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कितना 'आजाद' है पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर? सच जानकर रह जाएंगे हैरान

Thu, 15 Aug 2019 11:04 PM IST
अमर शर्मा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: अमर शर्मा Updated Thu, 15 Aug 2019 11:04 PM IST
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jammu and kashmir pakistan occupied kashmir history gilgit baltistan status pakistan role
जम्मू-कश्मीर का इतिहास - फोटो : अमर उजाला
"पाकिस्तान और हिंदुस्तान के वजूद में आने से कश्मीरी सबसे ज्यादा डिस्टर्ब हुए। हिंदुस्तान को आजादी मिली। पाकिस्तान को आजादी मिली। बीच में हम लोग फंस गए। 1931 से लेकर आज तक कश्मीरी बॉर्डर पर शहीद होते हैं। जो अंदर रहते हैं वो भी शहीद होते हैं। वो सिर्फ आजादी के मकसद के लिए कुर्बानी दे रहे हैं।"
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बीबीसी से ये बातें साझा करने वाले ये शख्स जम्मू कश्मीर के उस हिस्से में रहते हैं, जहां से बातें कम सामने आती हैं। ये कश्मीर का वो हिस्सा है जिसका प्रशासन पाकिस्तान के हाथ है।
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हालात पर अफसोस जाहिर करने वाले इस शख्स की गुजारिश पर हम इनका नाम जाहिर नहीं कर रहे हैं। वो साल 1990 में भारतीय कश्मीर से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर चले गए थे। वो वहां 'सुकून से होने का' दावा तो करते हैं लेकिन दर्द रह कर जुबान पर आ जाता है।
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पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर

इसी तरह के कई मलाल कश्मीर से गईं रजिया भी अपने दिल में समेटे हैं। हम इनका भी असली नाम जाहिर नहीं कर रहे हैं।

वो कहती हैं, "सुकून है तो मुश्किल भी ज्यादा है। दिल तो बहुत करता है वहां (कश्मीर) जाने का। लेकिन किस तरह जाएं। जब तक कश्मीर का कोई फैसला नहीं होता है तो किस तरह जा सकते हैं। अगर हम इधर सोना भी खाते हैं (यानी कितनी ही अमीरी में भी रहें) तो भी हमें दुख अपने वतन का जरूर है। हम सोचते हैं कि अगर हमारी कब्र भी हो तो अपने वतन में हो। और मैं आपको क्या बताऊं।"

हालांकि, रजिया भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के हालात के बारे में बोलने से कतराती हैं।

लेकिन रुहाना खान को ऐसी कोई दिक्कत नहीं है। वो एक छात्रा हैं। हम इनका भी असल नाम जाहिर नहीं कर रहे हैं।

वो कहती हैं, "जिंदगी बस गुजर ही जाती है लेकिन (हमारी जिंदगी) बड़ी मुश्किल हालात से गुजर रही है। हमें पाकिस्तान सरकार जो अलाउंस देती है, उसमें हमारा गुजारा बड़ी मुश्किल से या कहें कि हो ही नहीं सकता।"

जम्मू और कश्मीर

भारत के विभाजन और पाकिस्तान के अलग देश बनने के पहले जम्मू कश्मीर डोगरा रियासत थी और इसके महाराजा हरि सिंह थे। अगस्त 1947 में पाकिस्तान बना और करीब दो महीने बाद करीब 2.06 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली जम्मू कश्मीर की रियासत भी बंट गई।

इसके बाद के 72 सालों में यानी अब तक दुनिया काफी बदल गई है। जम्मू कश्मीर की लकीरों में भी बदलाव आया है लेकिन नहीं बदली है तो इसे लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तब से शुरू हुई तनातनी और खींचतान। 

दोनों देश जम्मू और कश्मीर पर अपना हक जताते हैं और इसके लिए कई बार मैदान-ए-जंग में भी उतर चुके हैं। गोलियों और धमाकों के शोर, नेताओं के भाषणों और बुलंद नारों के बीच कश्मीरियों की आवाज अगर गुम नहीं होती तो अनसुनी जरूर रह जाती है।

भारतीय सेना

शिकायतें उन्हें भी हैं, जो हमेशा से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में रहते रहे हैं। पाकिस्तान का कश्मीर के जिस हिस्से पर कब्जा है, वो उसे 'आजाद कश्मीर' बताता है।

