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ब्रिटेन में बहुमत की राय: लोकतंत्र पर धनपतियों और कॉरपोरेट ने कर लिया है कब्जा, तेजी से उठ रहा लोगों का भरोसा
Thu, 14 Apr 2022 11:09 PM IST
Amit Mandal
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Thu, 14 Apr 2022 11:09 PM IST
सार
इस अध्ययन के दौरान सिर्फ छह प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि सरकार जो फैसले लेती है, उसमें उनकी राय को महत्त्व दिया जाता है।
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ब्रिटेन
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
ब्रिटेन में लोगों का अपने देश के लोकतंत्र से भरोसा तेजी से उठ रहा है। खास युवा मतदाताओं में ये राह गहराई है कि ब्रिटिश लोकतंत्र देश की जनता के हितों को पूरा करने में नाकाम हो गया है। यह बात एक अध्ययन से सामने आई है। अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक अब ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि राजनीतिक दलों के लिए अब ज्यादा उन्हें चंदा देने वाले धनी तबके और कारोबारी घराने हो गए हैँ।
थिंक टैंक आईपीपीआर ने अखबार ऑब्जर्वर के सहयोग से यह अध्ययन किया। अखबार ने इसके नतीजों को ‘परेशान करने वाला’ बताया है। अध्ययन का विषय- लोकतंत्र का भविष्य था। अध्ययन रिपोर्ट रोड टू रिन्यूअल (नया रूप देने का रास्ता) नाम से प्रकाशित हुई है। इस अध्ययन के दौरान सिर्फ छह प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि सरकार जो फैसले लेती है, उसमें उनकी राय को महत्त्व दिया जाता है।
इसके उलट 25 प्रतिशत मतदाताओं ने राय जताई कि सरकारों की नीतियों को तय करने में बड़ी भूमिका उन्हें चंदा देने वाले समूहों की होती है। 16 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि सरकार की नीतियां कारोबारी समूह और बड़ी कंपनियां तय करते हैँ। 13 प्रतिशत लोगों ने राय जताई कि सरकार की नीतियां तय करने में मीडिया की प्रमुख भूमिका होती है। जबकि 12 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि लॉबिंग करने वाले समूहों की प्रमुख भूमिका होती है।
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विश्लेषकों के मुताबिक चंदा देने समूह, कारोबारी समूह, और लॉबिंग करने वाले समूह लगभग एक जैसे हितों के प्रतिनिधि होते हैँ। मीडिया घरानों पर भी इन्हीं तबकों का नियंत्रण होता है। ऐसे में समझा जा सकता है कि ब्रिटिश मतदाताओं में लगभग दो तिहाई यह मानते हैं कि सरकारें कॉरपोरेट घरानों और धनी-मानी तबकों के स्वार्थ के मुताबिक चल रही हैँ।
रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ दो प्रतिशत लोगों ने कहा कि ट्रेड यूनियनों की सरकार के फैसलों के पीछे कोई भूमिका होती है। रिपोर्ट तैयार करने वाले शोधकर्ताओं के मुताबिक 1970 और 1980 के दशक की तुलना में आम धारणा में यह बहुत बड़ा बदलाव है। तब बहुमत की राय होती थी कि ट्रेड यूनियनों की मांग का सरकार के फैसलों पर काफी असर होता है।
अध्ययनकर्ताओं ने कहा है कि लोकतंत्र के प्रति ऐसे मोहभंग की स्थिति सिर्फ ब्रिटेन में नहीं है। बल्कि हाल के दशकों में तमाम धनी देशों लोगों की ऐसी सोच कई रूपों में जाहिर हुई है। मतदान में भागीदारी घटना, पार्टी सदस्यता में भारी गिरावट, और भड़काऊ नारों के आधार पर सस्ती लोकप्रियता की राजनीति करने वाले नेताओँ के लिए बढ़ा समर्थन इसी ट्रेंड का संकेत है।
