पिछले कुछ दशकों में हुए महत्वपूर्ण प्रदर्शनों से क्या मिला और क्या खोया?
- हांगकांग से लेकर खार्तूम, बगदाद से लेकर बैरट तक प्रदर्शन
- कोरोना वायरस महामारी से पहले दुनिया में कई जगह प्रदर्शन
- दुनिया के ऐतिहासिक प्रदर्शनों से क्या मिला और क्या खोया
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कोरोना वायरस महामारी के पैर पसारने से पहले दुनिया में कई जगहों पर अलग-अलग मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। हालांकि महामारी के बाद इन प्रदर्शनों पर रोक लग गई थी लेकिन अमेरिका में अश्वेत व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉएड की मौत के बाद दुनिया में विरोध प्रदर्शन होने एक बार फिर शुरू हो गए।
हांगकांग से लेकर खार्तूम, बगदाद से लेकर बैरट, गाजा से लेकर पेरिस और काराकास से लेकर सैंटियागो तक 2019 में लोगों ने सड़कों पर आजादी, प्रभुता, सरल जीवन के लिए विरोध प्रदर्शन किया। लेकिन जॉर्ज फ्लॉएड की मौत के बाद अमेरिका समेत दुनिया के कई हिस्सों में जमकर विरोध प्रदर्शन हुए।
पुलिस की बर्बरता और नस्लवादी हिंसा सारे समाज में अनुभव की गई है। विरोध प्रदर्शन की मूल भावना है बदलाव की इच्छा। ये बदलाव सरकार की क्रियाओं पर निर्भर करता है। चीन में जैसे ही कोरोना वायरस का कहर कम हुआ, वैसे ही हांगकांग में प्रदर्शनों की आवाज तेज हो गई।
एक सत्तावादी सरकार प्रदर्शनकारियो के आगे झुकती नहीं है। सत्तावादी के खिलाफ प्रदर्शन करना जीवन और मौत का संघर्ष है। पिछले कुछ दशकों के बड़े और शक्तिशाली विरोध प्रदर्शनों पर नजर डालते हैं और देखते हैं कि इन प्रदर्शनों ने क्या पाया और क्या खोया...
अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन
अमेरिका में एक अश्वेत व्यक्ति के पुलिस की हिरासत में हत्या होने के बाद से पिछले कई हफ्तों से जगह-जगह पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। ऐसा पहली बार नहीं है कि अमेरिका में अश्वेत व्यक्ति के मारे जाने पर हिंसका विरोध प्रदर्शन हुए हैं। 1950-1960 के संकटपूर्ण समय में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1963 में 2,50,000 लोगों के साथ वॉशिंगटन डीसी में मार्च निकाला।
उस समय मालकॉल्म एक्स एक विशाल वयक्तित्व के तौर पर उभर कर सामने आए। ये दो अलग-अलग रास्तों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। पहला बहुल संख्या में अहिंसा का प्रदर्शन और दूसरा किसी भी रास्ते को अपनाकर अपने हित का परिणाम लाना। नागरिक अधिकार कानून की शुरुआत कैनेडी प्रशासन की ओर से की गई थी।
इसके अलावा जॉनसन प्रशासन की ओर से मतदान अधिकार कानून का पास किया गया जिसने अमेरिका में नस्लीय भेदभाव को खत्म करने में सहानुभूति का काम किया। नागरिक अधिकार आंदोलन की वजह से ये महत्वपूर्ण बिंदू दुनिया के सामने आए। लेकिन सामाजिक अन्याय और वियतनाम युद्ध के बाद से अमेरिका का परचम जोर पकड़ने लगा, जो दशकों तक चला। अमेरिका का शासन 1968 में नागरिक अशांति की चरम सीमा पार कर गया, जो आज साल 2020 तक चली आ रही है।
अमेरिका के डेमोक्रेट पार्टी के नेता पुलिस की कार्रवाई और जवाबदेही की जांच करने का प्रस्ताव रख रहे हैं लेकिन वॉशिंगटन में इसे पक्षपात की ओर से खींच लिया जाएगा। राष्ट्रपति चुनाव के लिए खड़े डेमोक्रेट उम्मीदवार जोई बिडेन पुलिस को बचाने जैसी बातों से खुद को दूर रख रहे हैं।
आयरन कर्टेन फॉल्स
साल 1989 में पूर्वी यूरोप में कम्यूनिस्ट शासन को गिराने के लिए लोगों के विरोध में ही क्रांतिकारियों जैसे सुर थे। एक-एक करके देश रिवर्स दूरगामी प्रभाव की ओर जाते जा रहे थे। सोवियत के आखिरी नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने टेक्टोनिक शिफ्ट के लिए जमीनी स्तर पर काम किया।