1947 में जब पाकिस्तान की तरफ से खुद को 'आजाद आर्मी' बताने वाली कबायली फौज कश्मीर में दाखिल हुई तब महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और राज्य के विलय के प्रस्ताव पर दख्तखत किए।

भारतीय सेना जब तक कश्मीर पहुंची तब तक जम्मू और कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान के कबायली कब्जा कर चुके थे और वो रियासत से कट चुका था।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में रहने वाले लेखक अब्दुल हकीम कश्मीरी लंबे अर्से से कश्मीर मामले पर करीबी नजर रखते हैं।

अब्दुल हकीम कश्मीरी कहते हैं, "पहले सीजफायर के बाद जो हिस्सा पाकिस्तान के पास आया, उससे यहां दो हिस्सों में हुकूमतें बनीं। एक आजाद कश्मीर था। एक गिलगित बाल्टिस्तान। हुकूमत आजाद ए कश्मीर 24 अक्टूबर 1947 को बनाई गई। 28 अप्रैल 1949 को हुकूमत के प्रेसिडेंट ने एक समझौते के तहत गिलगित बाल्टिस्तान का एक बड़ा इलाका पाकिस्तान को दिया।" 

लगभग पूरी आबादी मुसलमान है...

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान जम्मू और कश्मीर रियासत के ही हिस्से थे। मौजूदा दौर में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पास 5,134 वर्ग मील यानी करीब 13 हजार 296 वर्ग किलोमीटर इलाका है। इसकी सरहदें पाकिस्तान, चीन और कश्मीर से लगती हैं। मुजफ्फराबाद इसकी राजधानी है और इसमें 10 जिले हैं।

वहीं गिलगित बाल्टिस्तान में 28 हजार 174 वर्ग मील यानी करीब 72 हजार 970 वर्ग किलोमीटर इलाका है। गिलगित बाल्टिस्तान में भी 10 जिले हैं। इसकी राजधानी गिलगित है। इन दोनों इलाकों की कुल आबादी 60 लाख के करीब है और लगभग पूरी आबादी मुसलमान है।

समझौतों का उल्लंघन

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पूर्व चीफ जस्टिस सैयद मंजूर गिलानी दावा करते हैं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पास पाकिस्तान के राज्यों से ज्यादा अधिकार हैं। लेकिन वो गिलगित बाल्टिस्तान इलाके को कराची समझौते के तहत पाकिस्तान को सुपुर्द करने के फैसले पर सवाल उठाते हैं।

वो कहते हैं, "कराची समझौता अप्रैल 1949 में हुआ था। ये पाकिस्तान सरकार, आजाद कश्मीर की सरकार और तब की रूलिंग पार्टी के दरम्यान हुआ था। अगर उस समझौते की भावना के तहत यहां संविधान बन जाता तो हमें ज्यादा खुद मुख्तारी हासिल होती। उस समझौते में एक ही ड्रॉ बैक था कि गिलगित बाल्टिस्तान पाकिस्तान को सरेंडर कर दिया गया।"

भारत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान दोनों पर ही हक जताता है। भारत में नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजरी बोर्ड के सदस्य और रॉ के पूर्व स्पेशल सेक्रेटरी तिलक देवाशर पाकिस्तान और कश्मीर मामलों पर करीबी नजर रखते हैं। वो पाकिस्तान पर कई किताबें भी लिख चुके हैं। वो कहते हैं कि पाकिस्तान ने समझौतों का बार-बार उल्लंघन किया है।

नियंत्रण पाकिस्तान के पास

देवाशर कहते हैं, "अभी भारत के लिए कहा जा रहा है कि 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर का स्टेटस बदल दिया। सबसे बड़ी बात है कि पाकिस्तान ने इसका (समझौते का) उल्लंघन किया था। मैं उदाहरण देता हूं। मार्च 1963 में पाकिस्तान ने कश्मीर का एक इलाका चीन को दे दिया। ये करीब 1900 वर्ग मील था।"

