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नेतन्याहू को सत्ता से उखाड़ फेंकने की तैयारी: इस्राइल में कैसी रणनीति बना रहा विरोधी खेमा? अब्बास पर नजरें

Fri, 30 Oct 2026 03:02 AM IST
राकेश कुमार एएनआई, यरुशलम।
एएनआई, यरुशलम। Published by: राकेश कुमार Updated Fri, 30 Oct 2026 03:02 AM IST
सार

इस्राइल के चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है, लेकिन उनका गठबंधन 53 सीटों पर ही सिमट गया। नेतन्याहू विरोधी विपक्ष को भी केवल 48 सीटें मिली हैं, जबकि बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। ऐसे में 19 सीटें जीतने वाले अरब दल सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन राम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास ने अल्पमत सरकार की संभावना पर संदेह जताया है। अब सबकी नजर राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की बातचीत और सरकार बनाने के अगले प्रयासों पर है।
 

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इस्राइल चुनाव - फोटो : Amar Ujala

विस्तार
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इस्राइल में चुनाव के नतीजे आने के बाद भी नई सरकार की तस्वीर साफ नहीं हो पाई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है, लेकिन उनका गठबंधन बहुमत से दूर रह गया। दूसरी ओर, नेतन्याहू को सत्ता से हटाने की कोशिश कर रहा विपक्ष भी अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। इस्राइल की 120 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। ऐसे में सरकार बनाने का पूरा गणित अरब दलों के समर्थन पर आकर टिक गया है।
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विपक्षी नेता यर गोलान किनसे कर रहे हैं मुलाकात?
नई सरकार बनाने की कोशिशों के बीच डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख यर गोलान विपक्षी नेताओं से लगातार मुलाकात कर रहे हैं। उन्होंने बृहस्पतिवार को राम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास से मुलाकात की। इसके अलावा यशर पार्टी के प्रमुख गादी आइजेनकोट और बियाचद पार्टी के यायर लैपिड से भी बातचीत की। द टाइम्स ऑफ इस्राइल के मुताबिक, यहूदी नेतृत्व वाले नेतन्याहू विरोधी खेमे में गोलान अकेले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने सरकार बनाने में अरब बहुल पार्टियों को शामिल करने का खुलकर समर्थन किया है। आइजेनकोट से मुलाकात के बाद गोलान ने एक्स पर लिखा, 'इस्राइल को बचाने का सवाल दांव पर है।' उन्होंने कहा कि दोनों नेता देश के बेहतर भविष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए साथ काम कर रहे हैं।
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सीटों का पूरा गणित क्या है? 
इस्राइल के केंद्रीय चुनाव आयोग के अंतिम आंकड़ों के मुताबिक, किसी भी गठबंधन के पास फिलहाल सरकार बनाने लायक सीटें नहीं हैं।
  • लिकुड पार्टी: नेतन्याहू की पार्टी 27 सीटों के साथ संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनी है।
  • नेतन्याहू का गठबंधन: दक्षिणपंथी गठबंधन को कुल 53 सीटें मिली हैं, जो बहुमत से आठ कम हैं।
  •  विपक्षी खेमा: नेतन्याहू को हटाने की कोशिश कर रहे दलों को कुल 48 सीटें मिली हैं।
  • अरब पार्टियां: इन दलों ने मिलकर 19 सीटें हासिल की हैं। सरकार बनाने के गणित में इनकी भूमिका अहम है।
  •  बहुमत का आंकड़ा: इस्राइल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटें जरूरी हैं।
  • अन्य प्रमुख दल: यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म और ओत्जमा येहुदित को सात-सात, जबकि शास और धार्मिक जायनिस्ट पार्टी को छह-छह सीटें मिली हैं।
  • एकता सरकार का विकल्प: लिकुड, यशर, टुगेदर और यिसरायल बेतेनु साथ आते हैं तो कुल 66 सीटें हो सकती हैं।

मंसूर अब्बास को अल्पमत सरकार बनने की उम्मीद क्यों नहीं है?
अरब दलों के समर्थन से अल्पमत सरकार बनाने की संभावना पर राम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास ने संदेह जताया है। चैनल 12 न्यूज के हवाले से द टाइम्स ऑफ इस्राइल ने बताया कि अब्बास ने पार्टी के सदस्यों के साथ बैठक में कहा कि गादी आइजेनकोट के नेतृत्व में अरब दलों के बाहरी समर्थन से अल्पमत सरकार बनना मुश्किल है। दरअसल, विपक्षी खेमे के ज्यादातर दल अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने के पक्ष में नहीं हैं। वहीं, एकता सरकार का विकल्प भी सामने है, जिसमें नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और विपक्षी दल साथ आ सकते हैं। हालांकि, विपक्ष पहले ही नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के वादे के साथ चुनाव लड़ चुका है। ऐसे में उनके साथ सरकार बनाने का रास्ता आसान नहीं है।
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अब आगे सरकार बनाने की प्रक्रिया कैसे चलेगी?
अंतिम चुनाव परिणाम औपचारिक रूप से प्रकाशित होने के बाद राष्ट्रपति इसाक हर्जोग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करेंगे। इसके बाद वह उस नेता को सरकार बनाने का मौका देंगे, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे अच्छी संभावना होगी। यदि वह नेता तय समय में सरकार बनाने में नाकाम रहता है तो किसी दूसरे नेता को मौका मिल सकता है। इस प्रक्रिया में भी सफलता नहीं मिलने पर देश में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है। इस बीच चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों ने भी विवाद बढ़ा दिया है। केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष नोआम सोहल्बर्ग ने शिन बेट प्रमुख डेविड जिनी से विदेशी फंडिंग और चुनाव को प्रभावित करने की आशंकाओं की जांच करने को कहा है। हालांकि, समिति के कार्यवाहक महानिदेशक डीन लिवने ने बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि व्यवस्थित गड़बड़ी का कोई सबूत नहीं मिला। कतर ने भी चुनाव में दखल देने के आरोपों को गलत बताया है।
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