बर्लिन की दीवार गिरी और पूर्वी जर्मनी, पोलैंड और दूसरे देशों से एक-पार्टी का शासन खत्म हो गया। इस तरह बिना किसी का खून बहाए आयरन कर्टेन के पीछे ये सारा काम हुआ। हालांकि रोमानिया के निकोली सीयूसेस्कु की निरंकुशता और उसके परिवार ने क्रिसमस के दिन गोली चलाई थी।
उस समय को चेकोसलोवाकिसा में वेलवेट क्रांति में शामिल किया गया जो प्राग वसंत के लिए ऐतिहासिक मारक था। ये एक तरह का मानव चेहरे से साम्यवाद के उदारीकरण के आलिंगन का समय था जो कि 1968 में सोवियत संघ के नेतृत्व वाले वारसा पैक्ट के आधे से अधिक सैनिकों की ओर से बेरहमी से कुचल दिया गया था।
अरब वसंत और वर्तमान लाल
मध्य पूर्व और उत्तरी अमेरिका के लोग तत्कालीन सरकार के निरीक्षण और दशकों से दबे हुए सिस्टम को दोबारा शुरू करने की मांग के साथ सड़कों पर उतरे थे। साल 2010 के दिसंबर में पुलिस की बर्बरता की वजह से सड़क पर अपनी दुकान लगाने वाले एक दुकानदार ने खुद को आग के हवाले कर दिया था।
जिसके बाद तुनिसिया में इसके खिलाफ आवाज़ उठाई और प्रदर्शन करना शुरू किया। मिस्र में भी पुलिस की हिरासत में एक युवा की मौत से धरने प्रदर्शन हुए, जो जल्द ही पूरे मिस्र में फैल गए। इसके बाद मिस्र में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी हटा दिए गए।
मोहम्मद मोरसी के हटने के बाद मिस्र के लोग सत्तावादी शासन के तहत रहने के लिए मजबूर हो गए और लोगों की तरफ से आ रही सभी असहमतियों को बुझा दिया गया और हजारों कमजोर लोगों को जेल में डाल दिया गया।
सीरिया के बशर-अल-अससाद के शासन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे थे जो सरकरा के कड़े कानूनों और कार्रवाई के बाद खत्म होने शुरू हो गए। जिसके बाद सीरिया में एक क्राांतिकारी समूह तैयार हो गया जिसे विदेश से समर्थन मिला और युद्ध के लिए पक्की सड़कों की तलाश होने लगी।
साल 2015 में रूस के दखल देने के बाद इस संयोजित किया गया। लगभग एक दशक तक चले इस युद्ध में पांच लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और लाखों लोग अपने घर से बेघर हो गए। वहीं पड़ोसी लेबनाना और इराक में पिछले साल अक्तूबर में भ्रष्टाचार और सत्ता के खिलाफ नागरिक विरोध प्रदर्शन हुए।
इराक में दसियों प्रदर्शनकारियों को मार दिया गया। कोविड-19 से लड़ने के लिए स्वास्थ्य विभाग सुचारू नहीं है और तेल राजस्व का नुकसान इराक पर भारी पड़ रहा है। दोनों ही जगहों पर जल्दी ही प्रदर्शनकारी एकजुट हो सकते हैं।
2019 और 2020 की विचारधारा
अल्जीरिया में फरवरी 2019 में शुरू हुए प्रदर्शन का परिणाम यह रहा कि वहां लंबे समय के सत्ता में बैठे अब्देलज़िज़ बुउटफ्लिका को इस्तीफा देना पड़ा। दिसंबर में वहां विवादास्पद राष्ट्रपति चुनाव हुए लेकिन प्रदर्शनकारियों की एक मांग रही कि नागरिकों की ओर चयनित किए गए व्यक्ति को ही उस पद पर बैठाया जाए।
सूडान में प्रदर्शनों का परिणाम यह रहा कि वहां सालों से चला आ रहा सेना का शासन को हटा दिया। अप्रैल 2019 में सेना की ओर से ऊमर-अल-बशीर को पद से नीचे गिरा दिया गया और प्रदर्शनकारियों ने नागरिक और सेना की साझी सत्ता को चलाने का दबाव डाला, जिसके बाद सोवरिन काउंसिल बनी।
हॉन्ग-कॉन्ग में भी लोकतांत्रिक शक्ति को बचाए रखने के लिए पिछले एक साल से प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन तीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का हॉन्ग-कॉन्ग को लेकर रुख साफ है, वो और चीन की सेना हॉन्ग-कॉन्ग को बीजिंग के शासन तहत लाना चाहती है।