"ये भी समझौते का उल्लंघन था। फिर 1949 का कराची समझौता था, जहां गिलगित बाल्टिस्तान के लोग उसमें शामिल भी नहीं थे और जो कथित आजाद जम्मू और कश्मीर था, उनके नेतृत्व ने वो इलाका पाकिस्तान को सौंप दिया। उनका कोई हक नहीं बनता था। मगर पाकिस्तान ने उस इलाके पर कब्जा कर लिया।"

चीन इसके पहले 1962 में भी जम्मू और कश्मीर के एक हिस्से (अक्साई चीन) पर अधिकार कर चुका था।

अब्दुल हकीम कश्मीरी भी गिलगित बाल्टिस्तान को नजरअंदाज किए जाने की बात करते हैं। वो बताते हैं कि अब भी इस इलाके को बेहद कम अधिकार हासिल हैं और लगभग पूरा नियंत्रण पाकिस्तान के पास है।

"गिलगित बाल्टिस्तान को पाकिस्तान ने अलग स्टेटस दिया। वहां पर शुरू में जम्हूरियत नहीं थी। 2009 में उन्हें पहला सेटअप दिया गया। उन्होंने कहा कि इसे एक सूबाई हैसियत देते हैं। लेकिन इसे राज्य बनाने की घोषणा नहीं की गई। वहां के लोगों की राज्य बनाने की मांग थी। अब 2018 में जो आदेश आया है उसमें गिलगित बाल्टिस्तान की असेंबली है जिसे कानून बनाने का अधिकार है, फिर भी उसके पास बेहद सीमित अधिकार हैं।"

बहुसंख्यक आबादी शिया 

गिलगित-बाल्टिस्तान की सीमा चीन से लगती है। ये इलाका चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के मुख्य रास्ते पर है और चीन यहां अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। गिलगित बाल्टिस्तान का स्टेटस बदलने की एक वजह इसे भी माना जा रहा है और इसे लेकर स्थानीय लोग विरोध भी जाहिर करते रहे हैं।

तिलक देवाशर कहते हैं, "वहां भी विरोध है लेकिन बातें सामने नहीं आती हैं। गिलगित बाल्टिस्तान में 1947-48 में बहुसंख्यक आबादी शिया थी। अब कह रहे हैं कि स्टेट सब्जेक्ट रूल हटा दिया, लेकिन (तथ्य है कि) 1970 से ही गिलगित बाल्टिस्तान में स्टेट सब्जेक्ट रूल को हटा दिया गया था।"

"वहां बाहर के लोगों को बसा कर उन्होंने कोशिश की है कि वहां शिया बहुल स्थिति को बदला जाए। स्थानीय लोग विरोध करते हैं। जब काराकोरम हाईवे बन रहा था या फिर सीपेक के प्रोजेक्ट तैयार हो रहे थे तो बहुत विरोध हुआ। वहां के जो मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, उनके नाम भी आपने नहीं सुने होंगे। एक बाबा जान नाम के नेता थे, वो जाने कितने सालों से जेल में पड़े हैं।"

हालांकि, अब भी ऐसे संगठन हैं, जो गिलगित बाल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की आजादी के लिए मुहिम चला रहे हैं।

क्या कहते हैं कश्मीर के लोग?

ऐसे ही एक संगठन से जुड़े हैं जुल्फिकार बट। वो कहते हैं, "आजाद कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान के अंदर जो लोग हैं वो पाकिस्तान की फौज को काबिज फौज समझते हैं। यहां बड़ी मूवमेंट खुद मुख्तार (स्वायत्त) कश्मीर के लिए चलाई जा रही है। इसमें एक दर्जन से ज्यादा नेशनलिस्ट संगठन शामिल हैं, जिसमें पांच छह सक्रिय तंजीम हैं।"

"डोगरा राज के बाद जो पाकिस्तानी कबायली घुसे जिन्होंने कश्मीर के बंटवारे की बुनियाद रखी और कश्मीर को गुलाम भी किया। उसकी बहाली के लिए कश्मीर के लोग जद्दोजहद कर रहे हैं।" ऐसे अभियान पाकिस्तान के उन दावों पर सवाल उठाते हैं जिनमें कहा जाता है कि उसके नियंत्रण वाला 'कश्मीर आजाद' है।

पूर्व चीफ जस्टिस गिलानी के मुताबिक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हमेशा से बरायनाम चुनाव होते रहे हैं और 1974 से संसदीय प्रणाली लागू है। सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री और राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति होता है।

