेश किए हैं, वे इस लाभ को छोड़ना नहीं चाहते। चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका या कोई अन्य देश निवेश की पेशकश करता है, तो वे शायद उसका भी लाभ उठाना चाहते हैं।
इस बीच ऐसे संकेत हैं कि यूरेशियन इकॉनोमिक यूनियन (ईएईयू) और चीन डॉलर से अलग अपनी वैकल्पिक मौद्रिक व्यवस्था करने की तरफ बढ़ रहे हैं। ईएईयू यूरोपीय संघ की तर्ज बना देशों का समूह है, जिसमें रूस, बेलारूस, अर्मीनिया, कजाखस्तान और किर्गिजस्तान शामिल हैं। रूस और कई चीनी कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंध झेल रही हैं, जिससे उनके लिए डॉलर में कारोबार करना मुश्किल हो गया है।
ऐसे में वे ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था करने के प्रयास में हैं, जिससे कारोबार में डॉलर की अनिवार्यता खत्म हो जाए। यानी इस क्षेत्र में अमेरिका के मौद्रिक वर्चस्व को भी चुनौती दी जा रही है। श्रीलंका जैसे देशों की नजरें ऐसे घटनाक्रमों पर भी हैं। ये देश नए बन रहे ढांचों और अवसरों से दूर होना नहीं चाहते।