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Dictatorship In Pakistan : पाकिस्तानी पत्रकार ने की तानाशाह सरकार की वकालत, पड़ोसी मुल्क में कब-कब रही तानाशाही?
Tue, 04 Jan 2022 07:12 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Tue, 04 Jan 2022 07:12 PM IST
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पाकिस्तान
- फोटो :
iStock
विस्तार
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हसन निसार ने कथित तौर पर कहा है कि तानाशाही ही पाकिस्तान की सभी समस्याओं का समाधान है। मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से कहा गया है कि हसन निसार का यह भी बयान है कि देश में 15 सालों के लिए निरंकुशवादी सरकार होनी चाहिए और जो भी व्यक्ति लोकतंत्र की मांग करे उसे गोली मार देनी चाहिए। निसार ने यह बयान एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल से बात करते हुए दिया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में तानाशाही के अलावा कोई और चारा नहीं है। हालांकि, उनके इस विवादास्पद बयान को लेकर पाकिस्तान में उनका विरोध शुरू हो गया है। कई लोगों ने उन्हें टीवी शो में ‘फासीवाद फैलाने का आरोप लगाया।’हसन निसार के इस बयान पर पाकिस्तान के एक पत्रकार ने नाम नहीं छापने की शर्त पर अमर उजाला डिजिटल से कहा 'पाकिस्तान में तानाशाही के दौर में पत्रकारों ने लोकतंत्र की बहाली और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाई है, वे इस संघर्ष में शामिल रहे हैं। मैं समझता हूं कि वे ऐसा कहकर अवाम के साथ नाइंसाफी तो कर ही रहे हैं, पत्रकारिता का धर्म भी नहीं निभा रहे हैं। पत्रकार होने ने नाते हमें उन रास्तों को खोलने की बात करनी चाहिए जिसके वजह से हम अतीत में बुरे अनुभवों से गुजरे हैं, खुदा के लिए हमें फिर से अंधेरे में ले जाने की बात न की जाए। क्या वे भूल गए कि सैन्य शासन में पाकिस्तान ने क्या-क्या झेला है, हम कितना पीछे रह गए हैं, जबकि हमारे बाद अस्तित्व में आए देश लोकतंत्र में तरक्की कर रहे हैं।"
पाकिस्तानी सेना
- फोटो :
File Photo
पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही की विरासत
पाकिस्तानी का राजनीतिक इतिहास आंतरिक, बाहरी संघर्ष और सैन्य तानाशाही में लंबी अवधि तक रहने वाले एक अशांत देश का रहा है। देश ने मार्शल लॉ, घरेलू सशस्त्र संघर्षों और अलगाववादी आंदोलनों का खूब अनुभव किया है। अपने अस्तित्व में आने के बाद से सेना ने कई बार यहां शासन किया है। बंटवारे के बाद से ही यह देश लोकतंत्र और सैनिक शासन के बीच झूलता रहा है। 2018 में देश के सात दशकों के इतिहास में पहली बार लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई पाकिस्तान मुस्लिम लीग- नवाज (पीएमएल-एन) की सरकार ने लगातार दो बार अपना कार्यकाल पूरा किया। अधिकतर समय तक देश की शक्तिशाली सेना ने शासन किया।
पाकिस्तान में कब हुई सैनिक शासन की शुरुआत
यह बिडंबना रही कि भारत और पाकिस्तान एक साथ ही आजाद हुए लेकिन जहां भारत में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती गईं, पाकिस्तान में फौज की बूटों ने उसे लगातार कमजोर किया। बंटवारे के बाद से ही पाकिस्तान में लोकतंत्र के हालात ठीक नहीं रहे। पाकिस्तान के राजनेताओं पर भ्रष्टाचार समेत कई गंभीर आरोप लगते रहे। उस वक्त के पाकिस्तान के आर्मी कमांडर इन चीफ अयूब खान ने पाकिस्तान की राजनीति में दखल देना शुरू किया। 1959 में आम चुनाव होने वाला था। सभी पार्टियों ने तैयारी शुरू कर दी थी।
पाकिस्तानी का राजनीतिक इतिहास आंतरिक, बाहरी संघर्ष और सैन्य तानाशाही में लंबी अवधि तक रहने वाले एक अशांत देश का रहा है। देश ने मार्शल लॉ, घरेलू सशस्त्र संघर्षों और अलगाववादी आंदोलनों का खूब अनुभव किया है। अपने अस्तित्व में आने के बाद से सेना ने कई बार यहां शासन किया है। बंटवारे के बाद से ही यह देश लोकतंत्र और सैनिक शासन के बीच झूलता रहा है। 2018 में देश के सात दशकों के इतिहास में पहली बार लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई पाकिस्तान मुस्लिम लीग- नवाज (पीएमएल-एन) की सरकार ने लगातार दो बार अपना कार्यकाल पूरा किया। अधिकतर समय तक देश की शक्तिशाली सेना ने शासन किया।