शोधकर्ताओं ने राजनीतिक दलों को ब्रिटेन में लोकतंत्र की मौजूदा हालत पर सोच-विचार करने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि नेताओं को आम नागरिकों से फिर से अपना जुड़ाव कायम करना होगा। साथ ही सत्ता के विकेंद्रीकरण की जरूरत है। सरकारों की सत्ता पर सीमा लगाने की सलाह भी रिपोर्ट में दी गई है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि लोगों में गहराती ये भावना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है कि राजनेताओं को उनकी समस्याओं की कोई समझ नहीं है।
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थिंक टैंक आईपीपीआर ने अखबार ऑब्जर्वर के सहयोग से यह अध्ययन किया। अखबार ने इसके नतीजों को ‘परेशान करने वाला’ बताया है। अध्ययन का विषय- लोकतंत्र का भविष्य था। अध्ययन रिपोर्ट रोड टू रिन्यूअल (नया रूप देने का रास्ता) नाम से प्रकाशित हुई है। इस अध्ययन के दौरान सिर्फ छह प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि सरकार जो फैसले लेती है, उसमें उनकी राय को महत्त्व दिया जाता है।
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इसके उलट 25 प्रतिशत मतदाताओं ने राय जताई कि सरकारों की नीतियों को तय करने में बड़ी भूमिका उन्हें चंदा देने वाले समूहों की होती है। 16 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि सरकार की नीतियां कारोबारी समूह और बड़ी कंपनियां तय करते हैँ। 13 प्रतिशत लोगों ने राय जताई कि सरकार की नीतियां तय करने में मीडिया की प्रमुख भूमिका होती है। जबकि 12 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि लॉबिंग करने वाले समूहों की प्रमुख भूमिका होती है।
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विश्लेषकों के मुताबिक चंदा देने समूह, कारोबारी समूह, और लॉबिंग करने वाले समूह लगभग एक जैसे हितों के प्रतिनिधि होते हैँ। मीडिया घरानों पर भी इन्हीं तबकों का नियंत्रण होता है। ऐसे में समझा जा सकता है कि ब्रिटिश मतदाताओं में लगभग दो तिहाई यह मानते हैं कि सरकारें कॉरपोरेट घरानों और धनी-मानी तबकों के स्वार्थ के मुताबिक चल रही हैँ।
रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ दो प्रतिशत लोगों ने कहा कि ट्रेड यूनियनों की सरकार के फैसलों के पीछे कोई भूमिका होती है। रिपोर्ट तैयार करने वाले शोधकर्ताओं के मुताबिक 1970 और 1980 के दशक की तुलना में आम धारणा में यह बहुत बड़ा बदलाव है। तब बहुमत की राय होती थी कि ट्रेड यूनियनों की मांग का सरकार के फैसलों पर काफी असर होता है।
अध्ययनकर्ताओं ने कहा है कि लोकतंत्र के प्रति ऐसे मोहभंग की स्थिति सिर्फ ब्रिटेन में नहीं है। बल्कि हाल के दशकों में तमाम धनी देशों लोगों की ऐसी सोच कई रूपों में जाहिर हुई है। मतदान में भागीदारी घटना, पार्टी सदस्यता में भारी गिरावट, और भड़काऊ नारों के आधार पर सस्ती लोकप्रियता की राजनीति करने वाले नेताओँ के लिए बढ़ा समर्थन इसी ट्रेंड का संकेत है।
शोधकर्ताओं ने राजनीतिक दलों को ब्रिटेन में लोकतंत्र की मौजूदा हालत पर सोच-विचार करने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि नेताओं को आम नागरिकों से फिर से अपना जुड़ाव कायम करना होगा। साथ ही सत्ता के विकेंद्रीकरण की जरूरत है। सरकारों की सत्ता पर सीमा लगाने की सलाह भी रिपोर्ट में दी गई है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि लोगों में गहराती ये भावना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है कि राजनेताओं को उनकी समस्याओं की कोई समझ नहीं है।