ह्यूमन राइट्स वाच

लेकिन लेखक अब्दुल हकीम कश्मीरी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की असेंबली को हासिल अधिकारों को बेमानी बताते हैं।

अब्दुल हकीम कश्मीरी कहते हैं, "आईन साज असेंबली वो होती है जो आईन यानी संविधान बनाए। कानून साज वो होती है जो कानून बनाए और कानून एक आईन के तहत ही बनाए जाते हैं। मैं समझता हूं कि इस असेंबली के पास सिर्फ कानून के तहत ही इख्तियारात हैं। इनके पास आईन (संविधान) मौजूद ही नहीं।"

"इनका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई स्टेटस नहीं है। ये ऐसी हुकूमत है जिसे पाकिस्तान की सरकार के अलावा दुनिया भर में कहीं भी माना नहीं जाता। अगर सच्ची बात की जाए तो रियासत जम्मू कश्मीर की इस असेंबली की पोजीशन अंगूठा लगवाने से ज्यादा नहीं है।"

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। बीते दशक में इस इलाके में आए भूकंप के बाद ह्यूमन राइट्स वाच ने एक रिपोर्ट तैयार की थी।

रिपोर्ट में दावा किया था, "आजाद कश्मीर में अभिव्यक्ति की आजादी पर पाकिस्तान सरकार की ओर से कड़ा नियंत्रण है। नियंत्रण की ये नीति चुनिंदा तरह से इस्तेमाल की जाती है। पाकिस्तान स्थित ऐसे आतंकवादी संगठन जो जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की हिमायत करते हैं, उन्हें खुली छूट हासिल है। खासकर 1989 से। वहीं, कश्मीर की आजादी की बात करने वालों को दबाया जाता है।"

अंतरराष्ट्रीय बिरादरी

रॉ के पूव अधिकारी तिलक देवाशर भी इस मुद्दे पर पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करते हैं। वो कहते हैं, "ये जो कहते हैं आजाद कश्मीर (वो) बिल्कुल आजाद नहीं है। सारा कंट्रोल पाकिस्तान के हाथ में है। वहां की जो काउंसिल है, उसका चेयरमैन पाकिस्तान का प्रधानमंत्री है। वहां की सेना नियंत्रण करती है।"

"वो लाइन ऑफ कंट्रोल के करीब है, तो वहां 1989 से बेशुमार कैंप चल रहे हैं। वहां वो ट्रेनिंग भी करते हैं। वहां लॉन्च पैड हैं, जहां से भारत में घुसपैठ होती है। ये आर्मी कैंप के साथ जुड़े हुए हैं।"

देवाशर ये भी दावा करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के खामोश रहने से पाकिस्तान को मनमानी का मौका मिलता है।

"लोग खुश नहीं हैं पाकिस्तान से। वो पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते। लेकिन उनका कोई सपोर्ट नहीं है। कोई सुनवाई नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उन पर ध्यान नहीं दे रही तो पाकिस्तान अपनी मनमानी करता जा रहा है।"

पाकिस्तान और हिंदुस्तान

वहीं लेखक अब्दुल हकीम कश्मीरी कहते हैं कि ये दिक्कत कश्मीर पर अधिकार को लेकर है और सबसे ज्यादा मुश्किल कश्मीरी लोगों को ही हो रही है। वो कहते हैं, "गोली एलओसी के इस पार से हो या उस पास से आए, उसका निशाना कश्मीर के लोग बनते हैं। जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान का आम फौजी है, वो इसकी भेंट चढ़ा।"

और रुहाना खान जैसे कश्मीरियों के पास तो शायद गुजारिश करने से ज्यादा कोई अधिकार है भी नहीं। वो कहती हैं, "मैं ये पैगाम देना चाहती हूं कि जंग से लड़ने से, एक दूसरे पर ताना बाजी करने से कुछ हासिल नहीं होगा। दोनों हुकूमतों को चाहिए कि वो आपस में बात करें और इसका कोई हल निकालें।"

लेकिन, क्या ये आवाज सुनी जाएगी? वो भी उस दौर में जब कथित आजाद कश्मीर की जमीन से ये संदेश देने वाली एक युवा लड़की खतरे की वजह से अपना नाम तक जाहिर नहीं करना चाहती। 
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