पाकिस्तान में कब हुई सैनिक शासन की शुरुआत
यह बिडंबना रही कि भारत और पाकिस्तान एक साथ ही आजाद हुए लेकिन जहां भारत में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती गईं, पाकिस्तान में फौज की बूटों ने उसे लगातार कमजोर किया। बंटवारे के बाद से ही पाकिस्तान में लोकतंत्र के हालात ठीक नहीं रहे। पाकिस्तान के राजनेताओं पर भ्रष्टाचार समेत कई गंभीर आरोप लगते रहे। उस वक्त के पाकिस्तान के आर्मी कमांडर इन चीफ अयूब खान ने पाकिस्तान की राजनीति में दखल देना शुरू किया। 1959 में आम चुनाव होने वाला था। सभी पार्टियों ने तैयारी शुरू कर दी थी।
जुल्फिकार अली भुट्टो
- फोटो :
Social media
ऐसे लागू हुआ सैन्य शासन
‘द डॉन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक सात अक्टूबर 1958 की रात को सेना ने एयरपोर्ट, रेडियो स्टेशन और पोर्ट जैसी जगहों को अपने कब्जे ले लिया। तत्कालीन राष्ट्रपति इस्कंद मिर्जा ने सभी राजनैतिक दलों को अवैध घोषित कर दिया और जनता को बताया गया कि सैनिक कानून लागू हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उसके कुछ दिनों के बाद राष्ट्रपति को लंदन भेज दिया। इसके बाद अयूब खान ही 1969 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। अयूब खान के इस्तीफे के बाद साल 1969 में जनरल याह्या खान सत्ता पर काबिज हुए। जनरल याह्या खान के नेतृत्व में ही पाकिस्तान को 1971 में भारत के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा और बांग्लादेश के रूप में एक नया राष्ट्र बना।
हक ने भुट्टो को हटाकर देश में सैनिक शासन लागू कर दिया।
जुल्फिकार अली भुट्टो ने राष्ट्रपति के रूप में 1973 तक पाकिस्तान पर शासन किया। 14 अगस्त 1973 को पाकिस्तान में लोकतंत्र स्थापित हुआ। इस बार भुट्टो खुद प्रधानमंत्री बने। जुल्फिकार अली भुट्टो 14 अगस्त 1973 से पांच जुलाई 1977 तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। 1977 में पाकिस्तान के आर्मी चीफ मोहम्मद जिया उल हक ने भुट्टो को हटाकर देश में सैनिक शासन लागू कर दिया। हत्या के आरोप में भुट्टो को जेल भेज दिया गया और 1979 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। उसके बाद 1988 में जियाउल हक की विमान दुर्घटना में मौत होने तक पाकिस्तान में फौजी हुकूमत रही। बाद में चुनाव तो कई बार हुए लेकिन पाकिस्तान हमेशा लड़खड़ाता रहा
‘द डॉन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक सात अक्टूबर 1958 की रात को सेना ने एयरपोर्ट, रेडियो स्टेशन और पोर्ट जैसी जगहों को अपने कब्जे ले लिया। तत्कालीन राष्ट्रपति इस्कंद मिर्जा ने सभी राजनैतिक दलों को अवैध घोषित कर दिया और जनता को बताया गया कि सैनिक कानून लागू हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उसके कुछ दिनों के बाद राष्ट्रपति को लंदन भेज दिया। इसके बाद अयूब खान ही 1969 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। अयूब खान के इस्तीफे के बाद साल 1969 में जनरल याह्या खान सत्ता पर काबिज हुए। जनरल याह्या खान के नेतृत्व में ही पाकिस्तान को 1971 में भारत के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा और बांग्लादेश के रूप में एक नया राष्ट्र बना।
हक ने भुट्टो को हटाकर देश में सैनिक शासन लागू कर दिया।
जुल्फिकार अली भुट्टो ने राष्ट्रपति के रूप में 1973 तक पाकिस्तान पर शासन किया। 14 अगस्त 1973 को पाकिस्तान में लोकतंत्र स्थापित हुआ। इस बार भुट्टो खुद प्रधानमंत्री बने। जुल्फिकार अली भुट्टो 14 अगस्त 1973 से पांच जुलाई 1977 तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। 1977 में पाकिस्तान के आर्मी चीफ मोहम्मद जिया उल हक ने भुट्टो को हटाकर देश में सैनिक शासन लागू कर दिया। हत्या के आरोप में भुट्टो को जेल भेज दिया गया और 1979 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। उसके बाद 1988 में जियाउल हक की विमान दुर्घटना में मौत होने तक पाकिस्तान में फौजी हुकूमत रही। बाद में चुनाव तो कई बार हुए लेकिन पाकिस्तान हमेशा लड़खड़ाता रहा
