वैचारिक करीबी या दिखावा: ईरान और तालिबान की दोस्ती के बीच है जल विवाद का दरिया
अफगानिस्तान और ईरान के बीच हेलमांद नदी को लेकर लगभग एक सदी से विवाद चल रहा है। हेलमांद अफगानिस्तान की सबसे लंबी नदी है। यह काबुल के पास पश्चिमी हिंदकुश पहाड़ियों से निकलती है और वहां से दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगभग 1,100 किलोमीटर तक बहने के बाद ईरान से लगी सीमा के पास हामुन झील में मिल जाती है...
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ईरान ने पुरानी बातें भूल कर तालिबान से सहयोग करने का फैसला किया है। लेकिन जानकारों का कहना है कि उसका ये इरादा कितना कामयाब होगा, इसकी पहली परीक्षा अफगानिस्तान के साथ जारी उसके जल विवाद के मामले में होगी। इन जानकारों की राय है कि अफगानिस्तान में पर्यावरण संरक्षण संबंधी कोई एजेंसी नहीं है। ऐसे में काबुल में काबिज हुई नई सरकार के लिए ईरान के साथ होने वाले किसी समझौते का पालन करना मुश्किल होगा।
वाशिंगटन में रहने वाले पर्यावरण विशेषज्ञ निक कोवसार ने राय जताई है कि तालिबान के सत्ता में आने से ईरान-अफगानिस्तान सीमा की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। कोवसार अभी सीरिया, इराक, ईरान और अफगानिस्तान पर जलवायु परिवर्तन के हो रहे असर का अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने जर्मन सरकारी मीडिया डायचे वेले (डीडब्लू) से कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण उस क्षेत्र में उग्रवाद और आतंकवाद बढ़ रहा है। सूखे और खराब जल प्रबंधन के कारण बहुत से किसान तालिबान सहित दूसरे उग्रवादी गुटों से जुड़े हैं। ये गुट उन्हें फौरी आर्थिक मदद देते हैं।
अफगानिस्तान और ईरान के बीच हेलमांद नदी को लेकर लगभग एक सदी से विवाद चल रहा है। हेलमांद अफगानिस्तान की सबसे लंबी नदी है। यह काबुल के पास पश्चिमी हिंदकुश पहाड़ियों से निकलती है और वहां से दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगभग 1,100 किलोमीटर तक बहने के बाद ईरान से लगी सीमा के पास हामुन झील में मिल जाती है। हामुन झील का ज्यादातर हिस्सा ईरान में पड़ता है। ये झील ईरान के लिए एक बड़ा जल स्रोत है। ईरान में पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिहाज से इस झील को बेहद अहम माना जाता है।
इस समय ईरान के कई प्रांत भी सूखा झेल रहे हैं। खास कर सिस्तान और बालूशिस्तान प्रांतों पर इसका बुरा असर देखा गया है, जो देश के सबसे गरीब प्रांत हैं। ईरान की संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक बीते दो दशकों में पानी की कमी के कारण इस क्षेत्र के 25 से 30 फीसदी लोग विस्थापित होकर दूसरे इलाकों या शहरों में चले गए हैं। ईरान का आरोप रहा है कि अफगानिस्तान 1973 की संधि का उल्लंघन करते हुए उससे कम मात्रा में पानी हामुन झील में पहुंचने दे रहा है, जिस पर तब सहमति हुई थी। अफगानिस्तान इस आरोप का खंडन करता रहा है।
ये सारा मसला तब और भड़क गया, जब अफगान सरकार ने ईरान से लगी सीमा के पास हेलमांद नदी पर एक बांध बनाया। इस कमाल खान डैम का उद्घाटन इसी साल मार्च में हुआ। ईरान ने तब कहा था कि इस बांध के कारण हेलमांद नदी में पानी का प्रवाह काफी घट जाएगा। ईरानी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक जब से तालिबान सत्ता में आया है, कमाल खान डैम से अधिक मात्रा में पानी छोड़ा जा रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान ने संभवततया ये रुख ईरान का समर्थन पाने के लिए अपनाया है। लेकिन पूर्व हमीद करजई सरकार में अफगानिस्तान के जल प्राधिकरण के प्रमुख रह चुके मोहम्मद बशीर ने डायचे वेले से कहा कि तालिबान को पर्यावरण की समझ नहीं है। उन्होंने कहा- ‘अभी तालिबान उन लोगों के साथ मिल कर काम करना चाहता है, जिसे वह अपना वैचारिक करीबी समझता है। लेकिन अफगानिस्तान गंभीर संकट में है और उसके पास संसाधनों की बेहद कमी है।’
फरवरी 2021 में अफगानिस्तान और ईरान के बीच हेलमांद नदी के जल के बंटवारे पर एक सहमति बनी थी। लेकिन जानकारों का कहना है कि जब अफगानिस्तान खुद पानी का संकट झेल रहा है, तब तालिबान उस सहमति पर कैसे कायम रहेंगे, यह देखने की बात होगी। जबकि यह साफ है कि ईरान के साथ अफगानिस्तान का रिश्ता कैसा रहेगा, यह जल समझौते पर अमल से ही तय होगा।