परवेज मुशर्रफ
- फोटो :
पीटीआई
मुशर्रफ ने नवाज की सत्ता पलट दी
साल 1986 में जुल्फीकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो ने निर्वासन से लौटकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का नेतृत्व किया। 1988 से लेकर 1999 के बीच नवाज और बेनजीर भुट्टो दो-दो बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जरूर बने लेकिन लगातार पांच साल अपना कार्यकाल पूरे नहीं कर पाए।
1996 में हुए आम चुनाव के बाद नवाज शरीफ एक बार फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। 1999 में करगिल युद्ध में शिकस्त झेलने के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ ने शरीफ सरकार का तख्तापलट कर दिया। मुशर्रफ ने खुद को राष्ट्रपति घोषित किया। 2002 में हुए जनमत संग्रह में मुशर्रफ राष्ट्रपति चुने गए। वह सेना अध्यक्ष के पद पर भी बने रहे। जनरल मुशर्रफ के पतन के बाद ही लोकतंत्र की बहाली संभव हो सकी तथा शरीफ और बेनजीर 2007 में निर्वासन समाप्त कर स्वदेश लौट सके।
साल 1986 में जुल्फीकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो ने निर्वासन से लौटकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का नेतृत्व किया। 1988 से लेकर 1999 के बीच नवाज और बेनजीर भुट्टो दो-दो बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जरूर बने लेकिन लगातार पांच साल अपना कार्यकाल पूरे नहीं कर पाए।
1996 में हुए आम चुनाव के बाद नवाज शरीफ एक बार फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। 1999 में करगिल युद्ध में शिकस्त झेलने के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ ने शरीफ सरकार का तख्तापलट कर दिया। मुशर्रफ ने खुद को राष्ट्रपति घोषित किया। 2002 में हुए जनमत संग्रह में मुशर्रफ राष्ट्रपति चुने गए। वह सेना अध्यक्ष के पद पर भी बने रहे। जनरल मुशर्रफ के पतन के बाद ही लोकतंत्र की बहाली संभव हो सकी तथा शरीफ और बेनजीर 2007 में निर्वासन समाप्त कर स्वदेश लौट सके।
पाकिस्तान से आतंकी भारत में घुसपैठ की कोशिश करते हैं।
- फोटो :
ANI
सैन्य शासन का क्या नतीजा हुआ
अंततराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार सैन्य शासन की मार झेलने के कारण कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें बुरी तरह कमजोर हो गईं। सैन्य शासकों ने देश में तानाशाही की और मनमाने तरीके से राज किया। पाकिस्तान में एक द्वंद चलता रहा कि वह किस तरह की राजनीतिक व्यवस्था के तहत रहना चाहता है। एक चुनी हुई सरकार नहीं होने से लोग बार-बार निराश हुए, वे अलग-थलग महसूस करने लगे। देश में अलगाववाद और आतंकवाद बढ़ने लगा।
पाकिस्तानी सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर करीब करीब अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध छेड़ने के करीब आ चुकी थी। पाकिस्तान में काफी लम्बे अर्से तक रहे सैनिक शासन रहने के कारण सेना ने सरकार के समूचे तंत्र में घुसपैठ कर ली। राजनीतिक दलों, न्यायपालिका, नौकरशाही और मीडिया पर उसका असर देखा गया।
अंततराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार सैन्य शासन की मार झेलने के कारण कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें बुरी तरह कमजोर हो गईं। सैन्य शासकों ने देश में तानाशाही की और मनमाने तरीके से राज किया। पाकिस्तान में एक द्वंद चलता रहा कि वह किस तरह की राजनीतिक व्यवस्था के तहत रहना चाहता है। एक चुनी हुई सरकार नहीं होने से लोग बार-बार निराश हुए, वे अलग-थलग महसूस करने लगे। देश में अलगाववाद और आतंकवाद बढ़ने लगा।
पाकिस्तानी सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर करीब करीब अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध छेड़ने के करीब आ चुकी थी। पाकिस्तान में काफी लम्बे अर्से तक रहे सैनिक शासन रहने के कारण सेना ने सरकार के समूचे तंत्र में घुसपैठ कर ली। राजनीतिक दलों, न्यायपालिका, नौकरशाही और मीडिया पर उसका असर देखा गया।